Ganga Protection: ऐतिहासिक फैसला, गंगा घाटों पर अब गैर-हिंदुओं की एंट्री बैन, धामी सरकार का बड़ा कदम, हरिद्वार-ऋषिकेश में हड़कंप
उत्तराखंड की देवभूमि में अब गंगा के 105 पवित्र घाटों पर केवल हिंदुओं को ही प्रवेश मिलेगा। सीएम पुष्कर सिंह धामी के इस कड़े आदेश और आजादी से पहले के उन गुप्त कानूनों की पूरी जानकारी यहाँ दी गई है वरना आप भी हरिद्वार और ऋषिकेश के घाटों पर लागू हो रहे इस सबसे बड़े बदलाव का सच कभी नहीं जान पाएंगे।
हरिद्वार/ऋषिकेश, 6 जनवरी 2026 – सनातन धर्म की आस्था के सबसे बड़े केंद्र देवभूमि उत्तराखंड से एक ऐसा फैसला सामने आया है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार अब हरिद्वार और ऋषिकेश के 105 गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की तैयारी में है। लंबे समय से साधु-संतों और तीर्थ पुरोहितों द्वारा उठाई जा रही इस मांग पर मुहर लगाते हुए सीएम ने अधिकारियों को पुराने कानूनों का बारीकी से अध्ययन करने का निर्देश दिया है। यह कदम केवल एक नियम नहीं, बल्कि गंगा की पवित्रता और सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए उठाया गया एक बड़ा रक्षा-कवच माना जा रहा है।
धामी का 'देवत्व' प्लान: घाटों पर अब कड़ा पहरा
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड की विशेष आध्यात्मिक पहचान को बनाए रखने के लिए सरकार किसी भी हद तक जाएगी।
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अधिकारियों को टास्क: सीएम ने बताया कि गंगा के किनारे कुछ घाटों पर इस तरह के प्रावधान पहले से ही मौजूद हैं। अब सरकार इन्हें और अधिक व्यापक और प्रभावी तरीके से लागू करने जा रही है।
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105 घाटों पर नजर: वर्तमान में हरिद्वार में 118 और ऋषिकेश में भी कई घाट हैं। योजना के अनुसार, 105 प्रमुख घाटों को 'सनातनी आरक्षित' घोषित किया जाएगा।
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आस्था की रक्षा: धामी ने कहा, "देवभूमि सनातनियों की आस्था का केंद्र है और यहाँ के देवत्व की रक्षा के लिए हमारी सरकार हर कड़ा कदम उठाएगी।"
क्या है 1954 का कानून? इतिहास के पन्नों में छिपे नियम
यह विवाद नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें ब्रिटिश काल और आजादी के तुरंत बाद के कानूनों में छिपी हुई हैं।
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निकाय ऐक्ट 1954: ऋषिकेश और हरिद्वार नगर निगम के बायलॉज (Bylaws) के अनुसार, कुछ खास घाटों पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है।
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जमीन की पाबंदी: साल 1954 के निकाय कानून के मुताबिक, हरिद्वार के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में गैर-हिंदू संपत्ति नहीं खरीद सकते और न ही वहां व्यवसाय कर सकते हैं।
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आजादी से पहले के नियम: हर की पैड़ी जैसे कुछ घाटों पर ब्रिटिश शासन के समय से ही विशेष नियम लागू थे, जिन्हें अब दोबारा कड़ाई से लागू करने की मांग उठ रही है।
गंगा घाट प्रवेश प्रतिबंध: एक नजर में (Key Highlights)
| विवरण | प्रस्तावित जानकारी (Updates) |
| प्रतिबंधित क्षेत्र | हरिद्वार और ऋषिकेश के 105 गंगा घाट |
| प्रवेश की अनुमति | केवल हिंदू धर्मावलंबी |
| कानूनी आधार | 1954 निकाय ऐक्ट और प्राचीन बायलॉज |
| मुख्य मांगकर्ता | गंगा सभा, तीर्थ पुरोहित और हिंदूवादी नेता |
| सरकार का रुख | कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के निर्देश |
इतिहास और तीर्थ पुरोहितों की हुंकार: "कुंभ से पहले हो फैसला"
हरिद्वार के तीर्थ पुरोहित और गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने प्रेस क्लब में प्रेस वार्ता कर इस अभियान को और तेज कर दिया है। इतिहास गवाह है कि हरिद्वार को हमेशा से 'मायापुरी' कहा गया है, जहाँ केवल उन लोगों को अनुमति थी जो गंगा की मर्यादा का पालन करते थे। पुरोहितों का कहना है कि ब्रिटिश काल में नगर पालिका हरिद्वार ने स्पष्ट नियम बनाए थे कि गैर-हिंदू यहाँ ठहर नहीं सकते और न ही धार्मिक स्थलों के पास व्यापार कर सकते हैं। अब 2026 के महाकुंभ से पहले इस मांग ने जोर पकड़ लिया है कि कुंभ मेला क्षेत्र को 'गैर-हिंदू प्रतिबंधित क्षेत्र' घोषित किया जाए। तीर्थ पुरोहितों का तर्क है कि इससे न केवल धार्मिक शुचिता बनी रहेगी, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी यह बेहद जरूरी है।
कानून की सख्ती: घाटों पर क्या बदलेगा?
अगर यह कानून पूरी तरह प्रभावी होता है, तो गंगा के किनारे का दृश्य पूरी तरह बदल जाएगा।
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आईडी कार्ड की चेकिंग: प्रमुख घाटों पर प्रवेश के समय आधार कार्ड या पहचान पत्र की मांग की जा सकती है।
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134 घाटों का जाल: हरिद्वार में जल्द ही घाटों की संख्या बढ़कर 134 होने वाली है। कानून के दायरे में आने के बाद इन सभी घाटों पर 'प्रवेश वर्जित' के बोर्ड लगाए जा सकते हैं।
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व्यापारिक पाबंदी: घाटों के आसपास की दुकानों और होटलों में काम करने वाले या मालिकाना हक रखने वाले गैर-हिंदुओं को भी कानूनी नोटिस दिए जा सकते हैं।
सनातन का संकल्प या राजनीतिक बहस?
धामी सरकार का यह कदम उत्तराखंड की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने में एक बड़ा बदलाव लाएगा। गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक की तैयारी यह संदेश देती है कि देवभूमि में अब 'आस्था के मानकों' पर कोई समझौता नहीं होगा। हरिद्वार और ऋषिकेश के गंगा तट अब एक नई कानूनी पहचान की ओर बढ़ रहे हैं।
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