Noamundi Conversion: ईसाई धर्म छोड़ सात बच्चों संग लौटी सरना, गांव में चर्चा तेज!
झारखंड में धर्म परिवर्तन का बड़ा मामला! नोवामुंडी में महिला ने अपने 7 बच्चों के साथ ईसाई धर्म छोड़कर फिर से सरना धर्म अपनाया। जानें पूरी खबर!

नोवामुंडी: झारखंड के नोवामुंडी प्रखंड में धर्म परिवर्तन को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। एक साल पहले ईसाई धर्म अपनाने वाली तिली कुई ने अपने सात बच्चों के साथ सरना धर्म में वापसी कर ली है। यह घटना ग्राम गीतिकेंदु हेम्ब्रम टोला की है, जहां "हो" समाज की परंपराओं के साथ पूरे परिवार का फिर से धर्म परिवर्तन संपन्न हुआ।
कैसे हुआ सरना धर्म में वापसी का आयोजन?
सोमवार को तिली कुई के आंगन में एक विशेष अनुष्ठान आयोजित किया गया, जिसमें "हो" समाज युवा महासभा के पदाधिकारी शामिल हुए।
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दिउरी बलराम लागुरी और बुधराम अंगरिया की उपस्थिति में बोंगा बुरू और आराः सांडि की पूजा की गई।
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लाल मुर्गे की बलि देकर पूरे परिवार को "जाते-परचि" (पवित्र) किया गया।
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"हो" समाज की पारंपरिक रस्में जैसे नामा चाटु (नया हंडी) में चाऊली और राम्बाः चढ़ाने की परंपरा को दोबारा शुरू किया गया।
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अनुष्ठान के बाद तैयार भोजन को पूर्वजों (आदिंग) के नाम पर समर्पित किया गया।
ईसाई धर्म क्यों अपनाया था तिली कुई ने?
करीब एक साल पहले तिली कुई ने अपने पति की बीमारी और मृत्यु के बाद ईसाई धर्म अपना लिया था।
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पति सोनू हेम्ब्रम लंबे समय से बीमार थे, जिसके लिए वह मुर्गा-बकरी की बलि देकर पूजा कराती थी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
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ग्रामीणों का कहना है कि सोनू हेम्ब्रम टीबी से पीड़ित थे और इलाज के अभाव में उनका निधन हुआ।
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पूजा-पाठ से निराश होकर तिली कुई ने ईसाई धर्म स्वीकार किया, ताकि चर्च में प्रार्थना के जरिए अपने बच्चों की रक्षा कर सके।
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हर रविवार वह संत पॉल स्कूल, मालुका स्थित चर्च में प्रार्थना करने जाती थी।
फिर क्यों किया सरना धर्म में वापसी का फैसला?
गांव में धार्मिक जागरूकता और "हो" समाज की सांस्कृतिक चेतना बढ़ने के कारण तिली कुई ने खुद को अपनी जड़ों से फिर जोड़ने का निर्णय लिया।
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उन्होंने अपनी 15 वर्षीय बेटी सुशीला हेम्ब्रम, 13 वर्षीय लेदगो हेम्ब्रम, 11 वर्षीय दासो हेम्ब्रम, 9 वर्षीय बालेमा हेम्ब्रम, 7 वर्षीय माधो हेम्ब्रम, 5 वर्षीय रोया हेम्ब्रम और 3 वर्षीय नमसी हेम्ब्रम के साथ फिर से सरना धर्म अपनाया।
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यीशु मसीह की तस्वीरें, धार्मिक पुस्तिकाएं और प्रचार सामग्री उन्होंने वापस लौटा दी।
गांव में बढ़ी चर्चा, कई लोग हुए शामिल!
इस धर्म वापसी को लेकर गांव में काफी चर्चा हो रही है। इस मौके पर कई ग्रामीण और समाज के गणमान्य लोग मौजूद थे, जिनमें डाकुवा पराय अंगरिया, जामदार पिंगुवा, मंगलसिंह पिंगुवा, दिलीप हेम्ब्रम, किरण हेम्ब्रम, माधो पिंगुवा, जेमा बोबोंगा, भजमति कुई, रानी कुई आदि शामिल रहे।
क्या कहती है इतिहास और परंपरा?
झारखंड के आदिवासी समाज में सरना धर्म एक महत्वपूर्ण पहचान है, जिसमें प्रकृति की पूजा की जाती है।
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ब्रिटिश शासन के दौरान मिशनरियों ने आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश की थी, जिससे सरना और ईसाई धर्म के बीच मतभेद उभरने लगे।
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आज भी झारखंड में कई आदिवासी ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन समय-समय पर धर्म वापसी की घटनाएं भी सामने आती हैं।
अब आगे क्या?
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क्या तिली कुई का यह फैसला सिर्फ धार्मिक था या सामाजिक दबाव भी इसमें भूमिका निभा रहा था?
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क्या गांव में अब अन्य लोग भी ईसाई धर्म छोड़ने पर विचार कर सकते हैं?
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क्या यह धर्म परिवर्तन किसी बड़ी सामाजिक बहस की शुरुआत है?
फिलहाल, यह मामला झारखंड में धर्म और परंपरा को लेकर एक नई बहस को जन्म दे सकता है।
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