Jamshedpur Rail Protest : कुड़मी समाज के आंदोलन से ठप हुई 83 ट्रेनें, लाखों यात्री बेहाल, जानें पूरी वजह

जमशेदपुर और झारखंड के कई जिलों में कुड़मी समाज के रेल टेका आंदोलन से शनिवार को 83 ट्रेनें रद्द हो गईं और करीब 2 लाख यात्री फंस गए। जानें आंदोलन का इतिहास और मांगें।

Sep 21, 2025 - 14:18
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Jamshedpur Rail Protest : कुड़मी समाज के आंदोलन से ठप हुई 83 ट्रेनें, लाखों यात्री बेहाल, जानें पूरी वजह
Jamshedpur Rail Protest : कुड़मी समाज के आंदोलन से ठप हुई 83 ट्रेनें, लाखों यात्री बेहाल, जानें पूरी वजह

शनिवार का दिन झारखंड और आसपास के राज्यों के यात्रियों के लिए बेहद मुश्किलभरा रहा। सुबह से ही रेलवे स्टेशनों पर अफरातफरी मची रही, क्योंकि कुड़मी समाज के लोगों ने अपनी रेल टेका आंदोलन की घोषणा को अंजाम देते हुए पटरियों पर उतर कर ट्रेनों का परिचालन ठप कर दिया।

83 ट्रेनें रद्द, 2 लाख यात्री फंसे

राज्यभर में कुल 40 से अधिक रेलवे स्टेशनों पर प्रदर्शनकारियों ने ट्रैक जाम कर दिया। नतीजा यह हुआ कि दिनभर में 83 ट्रेनें रद्द करनी पड़ीं और कई दर्जन ट्रेनों का रूट डायवर्ट किया गया। अकेले जमशेदपुर में 43 ट्रेनें रद्द हुईं और 31 ट्रेनें बीच रास्ते में अटक गईं।

रांची और हटिया स्टेशन से ही करीब 47 हजार यात्री फंसे रहे, जबकि पूरे राज्य में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों समेत करीब 2 लाख से ज्यादा यात्रियों को भारी परेशानी उठानी पड़ी।

सबसे बड़ा असर किन स्टेशनों पर?

  • रांची से 14 ट्रेनें रद्द और 20 ट्रेनें बीच रास्ते में रोकी गईं।

  • धनबाद से 26 ट्रेनें कैंसिल, 24 डायवर्ट हुईं।

  • जमशेदपुर में सबसे ज्यादा 43 ट्रेनें रद्द और 31 फंसी।

  • 20 से अधिक मालगाड़ियां भी जाम में अटक गईं।

यात्रियों के लिए यह दिन किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। स्टेशन पर ठसाठस भीड़, टिकट काउंटर पर लंबी कतारें और ट्रेनों का अनिश्चित इंतजार—हर तरफ बेचैनी और नाराज़गी का माहौल देखने को मिला।

आंदोलन क्यों?

कुड़मी समाज ने लंबे समय से अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग उठाई है। इसी मांग को लेकर उन्होंने रेल टेका आंदोलन की घोषणा की थी। शनिवार तड़के 4 बजे से ही अलग-अलग स्टेशनों पर लोग जमा होने लगे। जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, भीड़ बढ़ती गई और हजारों लोग रेलवे ट्रैक पर बैठ गए।

पुलिस और प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को समझाने की कोशिश की, लेकिन नतीजा टकराव और झड़पों तक पहुंचा। देर रात तक आंदोलनकारी ट्रैक पर डटे रहे, जिससे रेलवे पूरी तरह पंगु हो गया।

कुड़मी आंदोलन का इतिहास

कुड़मी समाज की मांग कोई नई नहीं है। इतिहास में झांके तो पता चलता है कि 1931 की जनगणना में कुड़मियों को जनजाति के रूप में शामिल किया गया था। लेकिन आज़ादी के बाद तैयार हुई 1950 की संविधान अनुसूचियों में उनका नाम ST सूची से बाहर हो गया।

तब से लेकर अब तक समुदाय बार-बार आरक्षण और पहचान की बहाली की मांग करता आया है। 2004, 2010 और 2017 में भी कई बार रेल और सड़क जाम आंदोलन हुए। लेकिन हर बार आश्वासन मिलने के बावजूद यह मुद्दा अधूरा ही रह गया।

यात्रियों की दुश्वारियां

शनिवार को स्टेशन पर अटके यात्रियों की हालत सोचने वाली थी।

  • कुछ परिवार शादी या इलाज के लिए निकल रहे थे, लेकिन ट्रेनें रद्द होने से उनकी योजनाएं धरी की धरी रह गईं।

  • छोटे बच्चों और बुजुर्गों को स्टेशन की भीड़ और गर्मी ने बेहाल कर दिया।

  • कई यात्री घंटों तक यह तय नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें टिकट कैंसिल कराना चाहिए या इंतजार करना चाहिए।

एक यात्री ने नाराजगी जताते हुए कहा—“हमने महीनों पहले टिकट कराया था, लेकिन अब सब बर्बाद हो गया। आंदोलन अपनी जगह ठीक है, पर इसकी मार हमें क्यों झेलनी पड़े?”

आगे क्या?

सरकार और रेलवे प्रशासन के लिए यह बड़ा सिरदर्द है। एक ओर यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा का सवाल है, तो दूसरी ओर एक बड़े समुदाय की संवेदनशील मांग भी। सवाल यही है कि क्या सरकार इस बार कुड़मी समाज की मांग पर ठोस कदम उठाएगी, या फिर यह आंदोलन भी बीते वर्षों की तरह इतिहास के पन्नों में खो जाएगा?

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Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।