Jharkhand Municipal Elections 2026: अनिल मोदी का बड़ा हमला, निकाय चुनाव से पहले ओबीसी आरक्षण पर गहराया संकट, जाति प्रमाणपत्र में देरी को बताया लोकतंत्र की हत्या

झारखंड नगर निकाय चुनाव में ओबीसी प्रत्याशियों के सामने खड़े हुए जाति प्रमाणपत्र के संकट और भाजपा नेता अनिल मोदी के तीखे प्रहार की पूरी रिपोर्ट यहाँ मौजूद है। नामांकन शुरू होने के बावजूद प्रमाणपत्र न मिलने के कारण चुनावी दौड़ से बाहर होते उम्मीदवारों का पूरा विवरण विस्तार से पढ़िए वरना आप पिछड़ा वर्ग के साथ हो रहे इस बड़े प्रशासनिक खेल की जानकारी से चूक जाएंगे।

Jan 29, 2026 - 20:19
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Jharkhand Municipal Elections 2026: अनिल मोदी का बड़ा हमला, निकाय चुनाव से पहले ओबीसी आरक्षण पर गहराया संकट, जाति प्रमाणपत्र में देरी को बताया लोकतंत्र की हत्या
Jharkhand Municipal Elections 2026: अनिल मोदी का बड़ा हमला, निकाय चुनाव से पहले ओबीसी आरक्षण पर गहराया संकट, जाति प्रमाणपत्र में देरी को बताया लोकतंत्र की हत्या

जमशेदपुर, 29 जनवरी 2026 – झारखंड में नगर निकाय चुनावों का बिगुल बज चुका है, लेकिन लोकतंत्र के इस उत्सव पर प्रशासनिक लापरवाही का साया मंडराने लगा है। भाजपा के जिला महामंत्री अनिल मोदी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर राज्य सरकार और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामला ओबीसी (OBC) वर्ग के प्रत्याशियों को जाति प्रमाणपत्र निर्गत करने में हो रही अत्यधिक देरी से जुड़ा है। अनिल मोदी ने इसे सीधे तौर पर पिछड़ा वर्ग के लोकतांत्रिक अधिकारों का 'गला घोंटने' का प्रयास करार दिया है।

नामांकन शुरू, पर हाथ खाली: प्रत्याशी परेशान

कल से नामांकन की प्रक्रिया विधिवत प्रारंभ हो रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सैकड़ों योग्य उम्मीदवार केवल एक कागज के टुकड़े यानी 'जाति प्रमाणपत्र' के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

  • अधिकारों का हनन: अनिल मोदी ने कहा कि वार्ड स्तर पर ओबीसी आरक्षण लागू करने का उद्देश्य सामाजिक न्याय था, लेकिन प्रशासन की सुस्ती ने इसे एक 'चुनावी बाधा' बना दिया है।

  • तकनीकी बहानेबाजी: आरोप लगाया गया है कि तकनीकी कारणों का हवाला देकर आवेदनों को लटकाया जा रहा है, जिससे कई प्रभावशाली चेहरे चुनाव लड़ने से वंचित रह सकते हैं।

  • निष्पक्षता पर सवाल: यदि समय रहते प्रमाणपत्र नहीं मिले, तो चुनाव की निष्पक्षता और 'समान अवसर' का सिद्धांत पूरी तरह धराशायी हो जाएगा।

अनिल मोदी की 'डेडलाइन' और प्रशासन को अल्टीमेटम

भाजपा नेता ने जिला प्रशासन और सरकार के सामने अपनी मांगों को दो-टूक शब्दों में रखा है:

  1. विशेष शिविर: लंबित आवेदनों के त्वरित निष्पादन के लिए तत्काल विशेष कैंप लगाए जाएं।

  2. आपातकालीन व्यवस्था: नामांकन की अवधि को देखते हुए 24 घंटे के भीतर प्रमाणपत्र जारी करने की 'इमरजेंसी सर्विस' शुरू की जाए।

  3. प्रक्रिया में तेजी: फाइलों को दबाने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो और सॉफ्टवेयर की खामियों को तुरंत दूर किया जाए।

निकाय चुनाव: ओबीसी प्रमाणपत्र का संकट (Crisis Snapshot)

मुख्य बिंदु विवरण / स्थिति (Status)
मुद्दा जाति प्रमाणपत्र (Caste Certificate) में देरी
प्रभावी वर्ग ओबीसी (पिछड़ा वर्ग) के इच्छुक प्रत्याशी
भाजपा का पक्ष अनिल मोदी द्वारा प्रशासनिक लापरवाही का विरोध
प्रमुख मांग विशेष शिविर और त्वरित निष्पादन
खतरा योग्य उम्मीदवारों का चुनावी प्रक्रिया से बाहर होना

इतिहास का पन्ना: झारखंड में ओबीसी राजनीति और आरक्षण का संघर्ष

झारखंड के गठन के बाद से ही ओबीसी आरक्षण हमेशा से एक ज्वलंत और भावुक मुद्दा रहा है। इतिहास गवाह है कि 2001 में बाबूलाल मरांडी की सरकार के समय से लेकर आज तक, स्थानीय निकायों में पिछड़ों की भागीदारी को लेकर लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाइयां लड़ी गई हैं। 2022-23 के दौरान सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' के निर्देशों के बाद झारखंड में निकाय चुनावों में देरी हुई थी। यह पहली बार है जब वार्ड स्तर पर इस आरक्षण को धरातल पर उतारने की कोशिश हो रही है। लेकिन अनिल मोदी का यह बयान उस कड़वे ऐतिहासिक सच की याद दिलाता है जहाँ सरकारी तंत्र की सुस्ती अक्सर बड़े सुधारों की बलि चढ़ा देती है। 2010 और 2018 के चुनावों में भी 'क्रीमी लेयर' और प्रमाणिक दस्तावेजों को लेकर विवाद हुए थे, लेकिन 2026 का यह संकट डिजिटल युग में 'प्रशासनिक संवेदनहीनता' का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है।

"सामाजिक न्याय के नाम पर धोखा स्वीकार्य नहीं"

अनिल मोदी ने स्पष्ट किया कि भाजपा सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की पक्षधर है। उन्होंने चेतावनी दी कि पिछड़ा वर्ग समाज के साथ किसी भी प्रकार का सौतेला व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनके अनुसार, "योग्य प्रत्याशियों को तकनीकी बहाने बनाकर नामांकन से रोकना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है और भाजपा इस मुद्दे पर ओबीसी समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है।"

प्रशासन के पास समय कम

अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है। यदि अगले 24 से 48 घंटों में प्रमाणपत्रों की बाढ़ नहीं आई, तो यह चुनावी मुकाबला सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के रूप में बदल सकता है।

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Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।