Manmath nath Legend: काकोरी कांड का वो जांबाज जिसकी पिस्टल और कलम दोनों से कांपती थी अंग्रेजी हुकूमत, 13 की उम्र में जेल जाने वाले इस योद्धा का सच
मन्मथनाथ गुप्त का जन्म आज ही के दिन वाराणसी में हुआ था। काकोरी कांड की उस ऐतिहासिक ट्रेन डकैती और भगत सिंह के साथ उनके वैचारिक रिश्तों की पूरी दास्तां यहाँ मौजूद है वरना आप क्रांतिकारी आंदोलन के सबसे बड़े 'कलम के सिपाही' के बलिदान को जानने से चूक जाएंगे।
वाराणसी, 7 फरवरी 2026 – आज भारतीय क्रांति के उस 'महानायक' का जन्मदिन है जिसने एक हाथ में पिस्तौल उठाई तो दूसरे हाथ में कलम थामकर आजादी के इतिहास को अमर कर दिया। मन्मथनाथ गुप्त, जिनका जन्म 7 फरवरी, 1908 को वाराणसी की पवित्र धरती पर हुआ था, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन विरले योद्धाओं में से थे जिन्होंने न केवल युद्ध लड़ा, बल्कि उस युद्ध की विचारधारा को भविष्य के लिए सहेज कर रखा। वे चंद्रशेखर आजाद के विश्वासपात्र थे और भगत सिंह के वैचारिक साथी। आज उनकी जयंती पर देश उस क्रांतिकारी को याद कर रहा है जिसे इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे।
पिस्तौल और कलम का संगम: मात्र 13 साल की उम्र में जेल
मन्मथनाथ गुप्त का बचपन खिलौनों से नहीं, बल्कि देशभक्ति के किस्सों से बीता था।
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असहयोग आंदोलन: जब 1921 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो 13 साल के मन्मथनाथ ने स्कूल छोड़ दिया और सड़कों पर उतर आए। उन्हें जेल भेज दिया गया, लेकिन जब चौरी-चौरा कांड के बाद गांधी जी ने आंदोलन वापस लिया, तो उनका मोहभंग हो गया।
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HRA में प्रवेश: गांधीवादी रास्ते को छोड़कर वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में शामिल हो गए और राम प्रसाद बिस्मिल व आजाद के साथ सशस्त्र क्रांति का बिगुल फूंक दिया।
काकोरी कांड: वो एक गोली जिसने बदल दी जिंदगी
9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के पास हुआ काकोरी ट्रेन एक्शन भारतीय इतिहास की सबसे साहसी घटनाओं में से एक है। मन्मथनाथ गुप्त इस मिशन के मुख्य रणनीतिकार थे।
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अनचाहा हादसा: डकैती के दौरान मन्मथनाथ से दुर्घटनावश एक गोली चल गई, जिससे एक यात्री की मौत हो गई। इस एक घटना ने पूरे मामले को 'मर्डर केस' बना दिया।
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बच गई जान: बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और रोशन सिंह को फांसी हुई, लेकिन मन्मथनाथ की उम्र कम होने के कारण उन्हें 14 साल की कठोर जेल की सजा सुनाई गई।
मन्मथनाथ गुप्त का जीवन: मुख्य विवरण (Life Snapshot)
| विवरण | प्रमुख जानकारी (Key Facts) |
| जन्म | 7 फरवरी, 1908 (वाराणसी) |
| संगठन | हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) |
| प्रमुख घटना | काकोरी ट्रेन एक्शन (1925) |
| जेल यात्रा | 14 वर्ष की कठोर सजा |
| प्रमुख पुस्तक | भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास |
भगत सिंह और गुप्त: एक ही सिक्के के दो पहलू
शहीद-ए-आजम भगत सिंह और मन्मथनाथ गुप्त की सोच में गजब की समानता थी। दोनों ही नास्तिक थे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर जोर देते थे।
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समाजवाद का स्वप्न: दोनों का मानना था कि भारत को एक समाजवादी राष्ट्र बनना चाहिए।
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धार्मिक कट्टरता का विरोध: मन्मथनाथ अक्सर कहते थे कि जाति और धर्म के नाम पर बंटा समाज कभी स्वतंत्र नहीं रह सकता।
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कलम की जिम्मेदारी: भगत सिंह चाहते थे कि क्रांतिकारियों का सच जनता तक पहुँचे। उनके बलिदान के बाद, मन्मथनाथ ने अपनी कलम से उस जिम्मेदारी को निभाया और दर्जनों उपन्यास व संस्मरण लिखे।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
26 अक्टूबर, 2000 को इस महान सपूत ने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी लिखी किताबें आज भी धधकती मशाल की तरह हैं। मन्मथनाथ गुप्त केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं—जो सिखाती है कि क्रांति केवल हथियार से नहीं, बल्कि विचारों की ताकत से जीती जाती है।
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