Shraddhanand Jayanti: स्वामी श्रद्धानंद की जयंती पर गूंजा भारत, गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक की वो अनसुनी कहानी जिसे जानकर आप दंग रह जाएंगे
स्वामी श्रद्धानंद की जयंती पर उनके तप और बलिदान की वो गाथा यहाँ मौजूद है जो हर भारतीय के खून में उबाल ला देगी। शिक्षा और राष्ट्रभक्ति के इस महानायक के बारे में सब कुछ यहाँ पढ़ें वरना आप इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय मिस कर देंगे।
नई दिल्ली/हरिद्वार, 22 फरवरी 2026 – आज पूरा भारत उस युगपुरुष को नमन कर रहा है जिसने कलम और त्याग के दम पर सोई हुई राष्ट्रचेतना को जगाया। 22 फरवरी भारतीय इतिहास का वह पन्ना है, जो स्वामी श्रद्धानंद के अदम्य साहस और तपस्या की गवाही देता है। वे केवल एक संन्यासी नहीं थे, बल्कि वे उस भारतीय आत्मा के उद्घोषक थे, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। जालंधर के एक पुलिस अधिकारी के घर से शुरू हुआ 'मुंशी राम' का सफर कैसे 'स्वामी श्रद्धानंद' बनकर अमर हो गया, इसकी कहानी आज भी रोंगटे खड़े कर देती है।
मुंशी राम से स्वामी श्रद्धानंद: वो एक मुलाकात जिसने बदल दी दुनिया
22 फरवरी 1856 को पंजाब के जालंधर में जन्मे मुंशी राम का जीवन शुरुआत में वकालत और सुख-सुविधाओं के इर्द-गिर्द घूम रहा था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
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turning point: जब उनकी मुलाकात स्वामी दयानंद सरस्वती से हुई, तो वैदिक धर्म और राष्ट्रोत्थान के विचारों ने उनके भीतर ऐसी ज्वाला जलाई कि उन्होंने सांसारिक सुखों का परित्याग कर दिया।
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संन्यास का मार्ग: श्रद्धा और आनंद के अद्भुत समन्वय के साथ वे स्वामी श्रद्धानंद बने और अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया।
शिक्षा का भारतीयकरण: गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना
स्वामी जी का मानना था कि जब तक भारत की शिक्षा पद्धति भारतीय संस्कृति के रंग में नहीं रंगेगी, तब तक देश मानसिक रूप से आजाद नहीं होगा।
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साहसिक कदम: 1902 में उन्होंने हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की।
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पश्चिमी शिक्षा को चुनौती: उस दौर में जब लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति हावी थी, उन्होंने वेदों, स्वावलंबन और चरित्र निर्माण को शिक्षा का आधार बनाया। आज यह संस्थान उनकी दूरदृष्टि का जीता-जागता प्रमाण है।
स्वामी श्रद्धानंद: व्यक्तित्व के प्रमुख आयाम (Life Highlights)
| विवरण | प्रमुख जानकारी (Key Facts) |
| जन्म तिथि | 22 फरवरी 1856 (जालंधर, पंजाब) |
| बचपन का नाम | मुंशी राम |
| प्रमुख योगदान | गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना (1902), शुद्धि आंदोलन |
| बलिदान दिवस | 23 दिसंबर 1926 |
| विचारधारा | वैदिक धर्म, सामाजिक समरसता, राष्ट्रवाद |
शुद्धि आंदोलन और निडरता का बेजोड़ संगम
स्वामी श्रद्धानंद का इतिहास केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संघर्ष की उन गलियों से गुजरा है जहाँ बोलना भी गुनाह था। 20वीं शताब्दी की शुरुआत में जब देश औपनिवेशिक दासता और आंतरिक कुरीतियों से लड़ रहा था, तब स्वामी जी ने 'शुद्धि आंदोलन' का नेतृत्व किया।
इतिहास गवाह है कि स्वामी जी ने उन लोगों के लिए द्वार खोले जो भटक कर अन्य मतों में चले गए थे। उन्होंने अस्पृश्यता (छुआछूत) और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध वैसी ही लड़ाई लड़ी जैसी उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी थी। 1919 में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, तब स्वामी जी ने वहां स्वागत समिति के अध्यक्ष के रूप में हिंदी में भाषण देकर सबको चौंका दिया था। उनकी निर्भीकता का आलम यह था कि वे चांदनी चौक में ब्रिटिश सैनिकों की संगीनों के सामने अपनी छाती तान कर खड़े हो गए थे। 23 दिसंबर 1926 को दिल्ली में उनकी हत्या कर दी गई, लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके विचारों ने ही आगे चलकर भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को सुदृढ़ किया।
स्वतंत्रता संग्राम और गांधीजी का साथ
स्वामी श्रद्धानंद केवल एक धार्मिक नेता नहीं थे, वे स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी योद्धा थे।
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असहयोग आंदोलन: उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का पुरजोर समर्थन किया।
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स्वदेशी का प्रचार: विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और खादी के प्रचार के लिए उन्होंने गाँव-गाँव जाकर चेतना जगाई।
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एकता के सूत्रधार: उन्होंने हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता और मानवता की सेवा को ही सच्चा धर्म माना। उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था।
प्रासंगिकता: आज क्यों जरूरी हैं स्वामी श्रद्धानंद?
आज जब हम 2026 में खड़े हैं, स्वामी जी के विचार और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
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शिक्षा का महत्व: वे मानते थे कि शिक्षा केवल नौकरी का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम है।
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समरस समाज: समाज के आंतरिक विभाजनों को खत्म किए बिना राष्ट्र कभी सशक्त नहीं बन सकता—यह उनकी सबसे बड़ी सीख थी।
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लेखक वरुण कुमार का संदेश: उनकी जयंती हमें याद दिलाती है कि सच्चा राष्ट्रनिर्माण राजनीतिक आजादी से नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक जागरण से संभव है।
कृतज्ञ राष्ट्र का नमन
स्वामी श्रद्धानंद का जीवन त्याग, तप और सेवा की वह अद्वितीय गाथा है जिसे हर पीढ़ी को पढ़ना चाहिए। उनकी जयंती पर हम संकल्प लें कि हम उनके बताए गए सत्य और समरसता के मार्ग पर चलेंगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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