Adityapur Encroachment: सरकारी ज़मीन पर घेराबंदी का बवाल, जनता बनाम समिति का बड़ा टकराव!

आदित्यपुर में ज़मीन घेराबंदी पर मचा बवाल! आदिवासी कल्याण समिति और स्थानीय लोगों के बीच टकराव, प्रशासन जांच में जुटा। जानिए पूरा मामला।

Apr 2, 2025 - 16:27
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Adityapur Encroachment: सरकारी ज़मीन पर घेराबंदी का बवाल, जनता बनाम समिति का बड़ा टकराव!
Adityapur Encroachment: सरकारी ज़मीन पर घेराबंदी का बवाल, जनता बनाम समिति का बड़ा टकराव!

आदित्यपुर में एक ज़मीन को लेकर जबरदस्त विवाद छिड़ गया है। आदिवासी कल्याण समिति द्वारा सरकारी ज़मीन की घेराबंदी का स्थानीय लोगों ने जमकर विरोध किया। मामला इतना गरमा गया कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के नेता भुगलु उर्फ डब्बा सोरेन को दखल देना पड़ा। उन्होंने घेराबंदी को गलत बताते हुए कहा कि जिस ज़मीन को समिति अपना बता रही है, वहां पहले गंदगी का अंबार लगा था। अब जब नगर निगम ने वहां सड़क बना दी, तो समिति उसे घेरने में जुट गई है। मामला अब प्रशासन के पाले में चला गया है और जांच के आदेश दिए गए हैं।

सरकारी ज़मीन या निजी हक़? पेपर दिखाओ, वरना घेराबंदी रोको!

समिति के सदस्य प्रकाश पूर्ति ने दावा किया कि घेराबंदी पूरी तरह वैध है। उनका कहना है कि यदि प्रशासन के पास इस ज़मीन से जुड़े कोई दस्तावेज़ हैं, तो उन्हें पेश किया जाए। सिर्फ़ मौखिक आदेश से वे काम रोकने वाले नहीं हैं। वहीं, समिति के अन्य सदस्यों ने बताया कि झारखंड सरकार की ओर से 65 डिसमिल ज़मीन समिति को आवंटित की गई थी, लेकिन गंदगी और अनदेखी के कारण उसका सीमांकन नहीं हो सका था। अब जब वे अपनी ज़मीन घेर रहे हैं, तो कुछ लोग बेवजह विरोध कर रहे हैं।

प्रशासन की दखल, लेकिन घेराबंदी जारी!

स्थानीय विरोध को देखते हुए गम्हरिया अंचल कार्यालय के कर्मचारी चंद्रशेखर मौके पर पहुंचे और घेराबंदी रुकवा दी। लेकिन जैसे ही वे वहां से गए, समिति ने दोबारा काम शुरू कर दिया। इस पर अंचल अधिकारी कुमार अरविंद बेदिया ने कहा कि समिति को ज़मीन के वैध कागज़ात दिखाने होंगे। अगर वे दस्तावेज़ पेश नहीं कर सके, तो घेराबंदी अवैध मानी जाएगी और उचित कार्रवाई होगी।

क्या है इस ज़मीन का इतिहास? क्यों उठा विवाद?

आदित्यपुर में यह विवाद कोई नया नहीं है। झारखंड के कई हिस्सों में सरकारी ज़मीनों के अतिक्रमण की घटनाएं आम हैं। कई बार संगठनों या स्थानीय समितियों को ज़मीन आवंटित कर दी जाती है, लेकिन सीमांकन नहीं होने के कारण विवाद खड़ा हो जाता है। आदित्यपुर का यह मामला भी ऐसा ही प्रतीत होता है, जहां एक ओर समिति अपने हक़ का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर स्थानीय लोग इसे सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा मान रहे हैं।

अब आगे क्या? प्रशासन की जांच पर टिकी निगाहें

अब इस पूरे विवाद का हल अंचल प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करेगा। यदि समिति अपने दस्तावेज़ दिखा पाई, तो घेराबंदी जारी रहेगी, वरना इसे अतिक्रमण मानते हुए कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, ज़मीन पर घेराबंदी जारी है, और स्थानीय लोगों का विरोध भी थमा नहीं है। देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या फ़ैसला लेता है और क्या आदित्यपुर में एक और भूमि विवाद का नया अध्याय लिखा जाएगा या नहीं।

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Nihal Ravidas निहाल रविदास, जिन्होंने बी.कॉम की पढ़ाई की है, तकनीकी विशेषज्ञता, समसामयिक मुद्दों और रचनात्मक लेखन में माहिर हैं।