Ranchi Surrender: नक्सलियों ने सरकार के आगे टेके घुटने, मांगी शांति वार्ता!
झारखंड में ऑपरेशन कगार से घबराए नक्सली! 400 से ज्यादा माओवादी ढेर, अब युद्ध विराम और शांति वार्ता की मांग। क्या सरकार मानेगी या खत्म होगा नक्सलवाद? पढ़ें पूरी खबर!

झारखंड में नक्सलियों की सालों की हुकूमत अब ढहती नजर आ रही है। रांची में जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में भाकपा (माओवादी) के केंद्रीय कमेटी प्रवक्ता अभय ने भारत सरकार और झारखंड सरकार से अपील की है कि नक्सल विरोधी ऑपरेशन कगार को रोका जाए और शांति वार्ता की जाए।
यह वही माओवादी हैं, जो दशकों से हिंसा और खून-खराबे के जरिए सत्ता को चुनौती देते रहे हैं। लेकिन अब जब सरकार के ऑपरेशन कगार ने उनके मंसूबों को चकनाचूर कर दिया है, तो वे युद्ध विराम की मांग कर रहे हैं। क्या यह वाकई शांति की पहल है या फिर किसी नई साजिश की शुरुआत?
ऑपरेशन कगार: जिसने माओवादियों की नींद उड़ा दी!
सरकार ने झारखंड समेत छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में नक्सलियों के सफाए के लिए ऑपरेशन कगार नाम से एक विशेष अभियान शुरू किया है।
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इस ऑपरेशन के तहत सैकड़ों माओवादी मारे गए।
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नक्सली ठिकानों पर छापेमारी तेज हुई।
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बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुईं।
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नक्सल गढ़ों में सुरक्षाबलों की तैनाती बढ़ा दी गई।
इस ऑपरेशन से घबराए माओवादी अब संघर्ष विराम और शांति वार्ता की मांग कर रहे हैं। लेकिन क्या यह सरकार के लिए नक्सलवाद के खात्मे का सुनहरा मौका है?
400 से ज्यादा माओवादी ढेर, संगठन हुआ कमजोर!
माओवादी प्रवक्ता अभय के बयान के मुताबिक, ऑपरेशन कगार के तहत पूरे भारत में अब तक 400 से अधिक नक्सली मारे जा चुके हैं।
सैकड़ों नक्सली गिरफ्तार हुए।
महिला माओवादियों पर भी हमले का दावा।
कई नागरिकों की अवैध गिरफ्तारियों का आरोप।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या नक्सली अब शांति वार्ता के लिए वाकई तैयार हैं या यह सिर्फ एक नया छलावा है?
शांति वार्ता या नई चाल?
माओवादी संगठनों का इतिहास बताता है कि वे जब कमजोर होते हैं, तभी शांति वार्ता का प्रस्ताव रखते हैं।
2010 में छत्तीसगढ़ और झारखंड में ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौरान भी नक्सलियों ने ऐसा ही किया था।
2013 में आंध्र प्रदेश में शांति वार्ता के नाम पर माओवादियों ने खुद को फिर से संगठित किया था।
अब 2025 में ऑपरेशन कगार से डरकर फिर वही कहानी दोहरा रहे हैं?
अगर सरकार इस बार झांसे में नहीं आई और ऑपरेशन जारी रहा, तो शायद भारत से नक्सलवाद का नामो-निशान मिट सकता है!
सरकार के सामने बड़ा सवाल: ऑपरेशन रोके या और तेज करे?
अगर सरकार नक्सलियों की मांग मानती है और सैन्य कार्रवाई रोक देती है, तो हो सकता है कि नक्सली फिर से regroup होकर नए सिरे से हमले की तैयारी करें।
लेकिन अगर सरकार ऑपरेशन जारी रखती है, तो संभव है कि झारखंड, छत्तीसगढ़ और अन्य प्रभावित राज्यों से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया हो जाए।
क्या कहते हैं सुरक्षा विशेषज्ञ?
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सली वार्ता के बहाने खुद को दोबारा संगठित करने की कोशिश कर सकते हैं।
"सरकार को ऑपरेशन कगार को तेज करना चाहिए, ताकि नक्सलवाद की जड़ पूरी तरह खत्म हो सके।" - पूर्व IPS अधिकारी।
"शांति वार्ता के बहाने नक्सली सुरक्षाबलों पर फिर से हमला कर सकते हैं।" - सुरक्षा विश्लेषक।
"सरकार को नक्सलवाद पर कोई समझौता नहीं करना चाहिए।" - गृह मंत्रालय के सूत्र।
अब आगे क्या?
सरकार को जल्द फैसला लेना होगा कि वह ऑपरेशन जारी रखे या नक्सलियों से वार्ता करे।
अगर ऑपरेशन जारी रहता है, तो नक्सलवाद के खात्मे की संभावना बढ़ जाएगी।
अगर बातचीत होती है, तो यह माओवादियों के regroup होने का मौका बन सकता है।
अब नक्सलवाद के अंत का समय?
झारखंड और देश के अन्य हिस्सों में नक्सली कमजोर पड़ रहे हैं। ऑपरेशन कगार के जरिए सुरक्षाबलों ने उन्हें घुटनों पर ला दिया है।
अब सवाल है कि क्या सरकार इस मौके का फायदा उठाकर नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म कर देगी? या फिर शांति वार्ता के नाम पर उन्हें दोबारा खड़ा होने का मौका मिलेगा?
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