Jamshedpur Action : मनीफीट चौक पर दर्जन भर दुकानें जमींदोज, सामान निकालने तक की मोहलत नहीं, दलालों और अफसरों के 'गंदे खेल' पर भड़के लोग
जमशेदपुर के मनीफीट चौक पर अंचल कार्यालय ने जबरदस्त अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया है। 25 साल पुरानी दुकानों पर बुलडोजर चलने से भारी नुकसान हुआ है। अधिकारियों और जमीन दलालों की मिलीभगत के आरोपों के बीच दुकानदारों का धरना प्रदर्शन शुरू हो गया है। पूरी रिपोर्ट यहाँ देखें।
जमशेदपुर/मनीफीट, 6 मार्च 2026 – लौहनगरी जमशेदपुर में शुक्रवार को मनीफीट चौक रणक्षेत्र में तब्दील हो गया। जमशेदपुर अंचल कार्यालय की टीम भारी पुलिस बल के साथ बुलडोजर लेकर पहुँची और देखते ही देखते लगभग दर्जन भर दुकानों को मिट्टी में मिला दिया। इस अचानक हुई कार्रवाई से इलाके में अफरा-तफरी मच गई। कई दुकानदार अपनी आंखों के सामने बरसों की कमाई को मलबे में तब्दील होते देखते रहे, क्योंकि उन्हें दुकान के भीतर रखा सामान निकालने तक का पर्याप्त समय नहीं मिला।
दोपहर 1:00 बजे का 'हल्ला बोल'
जानकारी के अनुसार, दोपहर करीब एक बजे टाटा स्टील और जेएनएसी (JNAC) के अधिकारियों के साथ अंचल अधिकारी (CO) मनोज कुमार मनीफीट चौक पहुँचे।
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अचानक कार्रवाई: दुकानदारों का आरोप है कि उन्हें महज 2 मार्च को नोटिस दिया गया था। इतनी जल्दी बुलडोजर चलने की उम्मीद किसी को नहीं थी।
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मलबे में दबा सामान: जब बुलडोजर की गर्जना शुरू हुई, तो दुकानदार आनन-फानन में अपना स्टॉक बाहर निकालने लगे। लेकिन कई दुकानें तब जमींदोज कर दी गईं जब उनमें सामान भरा हुआ था।
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ढाबा और कारोबार ध्वस्त: अभियान के दौरान एक प्रसिद्ध ढाबे को भी तोड़ दिया गया। ढाबा संचालक ने पास की खाली जमीन पर गिट्टी और बालू का भंडार कर रखा था, जिसे तत्काल हटाने का फरमान सुनाया गया है।
अफसर-दलाल गठजोड़: जनता का गंभीर आरोप
बुलडोजर की कार्रवाई के बीच लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। स्थानीय निवासियों ने सिस्टम की पूरी कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं:
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अधिकारी तब कहाँ थे?: लोगों का कहना है कि जब ये दुकानें पिछले 25 सालों से बन रही थीं और चल रही थीं, तब विभाग सो रहा था क्या?
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मिलीभगत का खेल: आरोप है कि अंचल के कुछ अधिकारी पहले दलालों के माध्यम से सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करवाते हैं, उसकी खरीद-फरोख्त में हिस्सा लेते हैं और बाद में वही अधिकारी 'ईमानदार' बनकर बुलडोजर लेकर पहुँच जाते हैं।
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आम आदमी की बलि: इस पूरे खेल में जमीन दलाल और अधिकारी आर्थिक लाभ कमा लेते हैं, जबकि अंत में गाज आम आदमी और छोटे दुकानदारों पर गिरती है।
मनीफीट और जमशेदपुर में जमीन विवाद का इतिहास
जमशेदपुर की भौगोलिक और कानूनी बनावट इसे देश के अन्य शहरों से अलग बनाती है।
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टाटा लीज एरिया और गैर-मजरुआ जमीन: शहर का एक बड़ा हिस्सा टाटा स्टील की लीज पर है, जबकि शेष बस्तियां अंचल और जेएनएसी के दायरे में आती हैं। मनीफीट जैसे इलाकों में 'सेटलमेंट' और 'अतिक्रमण' के बीच एक महीन रेखा रही है।
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ऐतिहासिक संघर्ष: जमशेदपुर में अतिक्रमण हटाने का इतिहास दशकों पुराना है। 1990 के दशक से ही यहाँ बस्तियों के नियमितीकरण और सरकारी जमीन से कब्जे हटाने को लेकर प्रशासन और जनता के बीच 'चूहे-बिल्ली' का खेल चलता रहा है।
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कोर्ट का सख्त रुख: बताया जा रहा है कि मनीफीट की यह कार्रवाई कोर्ट के आदेश के बाद की गई है, जिसके कारण अधिकारियों के पास पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था।
धरने पर बैठे दुकानदार: "हमें उड़ा दिया गया"
भारी पुलिस बल की मौजूदगी के कारण दुकानदार मौके पर तो अधिक विरोध नहीं कर सके, लेकिन कार्रवाई खत्म होने के बाद सभी दुकानदार सड़क पर धरने पर बैठ गए हैं।
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मांग: दुकानदारों का कहना है कि वे यहाँ 25 सालों से व्यापार कर रहे थे। उन्हें सामान हटाने और वैकल्पिक व्यवस्था करने की मोहलत मिलनी चाहिए थी।
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दावा: दुकानदारों ने इस कार्रवाई को गैर-कानूनी और अन्यायपूर्ण करार दिया है।
कार्रवाई का विवरण: एक नजर में
| विवरण | प्रमुख जानकारी |
| स्थान | मनीफीट चौक, जमशेदपुर |
| नेतृत्व | अंचल अधिकारी (CO) मनोज कुमार |
| नुकसान | दर्जन भर दुकानें, एक ढाबा, गिट्टी-बालू स्टॉक |
| टीम में शामिल | अंचल कार्यालय, JNAC, टाटा स्टील अधिकारी |
| विरोध का तरीका | शांतिपूर्ण धरना और नारेबाजी |
सुलगते सवाल और अनिश्चित भविष्य
मनीफीट चौक पर चले बुलडोजर ने केवल कंक्रीट की दीवारें नहीं गिराईं, बल्कि कई परिवारों के रोजगार को भी मलबे में दबा दिया है। कोर्ट के आदेश का पालन करना प्रशासन की मजबूरी हो सकती है, लेकिन क्या मानवीय आधार पर दुकानदारों को अपना सामान बचाने का मौका नहीं मिलना चाहिए था? और सबसे बड़ा सवाल—क्या उन दलालों और लापरवाह अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी जिन्होंने इस अतिक्रमण को पनपने दिया?
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