Sonam Wangchuk Released : जोधपुर जेल से 170 दिन बाद बाहर आए सोनम वांगचुक, केंद्र ने हटाया NSA, पत्नी के साथ लद्दाख रवाना
जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक 170 दिनों की कैद के बाद जोधपुर जेल से रिहा हो गए हैं। केंद्र सरकार ने उन पर लगा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) हटा लिया है। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग और जेल के भीतर के संघर्ष की पूरी कहानी यहाँ देखें।
जोधपुर/लेह, 14 मार्च 2026 – लद्दाख की आवाज और प्रख्यात जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के लिए आज की सुबह आजादी का पैगाम लेकर आई। पिछले 170 दिनों से जोधपुर केंद्रीय कारागार में बंद वांगचुक को शनिवार दोपहर करीब 1:30 बजे रिहा कर दिया गया। केंद्र सरकार द्वारा उनके ऊपर से कड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) हटाने के फैसले के बाद यह रिहाई मुमकिन हुई है। जेल के लोहे के दरवाजों से बाहर निकलते ही सोनम अपनी पत्नी गीतांजलि आंगमो के साथ निजी कार में सवार होकर गंतव्य की ओर निकल गए। यह रिहाई केवल एक व्यक्ति की आजादी नहीं, बल्कि लद्दाख के राजनीतिक भविष्य और संवाद की नई शुरुआत मानी जा रही है।
जेल के भीतर के 170 दिन: कागजी कार्रवाई और रिहाई
सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को हिरासत में लिया गया था और अगले ही दिन उन्हें लद्दाख से जोधपुर जेल शिफ्ट कर दिया गया था।
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लंबा इंतजार: एनएसए के तहत सरकार किसी को भी एक साल तक हिरासत में रख सकती है, जिसमें से सोनम लगभग 6 महीने की अवधि पूरी कर चुके थे।
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औपचारिकताएं: शनिवार सुबह 10 बजे उनकी पत्नी गीतांजलि जेल पहुँचीं। करीब साढ़े तीन घंटे की लंबी कागजी प्रक्रिया के बाद जेल प्रशासन ने उन्हें मुक्त किया।
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चुप्पी में संदेश: रिहाई के वक्त सोनम ने मीडिया से कोई सीधी बात नहीं की, लेकिन उनकी आंखों में थकान और संकल्प दोनों साफ नजर आ रहे थे।
हिंसा के आरोप और NSA का फंदा
सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के पीछे 24 सितंबर 2025 की वह तारीख है, जब लेह की सड़कों पर भारी बवाल हुआ था।
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मांग: लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर उग्र प्रदर्शन हुआ था।
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आरोप: इस हिंसा में 22 पुलिसकर्मियों सहित 45 लोग घायल हुए थे। प्रशासन का आरोप था कि सोनम के उकसावे वाले भाषणों ने भीड़ को भड़काया, जिसके बाद शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन पर एनएसए लगा दिया गया।
लद्दाख का संघर्ष और वांगचुक का 'क्लाइमेट फास्ट'
सोनम वांगचुक का संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई रहा है।
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370 के बाद का लद्दाख: 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बना। शुरुआत में जश्न मना, लेकिन जल्द ही स्थानीय लोगों को अपनी पहचान, जमीन और पर्यावरण के छिन जाने का डर सताने लगा।
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आंदोलन का चेहरा: सोनम वांगचुक ने -30°C की ठंड में खुले आसमान के नीचे कई बार 'क्लाइमेट फास्ट' (उपवास) किया। उनका इतिहास रहा है कि उन्होंने हमेशा गांधीवादी तरीके से अपनी बात रखी। हालांकि, 2025 की हिंसा ने इस आंदोलन के इतिहास में एक नया और विवादित मोड़ जोड़ दिया था। 170 दिनों की यह जेल यात्रा अब लद्दाख के लोकतांत्रिक संघर्ष के इतिहास का एक अमिट हिस्सा बन चुकी है।
सरकार का यू-टर्न: बातचीत से ही निकलेगा समाधान?
केंद्र सरकार का यह फैसला चौंकाने वाला है, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से ठीक पहले आया है।
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शांति की पहल: सरकार ने आधिकारिक बयान में कहा कि लद्दाख में विश्वास बहाली और शांति के लिए एनएसए हटाया गया है।
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उपराज्यपाल का रुख: लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि हिंसा की कोई जगह नहीं है और सभी मुद्दों को 'रचनात्मक संवाद' से हल किया जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट का दबाव: मंगलवार को ही शीर्ष अदालत ने गीतांजलि वांगमो की याचिका पर सुनवाई 17 मार्च तक टाली थी, जिससे सरकार पर कानूनी दबाव बढ़ रहा था।
सोनम वांगचुक की रिहाई लद्दाख की बर्फीली वादियों में एक नई राजनीतिक तपिश लेकर आएगी। जेल से निकलने से दो दिन पहले उन्होंने 'X' (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा था कि लद्दाख की गरिमा के लिए संघर्ष जारी रहेगा। अब देखना यह है कि रिहाई के बाद क्या केंद्र सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच की वह 'दीवार' गिरेगी, जिसने पिछले कई महीनों से बातचीत के रास्ते बंद कर रखे थे। सोनम आजाद हैं, लेकिन लद्दाख की मांगें अभी भी फाइलों में बंद हैं।
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