Swami Dayananda Saraswati Jayanti : स्वामी दयानंद सरस्वती की 202वीं जयंती पर वेदों की ओर लौटने का शंखनाद, मूर्तिपूजा और पाखंड के खिलाफ वो क्रांतकारी विचार जिसने बदल दिया भारत का भाग्य
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती पर उनके क्रांतिकारी विचारों और वेदों की ओर लौटने के संदेश की पूरी कहानी यहाँ मौजूद है वरना आप समाज सुधार के उस सबसे बड़े अध्याय से अनजान रह जाएंगे जिसने देश में वैचारिक क्रांति की नींव रखी।
नई दिल्ली/देश, 12 फरवरी 2026 – आज भारत की उस पावन धरा पर उत्सव का माहौल है, जिसने 'वेदों की ओर लौटो' का अमर नारा देने वाले महान समाज सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती को जन्म दिया। आज उनकी 202वीं जयंती है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस वैचारिक क्रांति का स्मरण है जिसने 19वीं सदी के सोए हुए भारत को अंधविश्वास, पाखंड और कुरीतियों की जंजीरों से आजाद कराया था। स्वामी जी ने न केवल धर्म को शुद्ध किया, बल्कि भारतीय समाज को आत्मनिर्भर और शिक्षित बनाने के लिए 'आर्य समाज' जैसा एक मजबूत आधार स्तंभ खड़ा किया।
मूलशंकर से महर्षि तक: सत्य की वो खोज
स्वामी दयानंद जी का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात (तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी) के टंकारा में हुआ था। बचपन का नाम 'मूलशंकर' था, लेकिन एक शिवरात्रि की घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
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वैराग्य का मार्ग: मूर्ति पर चूहे को चढ़ते देख उनके मन में मूर्तिपूजा के प्रति संशय जागा और वे सच्चे ईश्वर की खोज में घर छोड़कर निकल पड़े।
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वेदों का ज्ञान: मथुरा के स्वामी विरजानंद को गुरु बनाकर उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन किया और यह समझा कि भारतीय संस्कृति का वास्तविक आधार केवल वेद हैं, न कि बाद में उपजी कुरीतियां।
1875: आर्य समाज का गठन और सामाजिक सुधार
स्वामी जी ने 10 अप्रैल 1875 को मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य समाज को पाखंड मुक्त करना था।
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शुद्धि आंदोलन: उन्होंने उन लोगों के लिए द्वार खोले जो किसी कारणवश अन्य धर्मों में चले गए थे, ताकि वे ससम्मान अपने मूल धर्म में वापस आ सकें।
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नारी शिक्षा: स्वामी जी उस दौर में महिलाओं की शिक्षा के सबसे बड़े पैरोकार थे, जब समाज उन्हें चारदीवारी में कैद रखता था।
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जातिवाद पर प्रहार: उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से महान बनता है।
स्वामी दयानंद सरस्वती: मुख्य योगदान (Legacy Snapshot)
| क्षेत्र | क्रांतिकारी बदलाव (Key Contributions) |
| नारा | 'वेदों की ओर लौटो' (Go Back to the Vedas) |
| संस्था | आर्य समाज (स्थापना 1875) |
| मुख्य ग्रंथ | सत्यार्थ प्रकाश (सत्य का प्रकाश) |
| सुधार | बाल विवाह विरोध, विधवा विवाह समर्थन, नारी शिक्षा |
| राष्ट्रवाद | 'स्वराज्य' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग करने वाले महापुरुष |
सच्ची श्रद्धांजलि: आज की प्रासंगिकता
स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके 'सत्य' के मार्ग पर चलें।
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अंधविश्वास का त्याग: आज भी समाज में व्याप्त ढोंग और पाखंड के खिलाफ जागरूक होना जरूरी है।
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समानता का भाव: जाति और धर्म के भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना ही उनका असली स्वप्न था।
प्रेरणा का अटूट स्रोत
स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन हमें सिखाता है कि समाज में बदलाव लाने के लिए केवल विचार काफी नहीं, बल्कि उन पर अडिग रहने का साहस भी चाहिए। उनकी शिक्षाएं 2026 के आधुनिक भारत में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी 150 साल पहले थीं।
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