Lieutenant General Jagjit Singh Arora : 93 हजार सैनिकों का सरेंडर और नियाजी के वो आंसू, जनरल अरोड़ा की वो जांबाज कहानी जिसने दुनिया के नक्शे से मिटा दिया पूर्वी पाकिस्तान
लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा की वो अनसुनी रणनीति जिसने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था। ढाका के रेसकोर्स मैदान में हुए दुनिया के सबसे बड़े सरेंडर और जनरल अरोड़ा के उस ऐतिहासिक फैसले की पूरी कहानी यहाँ मौजूद है वरना आप भारत की इस महान सैन्य विजय के असली नायक के शौर्य से अनजान रह जाएंगे।
विशेष लेख, 13 फरवरी 2026 – भारतीय सैन्य इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिनके जिक्र के बिना वीरता की परिभाषा अधूरी है। आज 13 फरवरी है, यानी उस महानायक का जन्मदिन जिसे दुनिया लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नाम से जानती है। यह वही शख्स थे जिनके सामने पाकिस्तान के जनरल नियाजी ने अपनी रिवॉल्वर रखी थी और 93,000 सैनिकों के साथ सरेंडर के दस्तावेजों पर दस्तखत किए थे। खुद फील्ड मार्शल जनरल मानेकशॉ ने स्वीकार किया था कि 1971 की जीत का असली श्रेय 'जग्गी' (जगजीत सिंह अरोड़ा) को ही जाता है।
झेलम में जन्म और तीन युद्धों का अनुभव
जनरल अरोड़ा का जन्म 13 फरवरी 1916 को अविभाजित भारत के झेलम जिले (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। 1939 में सेना में शामिल होने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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अनुभवी योद्धा: उन्होंने 1947 का भारत-पाक युद्ध, 1962 का भारत-चीन युद्ध और 1965 की जंग में अपनी रणनीतिक कुशलता का लोहा मनवाया।
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ऐतिहासिक नेतृत्व: 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में अत्याचार अपनी चरम सीमा पर थे, तब भारत ने 'ऑपरेशन जैकब' और 'ऑपरेशन अरोड़ा' के जरिए बांग्लादेश की मुक्ति का संकल्प लिया। अरोड़ा तब पूर्वी कमांड के कमांडर थे।
"मैं बंद कमरे में नहीं, आम जनता के बीच सरेंडर लूंगा"
जब पाकिस्तान की हार तय हो गई और जनरल नियाजी ने आत्मसमर्पण का वायरलेस संदेश भेजा, तब दिल्ली से समझौते के दस्तावेज भिजवाए गए। जनरल अरोड़ा ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने उन्हें अमर बना दिया। उन्होंने कहा, "मैं किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि ढाका के रेसकोर्स मैदान में आम लोगों के बीच सरेंडर स्वीकार करूँगा, ताकि बांग्लादेश की जनता को पता चले कि वो आज़ाद हो गए हैं।" ---
रिटायरमेंट के बाद का जीवन: राजनीति में प्रवेश
सेना से रिटायर होने के बाद भी उनका जज्बा कम नहीं हुआ। साल 1986 में वे अकाली दल की ओर से राज्यसभा पहुंचे और देश की सेवा जारी रखी। 3 मई 2005 को 89 वर्ष की आयु में इस महानायक ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन 1971 की वह तस्वीर आज भी हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती है जिसमें नियाजी उनके सामने सिर झुकाए बैठे हैं।
सदा अमर रहेंगे जनरल अरोड़ा
लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा केवल एक सैन्य अफसर नहीं, बल्कि एक नए राष्ट्र 'बांग्लादेश' के जन्मदाता और भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक थे। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए वीरता का सबसे बड़ा पाठ है।
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