UGC Protest: यूजीसी के 'काले कानून' पर जमशेदपुर में महासंग्राम, सवर्ण समाज का उपायुक्त दफ्तर पर आक्रोश मार्च, सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद और तेज हुई विरोध की आग
जमशेदपुर में यूजीसी के नए 'इक्विटी रेगुलेशंस' के खिलाफ सवर्ण समाज द्वारा निकाले गए विशाल आक्रोश मार्च और प्रधानमंत्री को भेजे गए ज्ञापन की पूरी रिपोर्ट यहाँ मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट की रोक और कानून की उन 10 बड़ी कमियों का पूरा विवरण विस्तार से पढ़िए वरना आप सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ रची गई इस 'साजिश' की अहम जानकारी से चूक जाएंगे।
जमशेदपुर, 29 जनवरी 2026 – लौहनगरी जमशेदपुर की सड़कों पर आज सवर्ण समाज का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा। प्रस्तावित 'यूजीसी विधेयक 2026' को 'काला कानून' और सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ एक 'प्रतिशोधात्मक हथियार' करार देते हुए सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों ने संयुक्त रूप से उपायुक्त (DC) श्री कर्ण सत्यार्थी के कार्यालय तक आक्रोश मार्च निकाला। हाथों में तख्तियां और जुबां पर न्याय की मांग लिए करीब एक हजार से अधिक लोगों ने प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस कानून पर लगाई गई तात्कालिक रोक का जोरदार स्वागत किया गया, लेकिन समाज ने चेतावनी दी कि जब तक इस विधेयक को पूरी तरह वापस नहीं लिया जाता, आंदोलन और उग्र होगा।
आंदोलन का चेहरा: एकजुट हुआ सवर्ण समाज
झारखंड क्षत्रिय संघ सह सवर्ण महासभा के अध्यक्ष शम्भू नाथ सिंह के नेतृत्व में आयोजित इस मार्च में शहर के प्रबुद्ध वर्गों ने शिरकत की।
-
प्रमुख उपस्थिति: ब्राह्मण समाज से कमल किशोर व डीके मिश्रा, ब्रह्मर्षि समाज के अध्यक्ष श्री राम नारायण शर्मा, कायस्थ महासभा के अजय श्रीवास्तव व चंद्रगुप्त सिंह, और जिला परिषद सदस्य श्रीमती कविता परमार समेत कई समाजसेवियों ने अपनी आवाज बुलंद की।
-
शम्भू नाथ सिंह का बयान: "यह कानून शिक्षा की समरसता को खत्म करने वाला है। हम इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे। सुप्रीम कोर्ट की रोक हमारी पहली जीत है, लेकिन लड़ाई अभी लंबी है।"
विधेयक की वो 10 कमियां, जिनसे मचा है हड़कंप
सवर्ण समाज ने उपायुक्त को सौंपे ज्ञापन में यूजीसी विधेयक 2026 की उन गंभीर खामियों को उजागर किया है, जो सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए काल साबित हो सकती हैं:
-
पूर्वाग्रह से ग्रसित: विधेयक मानकर चलता है कि केवल सामान्य वर्ग ही भेदभाव करता है। इसमें सामान्य वर्ग के साथ होने वाले भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है।
-
'अंतर्निहित' शब्द का मायाजाल: धारा 3 (1) ङ में भेदभाव की परिभाषा में 'अंतर्निहित' (Implicit) शब्द जोड़ा गया है। इसे परिभाषित करना असंभव है, जिसका उपयोग सवर्ण छात्रों को झूठे मामलों में फंसाने के लिए किया जा सकता है।
-
गोपनीय शिकायत (धारा 6): शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखने का प्रावधान छात्र राजनीति और निजी प्रतिशोध के लिए घातक सिद्ध होगा।
-
समता समिति से सवर्ण बाहर: धारा 5 (7) के अनुसार, इस निर्णायक समिति में सामान्य वर्ग का कोई अनिवार्य प्रतिनिधित्व नहीं होगा।
-
दोषी साबित होने तक निर्दोष नहीं: इसमें शिकायत होते ही छात्र को अपराधी मान लिया जाता है, ठीक पॉक्सो एक्ट की तरह।
-
झूठी शिकायत पर कोई जुर्माना नहीं: पुराने नियमों में गलत आरोप लगाने पर जुर्माने का प्रावधान था, जिसे अब हटा दिया गया है।
-
इक्विटी स्क्वाड (Equity Squad): यह समूह कॉलेजों के हर कोने में सवर्ण छात्रों पर 'संदिग्धों' की तरह निगरानी रखेगा।
-
स्वायत्तता पर प्रहार: यह विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता छीनकर केंद्र का नियंत्रण बढ़ाता है।
-
त्वरित और जल्दबाज न्याय: 24 घंटे में कार्रवाई और 15 दिन में रिपोर्ट का दबाव 'न्याय का दफन' करने जैसा है।
-
दंडात्मक शक्तियां: अधिकारियों को छात्रों के खिलाफ मनमानी अनुशासनात्मक कार्रवाई की असीमित शक्ति दी गई है।
यूजीसी विवाद: जमशेदपुर से दिल्ली तक का घटनाक्रम (Protest Snapshot)
| प्रमुख बिंदु | स्थिति / विवरण (Details) |
| विरोध का नेतृत्व | झारखंड क्षत्रिय संघ व सवर्ण महासभा |
| ज्ञापन प्राप्तकर्ता | उपायुक्त श्री कर्ण सत्यार्थी (प्रधानमंत्री के नाम) |
| प्रतिभागियों की संख्या | 1000 से अधिक लोग |
| मुख्य मांग | यूजीसी विधेयक 2026 को तुरंत वापस लिया जाए |
| कानूनी मोड़ | सुप्रीम कोर्ट द्वारा फिलहाल नियमों पर रोक |
इतिहास का पन्ना: यूजीसी और आरक्षण के बाद का नया संघर्ष
भारत में उच्च शिक्षा का इतिहास 1956 में यूजीसी की स्थापना के साथ शुरू हुआ। इतिहास गवाह है कि 1990 के मंडल कमीशन के बाद भारतीय कैंपसों में पहली बार जातिगत ध्रुवीकरण देखा गया था। उस समय भी सवर्ण छात्रों ने सड़कों पर उतरकर अपनी योग्यता और अधिकारों की लड़ाई लड़ी थी। 2012 के यूजीसी नियमों ने एक संतुलन बनाने की कोशिश की थी, लेकिन 2026 का यह नया विधेयक सवर्ण समाज को 1980 के दशक के उस दौर की याद दिला रहा है जहाँ उन्हें अपनी पहचान के कारण ही 'आरोपी' के कटघरे में खड़ा महसूस होता था। जमशेदपुर का यह आक्रोश मार्च केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक डर का परिणाम है जो योग्यता (Merit) और समानता के नाम पर सवर्णों को हाशिए पर धकेलने की कोशिशों के खिलाफ उपजता रहा है।
समाज की दो-टूक: "हथियार नहीं, कवच चाहिए"
स्वर्ण महासभा की प्रवक्ता श्रीमती मंजू सिंह और समाजसेवी शिवशंकर सिंह ने कहा कि वे शिक्षा में सुधार के विरोधी नहीं हैं, लेकिन सुधार के नाम पर छात्रों के विरुद्ध 'प्रतिशोधात्मक तंत्र' खड़ा करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने मांग की कि इस विधेयक को तुरंत वापस लिया जाए और शिक्षकों व छात्रों के साथ व्यापक परामर्श किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की रोक एक बड़ी जीत
जमशेदपुर में हुए इस विशाल प्रदर्शन के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियमों पर लगाई गई रोक की खबर ने आंदोलनकारियों में नया जोश भर दिया है। सवर्ण समाज ने स्पष्ट किया है कि यदि भविष्य में इस काले कानून को फिर से थोपने की कोशिश हुई, तो पूरा भारत इसका माकूल जवाब देगा।
What's Your Reaction?


