Delhi Honor: सराय काले खां चौक अब भगवान बिरसा मुंडा के नाम से प्रसिद्ध
दिल्ली के सराय काले खां चौक का नाम बदलकर भगवान बिरसा मुंडा चौक रखा गया। स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी नायक बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर यह निर्णय लिया गया। जानें उनका जीवन संघर्ष।
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राजधानी दिल्ली में ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए सराय काले खां चौक का नाम अब भगवान बिरसा मुंडा चौक कर दिया गया है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने शुक्रवार को आयोजित एक जनसभा में इसका ऐलान किया। यह निर्णय आदिवासी नायक और स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर लिया गया।
खट्टर ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, "यह चौक अब भगवान बिरसा मुंडा के नाम से जाना जाएगा। उनकी प्रतिमा और चौक का नाम देखकर न केवल दिल्ली के नागरिक बल्कि आईएसबीटी पर आने वाले यात्री भी उनके जीवन से प्रेरणा लेंगे।"
भगवान बिरसा मुंडा: आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम के महानायक
भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को अविभाजित बिहार के उलिहातू में हुआ था, जो अब झारखंड का हिस्सा है। बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आदिवासी समुदाय को संगठित किया और उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई। उनका नेतृत्व छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासी आंदोलन के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
उन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ "उलगुलान" (विद्रोह) नामक क्रांति का नेतृत्व किया। यह विद्रोह न केवल आदिवासी समुदाय की स्वतंत्रता के लिए था, बल्कि उनके पारंपरिक अधिकारों और भूमि की रक्षा के लिए भी था।
ब्रिटिश शासन और भूमि हड़पने का विरोध
बिरसा मुंडा ने आदिवासी भूमि पर ब्रिटिश सरकार की कब्जे की नीति का कड़ा विरोध किया। ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों के कारण आदिवासी बंधुआ मजदूर बनने पर मजबूर हो गए थे। बिरसा ने आदिवासियों को उनकी जमीन और अधिकारों के लिए जागरूक किया। उन्होंने कहा, "हम अपनी जमीन के असली मालिक हैं और इसे किसी के कब्जे में नहीं जाने देंगे।"
उनकी इस क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार को छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट लागू करना पड़ा, जिसने आदिवासी भूमि को बाहरी लोगों के कब्जे से बचाया।
दिल्ली में बिरसा मुंडा की विरासत का सम्मान
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस अवसर पर भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा का अनावरण किया। उन्होंने कहा कि यह कदम आदिवासी नायक के बलिदान और संघर्ष को सम्मान देने के लिए उठाया गया है।
यह प्रतिमा न केवल उनके संघर्ष की याद दिलाएगी बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उनकी क्रांति और प्रेरणा का एहसास भी कराएगी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में आदिवासी आंदोलन
भगवान बिरसा मुंडा का आंदोलन केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति, धर्म और परंपराओं को बचाने का भी एक प्रयास था। उन्होंने धर्मांतरण और आदिवासी समाज की पारंपरिक मान्यताओं पर हो रहे हमलों का कड़ा विरोध किया।
उनका जीवन संदेश देता है कि अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर संघर्ष किया जाए। बिरसा मुंडा को "धरती आबा" (धरती पिता) के नाम से भी जाना जाता है।
दिल्ली में बदलाव का प्रतीक
सराय काले खां चौक का नाम बदलकर भगवान बिरसा मुंडा चौक रखना न केवल एक प्रतीकात्मक बदलाव है, बल्कि यह आदिवासी समाज और उनके योगदान को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
यह चौक अब बिरसा मुंडा की वीरता और बलिदान की कहानी कहेगा और लाखों लोगों को उनके सिद्धांतों पर चलने के लिए प्रेरित करेगा।
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