RIMS Suicide: रिम्स के मनोरोग विभाग में युवक ने लगाई फांसी, गमछे का बनाया फंदा, नशे की लत छुड़ाने आया था अस्पताल
रांची के रिम्स अस्पताल में भर्ती एक मरीज ने मनोरोग विभाग में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। नशे की लत से जूझ रहे विवेक कुमार की मौत और रिम्स की सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों की पूरी रिपोर्ट यहाँ देखें।
रांची/झारखंड, 08 मई 2026 – झारखंड के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान, रिम्स (RIMS) से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। अस्पताल के मनोरोग विभाग (Psychiatry Department) में इलाज करा रहे एक युवक ने संदिग्ध परिस्थितियों में फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। शुक्रवार की सुबह जब वार्ड में युवक की लाश फंदे से लटकती मिली, तो पूरे अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया। नशे के दलदल से बाहर निकलने की उम्मीद लेकर अस्पताल आए एक परिवार का चिराग अब बुझ चुका है।
वारदात की दास्तां: इलाज के दौरान गमछे से बनाया फंदा
मृतक की पहचान विवेक कुमार के रूप में हुई है। जानकारी के मुताबिक, विवेक पिछले काफी समय से नशे की गंभीर लत का शिकार था, जिसके कारण उसकी मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ा था।
-
भर्ती और इलाज: परिजनों ने बेहतर भविष्य की उम्मीद में उसे रिम्स के मनोरोग विभाग में भर्ती कराया था। यहाँ डॉक्टरों की एक विशेष टीम उसकी निगरानी और काउंसलिंग कर रही थी।
-
अचानक हुई घटना: शुक्रवार को विवेक ने अपने ही गमछे का फंदा बनाया और वार्ड के भीतर उसे गले से लगा लिया। जब तक अस्पताल के स्टाफ की नजर उस पर पड़ी, विवेक की सांसें थम चुकी थीं।
-
पुलिसिया कार्रवाई: सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस रिम्स पहुँची। पुलिस ने शव को फंदे से उतारकर कब्जे में लिया और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। शुरुआती जांच में इसे आत्महत्या बताया जा रहा है, लेकिन वार्ड में सुरक्षा की चूक को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
सवालों के घेरे में सुरक्षा: कहाँ थी अटेंडेंट और गार्ड की फौज?
रिम्स में हुई इस घटना ने अस्पताल की इंटरनल सिक्योरिटी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
-
निगरानी की कमी: मनोरोग विभाग के मरीजों को 'हाई रिस्क' श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे में विवेक के पास गमछा कैसे रहा और उसने फंदा लगाने का समय कैसे ढूंढ लिया, यह जांच का विषय है।
-
नशे की लत का खतरनाक पहलू: विशेषज्ञों का मानना है कि नशा छोड़ने की प्रक्रिया (Withdrawal Symptoms) के दौरान मरीज अक्सर डिप्रेशन या हिंसक विचारों का शिकार होते हैं। क्या विवेक की उचित काउंसलिंग हो रही थी?
-
प्रशासनिक चुप्पी: घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन ने चुप्पी साध ली है, जबकि पुलिस अब वार्ड के ड्यूटी चार्ट और उस समय मौजूद गार्ड्स की भूमिका की जांच कर रही है।
दहशत और तनाव: परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल
विवेक की मौत की खबर मिलते ही उसके परिजन रिम्स पहुँचे। उनका रो-रोकर बुरा हाल है। वे इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि जिस अस्पताल में उन्होंने बेटे को ठीक होने के लिए भेजा था, वहां से उसकी लाश बाहर निकलेगी। अस्पताल परिसर में इस घटना के बाद अन्य मरीजों और उनके तीमारदारों के बीच भी असुरक्षा का भाव देखा जा रहा है।
रिम्स में विवेक कुमार की आत्महत्या केवल एक मरीज की मौत नहीं है, बल्कि यह हमारे सिस्टम की विफलता की ओर इशारा करती है। नशे की लत से लड़ रहे युवाओं को केवल दवा की नहीं, बल्कि पल-पल की निगरानी और संबल की जरूरत होती है। अगर राज्य के सबसे बड़े अस्पताल के मनोरोग वार्ड में भी जिंदगियां सुरक्षित नहीं हैं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। पुलिस की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और आंतरिक जांच ही इस 'खौफनाक सच' से पर्दा उठाएगी कि आखिर विवेक ने हार क्यों मान ली।
What's Your Reaction?


