Ramnavami Festival: जमशेदपुर के ईदल बेड़ा हनुमान मंदिर में रामनवमी की धूम, 1976 से स्थापित इस प्राचीन धाम में उमड़े हजारों श्रद्धालु
जमशेदपुर के शिलडुगरी स्थित प्राचीन ईदल बेड़ा हनुमान मंदिर में रामनवमी का महापर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। 1976 से स्थापित इस मंदिर में हुई भव्य आरती, भजन-कीर्तन और हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट यहाँ देखें।
जमशेदपुर/पूर्वी सिंहभूम, 27 मार्च 2026 – लौहनगरी जमशेदपुर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में रामनवमी का उल्लास अपने चरम पर है। शिलडुगरी, ईदल बेड़ा स्थित श्री श्री सार्वजनिक हनुमान मंदिर में इस वर्ष आस्था का ऐसा महाकुंभ उमड़ा कि पूरा क्षेत्र 'जय श्री राम' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। वर्ष 1976 में स्थापित इस प्राचीन और सिद्ध पीठ में रामनवमी का पावन पर्व अभूतपूर्व श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया गया। सुबह की पहली किरण के साथ ही श्रद्धालुओं की कतारें लगनी शुरू हो गई थीं, जो देर रात तक अटूट बनी रहीं। मंदिर की मनमोहक सजावट और आध्यात्मिक वातावरण ने भक्तों को एक दिव्य लोक का अनुभव कराया।
1976 से आस्था का केंद्र: शिलडुगरी का प्राचीन हनुमान धाम
ईदल बेड़ा का यह हनुमान मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
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भव्य सजावट: रामनवमी के अवसर पर मंदिर को रंग-बिरंगे फूलों और दुधिया रोशनी से इस कदर सजाया गया था कि इसकी छटा देखते ही बन रही थी।
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विधि-विधान से पूजा: मुख्य पुजारी के सानिध्य में भगवान श्री राम और संकटमोचन हनुमान जी की विशेष महापूजा संपन्न हुई। श्रद्धालुओं ने सुख, शांति और क्षेत्र की खुशहाली के लिए मन्नतें मांगीं।
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भक्ति की अविरल धारा: मंदिर परिसर में आयोजित संगीतमय हनुमान चालीसा पाठ और दिव्य महाआरती ने भक्तों को भाव-विभोर कर दिया। भजन-कीर्तन की धुन पर युवा और बुजुर्ग सभी झूमते नजर आए।
युवा शक्ति का संगम: इन कर्मठ कंधों पर रही आयोजन की कमान
किसी भी बड़े आयोजन की सफलता उसके पीछे काम करने वाली टीम पर निर्भर करती है। शिलडुगरी के इस उत्सव को भव्य बनाने में स्थानीय युवाओं ने दिन-रात एक कर दिया।
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अनुशासन और व्यवस्था: हजारों की भीड़ होने के बावजूद मंदिर समिति के सदस्यों ने कतारबद्ध तरीके से दर्शन और प्रसाद वितरण सुनिश्चित किया।
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समर्पित टीम: इस ऐतिहासिक आयोजन को सफल बनाने में अभिमन्यु गोप, प्रह्लाद गोप, दिनेश गोप, हरेन गौड़, गणेश गोप और निराकार गोप की भूमिका अग्रणी रही।
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युवा जोश: धासीराम गोप, नन्द गोप, सुरेश गोप, राजीव गोप, करण बारीक, सुदामा महतो, निखिल गोप, आरुस गोप एवं दीपक गोप जैसे युवाओं ने अथक परिश्रम से पंडाल से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक की कमान संभाली।
जमशेदपुर में रामनवमी और अखाड़ा संस्कृति का इतिहास
जमशेदपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों में रामनवमी मनाने की परंपरा काफी पुरानी और गौरवशाली रही है।
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अखाड़ों का उदय: 1920 और 30 के दशक से ही जमशेदपुर में अखाड़ों के माध्यम से रामनवमी जुलूस निकालने की शुरुआत हुई थी। शिलडुगरी जैसे ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों ने इस परंपरा को अपनी जड़ों से जोड़कर रखा है।
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सांस्कृतिक समरसता: यहाँ की रामनवमी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे का उदाहरण है। 1976 में ईदल बेड़ा मंदिर की स्थापना के बाद से यह स्थान एकता का केंद्र बन गया है, जहाँ हर वर्ग के लोग एक साथ मिलकर सेवा करते हैं।
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बदलते समय के साथ भव्यता: पिछले 50 वर्षों में तकनीक और संसाधनों के बढ़ने से आयोजनों का स्वरूप बदला है, लेकिन शिलडुगरी के लोगों की भक्ति और समर्पण आज भी 1976 जैसा ही अडिग है।
अगला कदम: महाप्रसाद वितरण और विसर्जन की तैयारी
पूजा के समापन के बाद मंदिर समिति द्वारा व्यापक स्तर पर महाप्रसाद का वितरण किया गया।
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सामुदायिक भोज: हजारों श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। समिति ने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी भक्त खाली हाथ न लौटे।
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एकता का संदेश: आयोजन के अंत में समिति के वरिष्ठ सदस्यों ने बताया कि रामनवमी का यह पर्व सामाजिक समरसता का अनुपम संदेश देकर गया है।
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भविष्य की योजना: मंदिर समिति अब आने वाले वर्षों में इस आयोजन को और अधिक विस्तार देने और जनकल्याणकारी कार्यों (जैसे निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर) से जोड़ने की योजना बना रही है।
शिलडुगरी का ईदल बेड़ा हनुमान मंदिर इस वर्ष न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना, बल्कि युवाओं के अनुशासन और समर्पण की मिसाल भी पेश की। 1976 से चली आ रही यह परंपरा आज अपनी स्वर्ण जयंती के करीब पहुँच रही है और भक्तों का उत्साह हर साल बढ़ता ही जा रहा है। 'जय श्री राम' के नारों के साथ संपन्न हुआ यह महोत्सव आने वाले वर्षों तक लोगों के दिलों में अपनी अमिट छाप छोड़ता रहेगा। क्या जमशेदपुर की अखाड़ा संस्कृति और ग्रामीण मंदिरों की यह भव्यता आने वाले समय में विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना पाएगी? फिलहाल, शिलडुगरी की फिजाओं में अब भी भक्ति का रस घुला हुआ है।
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