Chhatrapati Sambhaji Maharaj History : धर्म न छोड़ा न झुकाया सिर, औरंगजेब की क्रूरता के आगे हिमालय से अडिग रहे संभाजी महाराज
छत्रपति संभाजी महाराज के बलिदान की रूह कंपा देने वाली कहानी यहाँ पढ़ें। औरंगजेब की क्रूरता के सामने झुके बिना कैसे 'शंभू राजा' ने धर्म और स्वराज्य के लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर कर दिए। उनके अदम्य साहस ने मुगल साम्राज्य के पतन की नींव रखी।
इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि वह उन नायकों के रक्त से लिखी गई इबारत है जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। भारतीय इतिहास के आकाश में 'धर्मवीर' छत्रपति संभाजी महाराज एक ऐसे ध्रुवतारे की तरह चमकते हैं, जिनकी आभा ने न केवल मराठा साम्राज्य को आलोकित किया, बल्कि मुगल साम्राज्य के पतन की नींव भी रखी। आज उनके बलिदान दिवस पर, उनके जीवन के उन पहलुओं पर दृष्टि डालना आवश्यक है जो उन्हें एक योद्धा से कहीं ऊपर एक 'युगपुरुष' बनाते हैं।
14 मई 1657 को पुरंदर के अभेद्य किले में जन्में संभाजी महाराज, हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज और महारानी सईबाई के ज्येष्ठ पुत्र थे। मात्र दो वर्ष की आयु में माता का निधन हो जाने के कारण, उनका पालन-पोषण उनकी दादी, राजमाता जीजाबाई ने किया। जीजाबाई ने उनके भीतर वही साहस और धर्मनिष्ठा के बीज बोए, जो उन्होंने शिवाजी महाराज में रोपे थे। बचपन से ही 'शंभू राजा' असाधारण बुद्धि के धनी थे।तलवार और कलम का अद्भुत मेल है।संभाजी महाराज के बारे में अक्सर यह धारणा रही है कि वे केवल एक आक्रामक योद्धा थे, किंतु इतिहासकार उनके 'साहित्यिक स्वरूप' को भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। वे मात्र 14 वर्ष की आयु तक संस्कृत, मराठी, हिंदी, ब्रज, फारसी और पुर्तगाली सहित 13 भाषाओं के ज्ञाता बन चुके थे।उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक देन 'बुधभूषण' है। संस्कृत में रचित यह ग्रंथ राजनीतिशास्त्र का एक अनूठा उदाहरण है। इसमें उन्होंने राजा के गुण, मंत्रिमंडल का स्वरूप, किलों का महत्व और कूटनीति पर विस्तार से लिखा है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 'नायिकाभेद', 'नखशिखा' और 'सातसतक' जैसे ग्रंथों के माध्यम से अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय दिया। वे एक ऐसे शासक थे जिनके एक हाथ में शत्रु का काल बनने वाली तलवार थी, तो दूसरे हाथ में समाज को दिशा देने वाली कलम।
9 वर्ष और 120 युद्ध
शिवाजी महाराज के देहांत के बाद 1680 में जब संभाजी महाराज सिंहासन पर बैठे, तो उनके सामने चुनौतियों का अंबार था। एक ओर दिल्ली का क्रूर शासक औरंगजेब अपनी विशाल सेना के साथ दक्षिण को निगलने के लिए तैयार था, तो दूसरी ओर सिद्दी, पुर्तगाली और अंग्रेज निरंतर षड्यंत्र रच रहे थे।संभाजी महाराज के नेतृत्व में मराठा सेना ने वह कर दिखाया जो अकल्पनीय था। अपने 9 वर्षों के छोटे से शासनकाल में उन्होंने लगभग 120 युद्ध लड़े और सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि वे एक भी युद्ध नहीं हारे। उन्होंने औरंगजेब की 5 लाख से अधिक की सेना को 8 लाख वर्ग मील के क्षेत्र में ऐसा उलझाया कि मुगल बादशाह अगले 27 वर्षों तक दिल्ली वापस नहीं लौट सका। उनकी गोरिल्ला युद्ध नीति और किलों की सुरक्षा प्रणाली इतनी सुदृढ़ थी कि मुगलों के बड़े-बड़े सेनापति उनके नाम से कांपते थे।
1689 के प्रारंभ में, संगमेश्वर के पास अपनों के ही विश्वासघात (गणोजी शिर्के के गुप्त मार्ग बताने) के कारण संभाजी महाराज और उनके विश्वासपात्र कवि कलश को मुगलों ने बंदी बना लिया। औरंगजेब को लगा कि 'शिवाजी के बेटे' को झुकाकर वह पूरे दक्षिण पर कब्जा कर लेगा।संभाजी महाराज को लोहे की बेड़ियों में जकड़कर और ऊंट पर उल्टा बिठाकर पूरे बाजार में घुमाया गया। औरंगजेब ने उनके सामने तीन अपमानजनक शर्तें रखीं है।मराठा साम्राज्य के सभी किले और खजाना मुगलों को सौंप दें।उन गद्दारों के नाम बताएं जो गुप्त रूप से मुगलों की मदद कर रहे थे।हिंदू धर्म त्याग कर इस्लाम स्वीकार करें।
शेर के शावक संभाजी ने औरंगजेब की आंखों में आंखें डालकर कहा— "अगर तू मुझे अपनी बेटी भी दे दे और अपना सारा साम्राज्य भी, तब भी मैं अपना धर्म और स्वराज्य नहीं छोड़ूँगा।"
इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास का सबसे काला अध्याय है। औरंगजेब के आदेश पर संभाजी महाराज को ऐसी यातनाएं दी गईं जिन्हें सुनकर आज भी रूह कांप जाती है।
पहले दिन उनकी आंखों में गरम सलाखें डालकर उन्हें अंधा कर दिया गया।उनकी जीभ काट दी गई ताकि वे राम और महादेव का नाम न ले सकें।उनके हाथ और पैर एक-एक करके काटे गए।उनकी चमड़ी उधेड़ दी गई7 और नमक छिड़का गया।40 दिनों तक यह अमानवीय कृत्य चलता रहा। हर दिन उनसे धर्म बदलने को कहा जाता और हर दिन उनका मौन उत्तर 'अस्वीकृति' होता। 11 मार्च 1689 (फाल्गुन अमावस्या) को भीमा नदी के तट पर उनका सिर कलम कर दिया गय।
औरंगजेब को लगा था कि संभाजी की मृत्यु के साथ मराठा साम्राज्य समाप्त हो जाएगा, लेकिन वह गलत था। संभाजी महाराज के इस बलिदान ने पूरे महाराष्ट्र और भारत के हिंदुओं में ऐसी ज्वाला प्रज्वलित की कि हर घर से एक 'संभाजी' पैदा हो गया। मराठों ने 'धर्मयुद्ध' छेड़ दिया और अंततः औरंगजेब की मृत्यु भी इसी दक्कन की मिट्टी में हुई।
आज के दौर में, जब नैतिक मूल्य और राष्ट्रवाद अक्सर राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं, संभाजी महाराज का जीवन एक प्रकाश स्तंभ है। वे हमें सिखाते हैं।केवल हथियार से नहीं, ज्ञान से भी राष्ट्र महान बनता है।पद और प्राण से बड़ा धर्म और राष्ट्र का मान होता है।अपनी जड़ों और परंपराओं के प्रति अडिग रहना ही असली वीरता है।
छत्रपति संभाजी महाराज इतिहास के केवल एक राजा नहीं, बल्कि एक विचार हैं। वे उस अखंड भारत की चेतना हैं जो झुकना नहीं जानती। वे उस साहस का प्रतीक हैं जो मृत्यु को सामने देखकर भी मुस्कुराता है। उनके बलिदान ने भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक अखंडता की रक्षा की।
आज उनके बलिदान दिवस पर, हमारा सबसे बड़ा नमन यही होगा कि हम उनके द्वारा लिखे गए 'बुधभूषण' के ज्ञान को आत्मसात करें और उनके अजेय साहस को अपने चरित्र में उतारें।
"धर्मो रक्षति रक्षितः" के सच्चे मंत्रदाता, धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज को कोटि-कोटि नमन!
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