Kamalpur Horror: आधी रात को खुली छत से नीचे गिरीं अमृता महतो, रीढ़ की हड्डी टूटी और नस दबने से टीएमएच में हालत बेहद नाजुक
कमलपुर थाना क्षेत्र के राहेरडीह गांव में गर्मी से राहत पाने के लिए छत पर सो रही महिला अमृता महतो आधी रात को नीचे गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गई हैं। रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर और टीएमएच में चल रहे वेंटिलेटर स्तर के इलाज की पूरी ऑन-फील्ड लाइव रिपोर्ट यहाँ देखें।
कमलपुर/जमशेदपुर, 26 मई 2026 – पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) जिले के पटमदा-कमलपुर अंचल में चिलचिलाती और रिकॉर्ड तोड़ भीषण गर्मी के बीच एक बेहद दर्दनाक और रूह कँपा देने वाला घरेलू हादसा सामने आया है। कमलपुर थाना क्षेत्र के बनकुंचिया पंचायत अंतर्गत राहेरडीह गांव में रविवार की आधी रात को एक 37 वर्षीय महिला अपने ही घर की खुली छत से अनियंत्रित होकर नीचे कंक्रीट के फर्श पर गिर गईं। इस खौफनाक हादसे में महिला की रीढ़ की हड्डी का ऊपरी हिस्सा (Spine Chords) कतरनी की तरह टूट गया है और रीढ़ की मुख्य नस दब जाने के कारण वह पूरी तरह से पैरालिसिस (लकवा) और अचेत अवस्था में पहुंच गई हैं। घायल महिला की पहचान स्थानीय निवासी गरीब किसान महेंद्र महतो की पत्नी अमृता महतो (37 वर्ष) के रूप में हुई है। एमजीएम अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा न्यूरो सर्जरी का क्रिटिकल मामला बताकर हाथ खड़े कर देने के बाद, परिजनों ने उन्हें बिष्टुपुर स्थित टाटा मेन अस्पताल (TMH) के न्यूरो क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती कराया है, जहां उनकी जिंदगी और मौत के बीच सांसे अटक गई हैं।
हादसे की लाइव इनसाइड स्टोरी: रात के 12 बजे का वो नींद का झोंका, छत की सीढ़ियों पर फिसला पैर
कमलपुर थाना पुलिस और टीएमएच अस्पताल परिसर में मौजूद पीड़ित परिवार के सदस्यों से मिली लाइव ऑन-फील्ड इनपुट के अनुसार, यह घटना पूरी तरह से मौसम की मार और मानवीय असावधानी का मिलाजुला नतीजा है।
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गर्मी से बचने छत पर सोया था परिवार: इन दिनों पूरे कोल्हान और जमशेदपुर में पारा 45 डिग्री के पार चल रहा है। राहेरडीह गांव में भी भीषण उमस और बिजली की कटौती के कारण रविवार की रात महेंद्र महतो अपनी पत्नी अमृता और बच्चों के साथ घर की खुली छत पर सोए हुए थे।
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नींद की हालत में बिगड़ा संतुलन: रात करीब 12 बजे के आस-पास अमृता महतो लघुशंका (वॉशरुम) के लिए नीचे उतरने लगीं। नीचे से वापस जब वह गहरी नींद और अंधेरे के बीच वापस छत की ओर लौट रही थीं, तभी अचानक सीढ़ियों के अंतिम छोर या खुली छत के किनारे उनका संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया।
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कंक्रीट पर गिरते ही मची चीख-पुकार: अमृता सीधे सिर और पीठ के बल नीचे पक्के फर्श पर आ गिरीं। गिरने की भारी आवाज और चीख सुनकर गहरी नींद में सोए पति महेंद्र और अन्य परिजन तुरंत नीचे दौड़े। उन्होंने अमृता को अचेत और खून से लथपथ अवस्था में पाया।
मेडिकल बुलेटिन और आर्थिक संकट: एमजीएम से रिम्स और फिर टीएमएच; गरीब किसान पर टूटा दुखों का पहाड़
अमृता महतो की चिकित्सकीय स्थिति और उनके इलाज के लिए चल रहे संघर्ष की इनसाइड स्टोरी बेहद मार्मिक है।
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रिम्स का रेफरल और टीएमएच में एमआरआई: सोमवार सुबह परिजन उन्हें लेकर साकची स्थित एमजीएम अस्पताल (MGM Hospital) पहुंचे। वहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने कहा कि रीढ़ की हड्डी टूटने के कारण यह एडवांस न्यूरो सर्जरी का मामला है, इसलिए तत्काल रिम्स (RIMS, रांची) ले जाएं। लेकिन हालत ज्यादा नाजुक होने के कारण परिजनों ने उन्हें निजी अस्पताल टीएमएच (TMH) में भर्ती कराया। एमआरआई (MRI) जांच में रीढ़ की एक मुख्य नस के पूरी तरह ब्लॉक होने की पुष्टि हुई है।
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जमीन बेचने की नौबत: अमृता के पति महेंद्र महतो गांव के एक बेहद छोटे और गरीब किसान हैं। टीएमएच जैसे बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल में न्यूरो सर्जरी और आईसीयू (ICU) के खर्च को वहन करना उनके लिए आर्थिक रूप से एक अभूतपूर्व और बड़ी चुनौती बन गया है, जिससे पूरे गांव में चिंता की लहर है।
प्रधानमंत्री आवास योजना में 'पैरापेट वॉल' की अनिवार्यता और 'मुख्यमंत्री गंभीर बीमारी सहायता कोष' का सरलीकरण समय की मांग
कमलपुर के राहेरडीह गांव में अमृता महतो के साथ हुआ यह हादसा आंखें खोलने वाला है। भीषण गर्मी की मार और अधूरी सुरक्षा व्यवस्था ने एक हंसते-खेलते किसान परिवार को बर्बादी के कगार पर ला खड़ा किया है। केवल हमदर्दी जताने से काम नहीं चलेगा। पूर्वी सिंहभूम के जिला प्रशासन और स्थानीय विधायक को तुरंत संज्ञान लेते हुए पीड़ित परिवार को 'मुख्यमंत्री गंभीर बीमारी सहायता योजना' (Mukhyamantri Gambhir Bimari Sahayata Yojana) के तहत टीएमएच अस्पताल में कैशलेस इलाज की व्यवस्था करानी होगी। इसके साथ ही, सरकारी स्तर पर यह नीतिगत बदलाव करना होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाले किसी भी पक्के मकान या सरकारी आवास योजना में तब तक अंतिम भुगतान न किया जाए, जब तक छत पर 3 फीट की सुरक्षा दीवार (मुंडेर) का निर्माण पूरा न हो। जब तक हम ग्रामीण आर्किटेक्चर की इस ऐतिहासिक और जानलेवा विफलता को दूर नहीं करेंगे, तब तक कोल्हान की मासूम माताओं और बहनों को भीषण गर्मी के बीच अपनी रीढ़ की हड्डी तुड़वाकर इस खूनी इतिहास का हिस्सा बनने पर मजबूर होना पड़ेगा।
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