Jammu Landslide Disaster: रामबन में तबाही का मंजर, बादल फटा, 5 की मौत, 40 घर बहे!
जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में बादल फटने और भारी बारिश से मची तबाही, 5 लोगों की मौत, 100 से ज्यादा लोगों को रेस्क्यू किया गया। जानें पूरी रिपोर्ट।
जम्मू-कश्मीर का रामबन जिला इन दिनों कुदरत के कहर से जूझ रहा है। लगातार बारिश, बादल फटना और भूस्खलन ने जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। लोगों के घर बह गए, रास्ते बंद हो गए और कई परिवारों ने अपनों को खो दिया।
रामबन, जो कभी शांत वादियों के लिए जाना जाता था, आज त्राहि-त्राहि कर रहा है।
रविवार सुबह की दहशत
रविवार तड़के जैसे ही लोग अपनी दिनचर्या के लिए उठे, रामबन जिले के सेरी बागना गांव में बादल फटने की भयावह घटना सामने आई। इस हादसे में तीन लोगों की मौत हो गई, जिनमें दो सगे भाई आकिब अहमद और मोहम्मद साकिब भी शामिल हैं। घटना ने पूरे गांव को दहला दिया। परिवारों में मातम पसरा हुआ है और हर किसी की जुबान पर बस एक ही सवाल है – “अब क्या होगा?”
अचानक बाढ़ और 100 से ज्यादा लोगों की जान बची
रामबन के धरम कुंड गांव में भारी बारिश ने अचानक बाढ़ का रूप ले लिया। लेकिन राहत की बात यह रही कि पुलिस और प्रशासन की तत्परता से 100 से ज्यादा ग्रामीणों को समय रहते सुरक्षित बचा लिया गया। हालांकि, इस बाढ़ ने लगभग 40 घरों को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया है। कई लोग अब खुले आसमान के नीचे शरण लेने को मजबूर हैं।
जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर भूस्खलन, यातायात ठप
लगातार हो रही बारिश और मिट्टी खिसकने की घटनाओं ने जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग को भी नहीं छोड़ा। नाशरी से बनिहाल के बीच कम से कम 12 जगहों पर भूस्खलन हुआ है, जिससे इस महत्वपूर्ण राजमार्ग पर यातायात रोक दिया गया है। यह हाईवे जम्मू-कश्मीर की लाइफलाइन मानी जाती है, और इसके बंद होने से राज्य में जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है।
जम्मू क्षेत्र में दो दिनों में 5 मौतें
यह सिर्फ रामबन की कहानी नहीं है। जम्मू क्षेत्र के रियासी जिले के अरनास इलाके में शनिवार देर रात आकाशीय बिजली गिरने से दो लोगों की मौत हो गई, जिनमें एक महिला भी शामिल है। इस घटना में एक अन्य महिला गंभीर रूप से घायल हुई है।
कुल मिलाकर, जम्मू क्षेत्र में पिछले दो दिनों में 5 लोगों की जान जा चुकी है।
इतिहास गवाह है, रामबन हमेशा रहा है संवेदनशील
अगर पीछे मुड़कर देखें, तो रामबन जिला हमेशा से प्राकृतिक आपदाओं के लिए संवेदनशील रहा है। पहाड़ी इलाका, कमजोर चट्टानें और अनियंत्रित निर्माण कार्य यहां बार-बार भूस्खलन और बाढ़ को न्योता देते हैं। 2015 में भी इसी इलाके में भूस्खलन से एक पूरी बस नदी में बह गई थी, जिसमें 10 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।
प्रशासन अलर्ट पर, लेकिन चुनौतियां बनी हुई हैं
प्रशासन का कहना है कि राहत और बचाव कार्य तेज कर दिए गए हैं, लेकिन बारिश की लगातार रफ्तार इन कार्यों में रुकावट पैदा कर रही है। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और स्थानीय पुलिस मिलकर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में जुटी है।
क्या है आगे की राह?
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने इन आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ा दी है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में ऐसे हादसे और ज्यादा विनाशकारी हो सकते हैं।
आख़िरी सवाल - क्या हम तैयार हैं?
बार-बार की आपदाओं के बावजूद हमारी तैयारी पर सवाल उठते रहे हैं। क्या अब समय नहीं आ गया कि हम आपदा प्रबंधन को सिर्फ फाइलों से निकालकर जमीन पर लागू करें? क्या सरकार और आम जनता मिलकर इस बदलती जलवायु के खिलाफ मोर्चा नहीं बना सकते?
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