गंतव्य - सविता सिंह मीरा जी, जमशेदपुर

सविता सिंह "मीरा" जी का जन्म 23 सितम्बर को जमशेदपुर में हुआ। उन्होंने शिक्षा जमशेदपुर और रांची से प्राप्त की और 2018 में लेखन शुरू किया। वे लेखन, संगीत और समाजसेवा में सक्रिय हैं। उनके साझा संकलनों में "साहित्यनामा" और "तरंगिनी" शामिल हैं, और उनके एकल संग्रह "अभिव्यक्ति मेरी कलम से" और "गुल्लक" हैं। उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं और आकाशवाणी से प्रसारित हुई हैं। वे हिंदी और भोजपुरी में कविता, दोहा, कहानी आदि लिखती हैं और कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी हैं।

Jul 10, 2024 - 14:31
Jul 11, 2024 - 15:01
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गंतव्य - सविता सिंह मीरा जी,  जमशेदपुर
गंतव्य - सविता सिंह मीरा जमशेदपुर

गंतव्य..

ऐसा पहली बार हुआ, जब घर से कहीं बाहर निकली और उसे आभास हुआ कि कोई पीछे है  किंतु, पलट कर जब पीछे देखी तो कोई नजर नहीं आया। 
नंदिनी अपनी आँखों में आँसू लिए कुछ सोचते हुए गंतव्य की ओर बढ़ चली, और पुरानी यादों में खो गई। 
देखो सब ध्यान से सुनो, यदि नंदिनी को  कोई कुछ बोलेगा तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा मेरी यह एक ही प्यारी पोती है। सासू माँ, आपने तो नंदिनी को सर पर चढ़ा दिया है बिल्कुल खुद को राजकुमारी समझने लगी है। घर में मां, पापा ,भाई ,भाभी, दादी और नंदिनी बस ये ही तो थे। 
खाना पीना से निबट कर सभी अपने-अपने कमरे में चले गए। नंदिनी दादी के साथ चल पड़ी उनके कमरे की ओर।दादी संग खाना,दादी के साथ सोना यही थी उसकी जिंदगी। अचानक नंदिनी की दादी को न जाने क्या हुआ बीमार पड़ी और दस दिन के अंदर स्वर्ग सिधार गई। 


       दादी की अंत्येष्टि करके सभी आए और थोड़ी देर बाद भैया भाभी , माँ पापा अपने अपने कमरे में ,और नंदिनी नितांत अकेली! आंखें अश्रुपूरित हो गई। ढूँढ रही थी दादी को नंदिनी उसकी छूवन को उसकी एक स्पर्श को दादी की महक को। वह  बिलखती रही लेकिन उसकी  वेदना समझने वाला कोई नहीं था।नंदिनी खुद को को नितांत अकेली महसूस करने लगी।दादी की वह राजकुमारी अब गंभीर रहने लगी ।अभी उसका दर्द भरा भी नहीं था तब तक एक और आघात ,माँ ह्रदयाघात से चल बसी। 


       अब उसके पिता अकेले, जो नंदिनी किचन तक जाती नहीं थी वह नंदिनी पिता की इस कदर देखभाल करने लगी जैसे कि वह अपने पिता की माँ हो क्योंकि, अभी तुरंत नंदिनी ने अपनी दादी को खोया था और खुद को बिल्कुल अकेली पा रही थी।उसे अपनी दादी जैसी एक सखा की जरूरत थी जिससे अपने मन की बातें खुलकर कह सके, उनकी गोद में सर रखकर रो सके, पकड़ कर सो सके दादी की भांति।बिल्कुल दादी की तरह क्योंकि, नंदिनी ने उस अकेलापन को जिया है इसलिए अपने माता के देहांत के बाद अपने पिता का वह बहुत ख्याल रखने लगी। उनके खाने पीने की सारी जिम्मेदारियां उसने उठा ली। अब नंदिनी का समय सिर्फ अपने पिता के लिए था। भैया भाभी साथ तो थे मगर, उनकी अपने लिए प्रथम प्राथमिकताएं थीं।


        एक दिन नंदिनी को किसी काम से बाहर जाना पड़ा।पापा सो रहे थे,उनकी नींद में खलल ना पड़े इसलिए पिता को बिना बताए  बाहर चली गई और फिर पलट कर देखा दूर-दूर तक सन्नाटा ही सन्नाटा। सुबह के चार ही बजे थे। अभी पूरी तरह उजाला हुआ भी नहीं था। इस अंधकार में वह ऑटो में बैठकर स्टेशन की तरफ चली गई। तब तक स्टेशन में आवाज आई गाड़ी संख्या........ प्लेटफार्म नंबर......पर पहुंच गई है।इस आवाज से नंदिनी की तंद्रा टूटी। 
दादी की लाडली उनके स्पर्श, उनके स्नेह, उनकी महक की अभिलाषी नंदिनी खुद को अपनी ही बाहों में भींचती हुई चल पड़ी।एक अदद दादी की तलाश में, उसके जीवन की तलाश में उसकी खुशबू और स्नेहिल स्पर्श की तलाश में....!!

सविता सिंह मीरा  जी
जमशेदपुर