Jamshedpur कवि सम्मेलन: अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर बहुभाषी कवियों ने बिखेरी साहित्य की खुशबू!
जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर बहुभाषी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और संथाली के कवियों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों से समां बांधा। पढ़ें इस शानदार साहित्यिक आयोजन की पूरी खबर!

जमशेदपुर – भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और पहचान का प्रतीक भी होती है। इसी विचारधारा को मजबूती देने के लिए जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर हिंदी और अंग्रेजी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में एक बहुभाषी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में विभिन्न भाषाओं के प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने हिस्सा लिया और अपनी सशक्त रचनाओं से समां बांधा।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मातृभाषा दिवस क्यों है खास?
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की शुरुआत यूनेस्को (UNESCO) द्वारा 1999 में की गई थी, लेकिन इसके पीछे एक बेहद संवेदनशील कहानी छिपी है। 21 फरवरी 1952 को बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में "भाषा आंदोलन" के दौरान ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने बांग्ला भाषा के अधिकार के लिए प्रदर्शन किया था। इस दौरान पुलिस फायरिंग में कई छात्र शहीद हो गए। उनके बलिदान को सम्मान देने के लिए यूनेस्को ने इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में घोषित किया।
कार्यक्रम का आगाज: दीप प्रज्ज्वलन और सम्मान समारोह
कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अमर सिंह ने मुख्य अतिथि और कवियों का स्मृति चिह्न देकर स्वागत किया। इसके बाद अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने मातृभाषा के संरक्षण और रोजगार से जोड़ने पर जोर दिया। डॉ. संजय यादव ने मातृभाषा के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि अपनी भाषा में लिखने-पढ़ने से ज्ञान की गहराई तक पहुंच आसान होती है।
कवि सम्मेलन की झलकियां: जब कविता बनी भाषा की शक्ति!
इस कवि सम्मेलन में हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और संथाली भाषा के प्रसिद्ध कवियों ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
हिंदी कविता: डॉ. लता मानकर प्रियदर्शनी ने हिंदी कविता का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी भावनात्मक और ओजस्वी कविताएं सुनाईं। उनकी कविताओं में समाज, संस्कृति और मातृभाषा के प्रति प्रेम झलक रहा था।
अंग्रेजी कविता: डॉ. बसुधरा राय ने अंग्रेजी भाषा को भारतीय संदर्भ में रखते हुए इसे मातृभाषा के रूप में स्वीकारने की बात कही। उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए आधुनिक समाज की संवेदनाओं को व्यक्त किया।
संथाली गीत: गणेश चंद्र मुर्मू ने संथाली भाषा को बढ़ावा देने की आवश्यकता जताई और कुछ संथाली लोकगीतों का शानदार प्रस्तुतीकरण किया। उनकी प्रस्तुति पर दर्शक झूमने पर मजबूर हो गए।
उर्दू ग़ज़ल: अहमद बद्र ने हिंदी और उर्दू के बीच की दीवार को नकारते हुए अपनी ग़ज़लें और शेर सुनाए। उनकी शायरी ने महफ़िल में एक अलग ही रंग घोल दिया।
संचालन और समापन: साहित्य की अनमोल शाम
कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रियंका सिंह ने किया, जबकि काव्य सत्र का संचालन संजय सोलोमन ने संभाला। कार्यक्रम में डॉ. नीता कुमारी, डॉ. अंतर कुमारी, डॉ. स्वाति सोरेन, डॉ. शालिनी शर्मा समेत कई विद्वानों और छात्रों ने भाग लिया। समापन में डॉ. रुचिका तिवारी ने सभी प्रतिभागियों और श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापन दिया।
मातृभाषा को सहेजने की जरूरत!
इस कार्यक्रम ने स्पष्ट किया कि मातृभाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी है। बदलते समय में जहां विदेशी भाषाओं का प्रभाव बढ़ रहा है, वहीं अपनी भाषा का सम्मान और इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है। संस्कृति और साहित्य की इस शानदार शाम ने यह संदेश दिया कि भाषा की शक्ति को कम नहीं आंका जा सकता!
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