Veer Kalla ji Rathore History : बिना सिर के लड़े, चार हाथों से मचाया कोहराम; चित्तौड़ के महायुद्ध में अकबर की सेना पर काल बनकर टूटे वीर कल्लाजी राठौड़
आज 24 फरवरी को वीर योद्धा कल्लाजी राठौड़ का बलिदान दिवस है। चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके में चार हाथों वाले देवता कहे जाने वाले इस वीर के अदम्य साहस और बलिदान की रोंगटे खड़े कर देने वाली गाथा यहाँ मौजूद है वरना आप राजस्थान का सबसे महान इतिहास मिस कर देंगे।
24 फरवरी 1568 धर्म, संस्कृति और मातृभूमि के लिए जीने-मरने वाले लोकदेवता
राजस्थान की धरती वीरों की जननी रही है। यहाँ की माटी में एक अजीब सी शक्ति है — जो यहाँ जन्म लेता है, वह या तो वीरता से जीता है या वीरता से मर जाता है। ऐसी ही इस पावन धरती पर एक ऐसे महान योद्धा ने जन्म लिया, जिनका नाम आज भी राजस्थान के घर-घर में श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है — वीर कल्लाजी राठौड़। आज 24 फरवरी को उनके बलिदान दिवस पर पूरा राजस्थान उन्हें नमन करता है।
वीर कल्लाजी राठौड़ का जन्म मेड़ता (राजस्थान) में हुआ था। वे राठौड़ वंश के वीर सपूत थे और महान संत-कवयित्री मीराबाई के भतीजे थे। उनके पिता का नाम आसाजी राठौड़ था। कल्लाजी बचपन से ही असाधारण प्रतिभा के धनी थे। एक ओर जहाँ वे शस्त्र विद्या में निपुण थे, वहीं दूसरी ओर उन्होंने योग और आयुर्वेद में भी गहरी दक्षता प्राप्त की थी। यही कारण है कि लोग उन्हें "योगी और योद्धा" दोनों रूपों में पूजते हैं।
राजस्थान की लोक परंपरा में कल्लाजी को चतुर्भुज — अर्थात् चार भुजाओं वाले देवता — के रूप में पूजा जाता है। इसके पीछे एक अत्यंत प्रेरणादायक कथा है। युद्धभूमि में जब उनकी दोनों भुजाएँ कट गईं, तब भी उन्होंने हार नहीं मानी और अलौकिक शक्ति के बल पर शत्रुओं से युद्ध करते रहे। यह घटना उनकी अदम्य वीरता और मातृभूमि के प्रति असीम समर्पण का प्रतीक बन गई।
सन् 1568 का वर्ष राजस्थान के इतिहास में एक अत्यंत दुखद और साथ ही गौरवशाली अध्याय के रूप में दर्ज है। मुगल सम्राट अकबर ने अपनी विशाल सेना के साथ चित्तौड़गढ़ के किले पर आक्रमण किया। यह चित्तौड़ का तृतीय साका था। अकबर की सेना संख्या में अत्यंत विशाल थी और उसके पास आधुनिक युद्ध सामग्री भी थी। किंतु चित्तौड़ के वीरों ने हार स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
इस ऐतिहासिक युद्ध में महाराणा उदयसिंह के सेनापतियों में कल्लाजी राठौड़ एक प्रमुख स्तंभ थे। जब किले की रक्षा करना अत्यंत कठिन हो गया, तब भी कल्लाजी ने पीछे हटने से मना कर दिया। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर शत्रु सेना का डटकर मुकाबला किया। युद्ध में वे गंभीर रूप से घायल हो गए, किंतु उनके मनोबल पर कोई आँच नहीं आई। अंततः 24 फरवरी 1568 को इस वीर योद्धा ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
लोकदेवता के रूप में पूजा
कल्लाजी राठौड़ केवल एक योद्धा नहीं थे — वे एक लोकदेवता हैं। राजस्थान के विभिन्न जिलों में उनके मंदिर स्थापित हैं, जहाँ लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष दर्शन के लिए आते हैं। रनेला गाँव (नागौर जिला) में उनका प्रमुख मंदिर स्थित है, जो उनकी जन्मस्थली के रूप में पूजित है। इसके अलावा सांचौर, जालोर और अन्य स्थानों पर भी उनके मंदिर हैं।लोक मान्यता के अनुसार कल्लाजी सर्पदंश से रक्षा करने वाले देवता के रूप में विशेष रूप से पूजे जाते हैं। राजस्थान में आज भी जब किसी को सर्पदंश होता है, तो लोग कल्लाजी के मंदिर में जाकर उनसे रक्षा की कामना करते हैं। यह उनकी आयुर्वेद और योग विद्या में पारंगतता का ही प्रतिफल है जो लोक स्मृति में इस रूप में जीवित है।
उनकी भोपा परंपरा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। भोपे लोग रात भर जागकर फड़ (कपड़े पर चित्रित उनकी जीवनगाथा) के सामने उनके पराक्रम का गुणगान करते हैं। यह परंपरा राजस्थान की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है।
धर्म और संस्कृति के रक्षक
कल्लाजी राठौड़ का बलिदान केवल एक युद्ध में मृत्यु नहीं था — यह धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा के लिए सर्वोच्च त्याग था। उस काल में जब विदेशी आक्रांता भारत की संस्कृति और परंपराओं को नष्ट करने पर आमादा थे, तब कल्लाजी जैसे वीरों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर भारतीय अस्मिता की रक्षा की।
उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि मातृभूमि की रक्षा सर्वोपरि है। जब देश और धर्म पर संकट आए, तब अपने सुख-वैभव की चिंता छोड़कर राष्ट्र के लिए समर्पित हो जाना ही सच्ची वीरता है। कल्लाजी ने यही किया — उन्होंने अपना सर्वस्व मातृभूमि को अर्पित कर दिया।
आज जब हम कल्लाजी राठौड़ का बलिदान दिवस मना रहे हैं, तो हमें यह विचार करना चाहिए कि उनका बलिदान हमारे लिए क्या संदेश लेकर आता है। आज की युवा पीढ़ी को इन वीरों की गाथाओं से प्रेरणा लेनी चाहिए।
देशभक्ति केवल सीमा पर लड़ने से नहीं होती — यह अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपनी परंपराओं से प्रेम करने से भी होती है। कल्लाजी ने जिस भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए प्राण दिए, उस संस्कृति को जीवित रखना हम सबका दायित्व है।विद्यालयों और महाविद्यालयों में ऐसे वीरों की जीवनगाथाएँ पढ़ाई जानी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि हमारी स्वतंत्रता और हमारी संस्कृति किस कीमत पर बची है।
वीर कल्लाजी राठौड़ अमर हैं — अपने बलिदान से, अपनी वीरता से और लोगों के दिलों में बसी श्रद्धा से। उनका जीवन एक ज्योति की तरह है जो सदियों से जल रही है और आने वाली सदियों तक जलती रहेगी।
24 फरवरी 1568 को जो बलिदान उन्होंने दिया, वह राजस्थान ही नहीं, पूरे भारत के इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। ऐसे महान वीर को उनके बलिदान दिवस पर हम सब नतमस्तक होकर कोटि-कोटि नमन करते हैं।
"वीर वही जो देश के लिए जिए, वीर वही जो देश के लिए मरे।
कल्लाजी राठौड़ — तुम अमर थे, अमर हो, अमर रहोगे।"
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