Jharkhand Freedom Fighters History : वीर तेलंगा खड़िया की हुंकार ने हिला दी थी ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें, 18 साल जेल और शहादत की वह अनकही दास्तान जो रोंगटे खड़े कर देगी
झारखंड के गुमला से निकली तेलंगा खड़िया की वह ललकार यहाँ मौजूद है जिसने तीर-तलवार के दम पर अंग्रेजों के 'कागजी राज' को चुनौती दी थी वरना आप भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इस सबसे साहसी और विस्मृत नायक के बलिदान से पूरी तरह अनजान रह जाएंगे।
गुमला/झारखंड, 10 फरवरी 2026 – भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र होते ही अक्सर हमारे जेहन में कुछ गिने-चुने नाम आते हैं, लेकिन जंगलों और पहाड़ों के बीच से उठी उन आवाजों को इतिहास के पन्नों ने कहीं दबा दिया जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इन्हीं महान नायकों में से एक थे वीर तेलंगा खड़िया। 9 फरवरी को उनकी जन्मजयंती के अवसर पर पूरा झारखंड उस महायोद्धा को याद कर रहा है, जिसने अंग्रेजों से दो-टूक कहा था— “हमारे तीर-तलवार तुम्हारे काग़ज़ी राज का जवाब हैं।” ### मुरगु गांव से शुरू हुआ विद्रोह का सफर
9 फरवरी 1806 को वर्तमान गुमला जिले के मुरगु गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे तेलंगा खड़िया बचपन से ही अन्याय के विरुद्ध तार्किक और साहसी थे। ठुईया खड़िया और पेती खड़िया के इस लाल ने उस दौर में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों को भांप लिया था जब कई रियासतें घुटने टेक रही थीं।
परहा प्रणाली बनाम ब्रिटिश लूट
19वीं सदी के मध्य में अंग्रेजों ने आदिवासियों की पारंपरिक 'परहा प्रणाली' (स्वशासन व्यवस्था) पर प्रहार किया।
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जमीन की लूट: पीढ़ियों से अपनी जमीन के मालिक रहे आदिवासियों को अब अंग्रेजों को मालगुजारी देनी पड़ रही थी।
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मजदूर बनने की विवशता: कर न चुका पाने पर आदिवासियों को उनकी ही खेतों से बेदखल कर दिया गया।
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संगठन की शक्ति: तेलंगा खड़िया ने इसके खिलाफ कुल 13 जूरी पंचायतों का गठन किया, जो सिसई, बसिया, सिमडेगा और बानो जैसे इलाकों में ब्रिटिश सत्ता के समानांतर अपनी सरकार चला रही थीं।
वीर तेलंगा खड़िया: क्रांति का कालक्रम (History Timeline)
| वर्ष/घटना | प्रमुख विवरण (Key Facts) |
| जन्म | 9 फरवरी 1806, मुरगु गांव (गुमला) |
| रणनीति | जूरी पंचायतों का गठन और अखाड़ों में सैन्य प्रशिक्षण |
| सेना | 1500 प्रशिक्षित आदिवासी युवाओं की टुकड़ी |
| कारावास | 18 वर्ष (लोहरदगा और कलकत्ता जेल) |
| शहादत | 23 अप्रैल 1880, सोसो नीम टोली में हत्या |
अखाड़ा और 18 साल की जेल: न झुके, न रुके
तेलंगा खड़िया केवल बातों के धनी नहीं थे, उन्होंने गांव-गांव 'अखाड़े' स्थापित किए। यहाँ करीब 1500 युवाओं को तीर-कमान और तलवारबाजी का प्रशिक्षण दिया गया। उनकी बढ़ती ताकत से अंग्रेज इतने डर गए कि एक विश्वासघाती की मदद से उन्हें पंचायत बैठक के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया।
उन्हें 18 वर्षों के लिए कलकत्ता जेल भेज दिया गया। कल्पना कीजिए, जवानी के 18 साल अंधेरी कोठरी में बिताने के बाद भी जब वे लौटे, तो उनके भीतर की क्रांति की ज्वाला शांत नहीं हुई थी। जेल से निकलते ही उन्होंने फिर से अपना अभियान शुरू कर दिया, जो ब्रिटिश हुकूमत के लिए अंतिम चेतावनी बन गया।
धोखे से शहादत: 'तेलंगा टोपा टांड' की मिट्टी आज भी गवाह है
23 अप्रैल 1880 की वह सुबह काली साबित हुई। जब तेलंगा खड़िया एक प्रशिक्षण सत्र शुरू करने जा रहे थे, तभी एक ब्रिटिश एजेंट ने घात लगाकर उन पर गोलियां चला दीं। अपने नेता के शव को अंग्रेजों के अपमान से बचाने के लिए उनके अनुयायी उसे कोयल नदी पार ले गए और गुमला के सोसो नीम टोली गांव में दफनाया। आज इस स्थान को ‘तेलंगा टोपा टांड’ कहा जाता है, जहाँ की मिट्टी आज भी उनके बलिदान की खुशबू बिखेरती है।
इतिहास के हाशिये से न्याय की मांग
यह विडंबना है कि जिस योद्धा ने 'कागजी राज' को अपनी तलवार की धार से चुनौती दी, उसे इतिहास की किताबों के मुख्य पृष्ठों पर जगह नहीं मिली। आज आवश्यकता है कि तेलंगा खड़िया जैसे नायकों की गाथा स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बने ताकि नई पीढ़ी को पता चले कि आज़ादी की कीमत केवल अहिंसा से नहीं, बल्कि जंगलों में बहे उस खून से भी चुकाई गई है जिसे हम भूल चुके हैं।
स्वाभिमान की मशाल
वीर तेलंगा खड़िया की जन्मजयंती हमें सिखाती है कि साधन कम होने पर भी अगर हौसला बुलंद हो, तो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को भी झुकाया जा सकता है। उनका नारा आज भी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहता है।
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