Census 2027: भारत की जनगणना में आएगा बड़ा बदलाव,1931 के बाद पहली बार पूछे जाएँगे जाति के सवाल
भारत की जनगणना 2027 पहली बार होगी पूरी तरह डिजिटल। 11,718 करोड़ रुपये का बजट मंजूर। 1931 के बाद पहली बार जातिगत आंकड़े क्यों जुटाए जाएँगे और इसके क्या फायदे होंगे, पूरी जानकारी।
नई दिल्ली, 12 दिसंबर 2025 – भारत अपनी जनगणना के इतिहास में एक नए अध्याय की ओर बढ़ रहा है। जनगणना 2027 देश की पहली पूरी तरह से डिजिटल (Digital) जनगणना होगी। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए 11,718 करोड़ रुपये का बजट (Budget) मंजूर किया गया है। सरकार का दावा है कि यह नई व्यवस्था आँकड़ों (Data) की सुरक्षा, गति और पारदर्शिता को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
दो चरणों में होगा ऐतिहासिक कार्य
यह पूरी जनगणना दो चरणों में पूरी होगी, जिसमें देश के हर व्यक्ति और हर घर की जानकारी दर्ज की जाएगी:
पहला चरण: अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच घर सूचीकरण और आवास जनगणना होगी।
दूसरा चरण: जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में होगी।
यह पूरा काम वास्तविक-समय में जनगणना प्रबंधन और निगरानी प्रणाली (CMMS) के माध्यम से देखा जाएगा। जनता को एक वेब पोर्टल (WebPortal) पर खुद भी जानकारी भरने का विकल्प मिलेगा।
1931 के बाद पहली बार जाति आधारित आँकड़े
इस जनगणना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है जाति (Caste) से जुड़े आँकड़े जुटाना।1931 के बाद यह पहला मौका होगा जब सरकार सभी समुदायों की जाति से जुड़े आँकड़े जुटाएगी, न कि केवल अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) तक सीमित रहेगी।
प्रश्न बदलेंगे: जनगणना में प्रवास (Migration) से जुड़े विस्तृत सवाल पूछे जाएँगे, जैसे स्थान बदलने की वजह क्या थी, और वर्तमान स्थान पर कितने समय से रह रहे हैं। हर इमारत का स्थान टैग (Geo-Tag) भी किया जाएगा, और एप में हिंदी सहित16 से ज्यादा भाषाओं का विकल्प होगा।
तेज और सटीक आँकड़ों का लाभ
डिजिटल होने से आँकड़ों को गिनने और रिपोर्ट तैयार करने में काफी तेज़ी आएगी।
समय की बचत: पहले कागज़ पर काम होने के कारण पूरी प्रक्रिया में कई साल लग जाते थे, लेकिन अब शुरुआती आँकड़े10 दिन में और अंतिम रिपोर्ट6 से9 महीनों में मिलने का अनुमान है।
फायदे: ये सटीक और तेज आँकड़े 2029 की नई लोकसभा सीटों के निर्धारण, कोष वितरण और सरकारी योजनाओं की योजना बनाने में मदद करेंगे। साथ ही, गणना में गलतियों और छूटे हुए घरों की संख्या कम होगी।
चुनौतियाँ और सुरक्षा के सवाल
हालांकि, भारत जैसे विशाल और डिजिटल रूप से असमान देश के लिए चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। देश में अभी भी केवल लगभग 65% आबादी ही ऑनलाइन है।
जाल की समस्या: पहाड़ी और दूर-दराज के इलाकों में जाल बहुत कमजोर है, जिससे गरीब और पिछड़े लोगों की गिनती छूटने का खतरा है।
प्रशिक्षण और साक्षरता: लगभग30 लाख कर्मचारियों (ज्यादातर शिक्षक) को ऐप चलाने की पूरी ट्रेनिंग देना होगा। कई बुजुर्ग और ग्रामीण महिलाएँ मोबाइल देखकर संकोच कर सकती हैं। सबसे बड़ी चिंता जाति और प्रवास जैसी संवेदनशील जानकारी की साइबर सुरक्षा और व्यक्तिगत गोपनीयता को लेकर है, जिसकी गारंटी सरकार को देनी होगी।
What's Your Reaction?


