Jamshedpur Rivers: स्वर्णरेखा और खरकई बनीं कचरे का ढेर, मूर्ति विसर्जन के बाद दम तोड़ती जमशेदपुर की जीवनरेखा, प्रशासन की लापरवाही ने शहर को बनाया बीमारियों का घर
जमशेदपुर की स्वर्णरेखा और खरकई नदियों में मूर्ति विसर्जन के बाद फैले भारी प्रदूषण और प्रशासनिक नाकामी की यह कड़वी रिपोर्ट यहाँ मौजूद है। आस्था के नाम पर बहाए जा रहे जहर और भविष्य में होने वाले जल संकट की पूरी सच्चाई विस्तार से पढ़िए वरना आप स्टील सिटी की जीवनरेखा को खत्म करने वाली इस बड़ी त्रासदी को जानने से चूक जाएंगे।
जमशेदपुर—जहाँ स्वर्णरेखा और खरकई नदियाँ सिर्फ पानी नहीं, बल्कि शहर की जीवनरेखा हैं। लेकिन आज यही नदियाँ आस्था, लापरवाही और सरकारी नाकामी का सबसे बड़ा शिकार बन चुकी हैं।
हर साल मूर्ति विसर्जन के दौरान प्रशासन बड़े-बड़े दावे करता है—“इको-फ्रेंडली विसर्जन”, “स्वच्छ नदी अभियान”, “जागरूकता रैली”। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि विसर्जन के बाद नदियाँ कूड़े का ढेर बन जाती हैं।
आस्था के नाम पर प्रशासनिक फेल्योर
मूर्ति विसर्जन के नाम पर जमशेदपुर में जो कुछ हो रहा है, वह परंपरा नहीं बल्कि खुला प्रदूषण है।
मूर्ति के साथ:
प्लास्टिक
थर्माकोल
पॉलिथीन
रासायनिक रंग
पूजा का पूरा कचरा
सीधे स्वर्णरेखा और खरकई में बहा दिया जाता है।
सवाल यह है कि नगर निगम, जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आखिर क्या कर रहा है?
क्या उनकी जिम्मेदारी सिर्फ त्योहार से पहले पोस्टर लगवाने और बयान देने तक सीमित है?
राजनीति फोटो तक, जिम्मेदारी शून्य
नेता विसर्जन के समय घाटों पर पहुँचते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, आस्था की बात करते हैं—
लेकिन विसर्जन के अगले दिन न तो कोई मंत्री दिखता है, न कोई अधिकारी।
अगर व्यवस्था पहले से तय होती—
अलग विसर्जन कुंड
पूजा सामग्री का संग्रह
प्लास्टिक पर सख्ती
तो नदियाँ आज इतनी गंदी नहीं होतीं।
लेकिन सच यह है कि राजनीति आस्था पर होती है, समाधान पर नहीं।
नदी की गंदगी = जमशेदपुर की बीमारी
स्वर्णरेखा और खरकई का यही प्रदूषित पानी ज़मीन के नीचे जाकर अंडरग्राउंड ड्रिंकिंग वॉटर को ज़हरीला बना रहा है।
यही पानी शहर के हजारों घरों तक पहुँच रहा है।
परिणाम—
पेट की बीमारियाँ
त्वचा रोग
बच्चों में संक्रमण
बुज़ुर्गों की सेहत पर खतरा
यानि प्रशासन की लापरवाही की कीमत आम जनता अपनी सेहत से चुका रही है।
सरकार और जनता—दोनों कटघरे में
सरकार जनता पर दोष डालती है।
जनता सरकार पर उंगली उठाती है।
और इसी खेल में नदियाँ मरती जा रही हैं।
जमशेदपुर को अब सिर्फ भाषण नहीं, ठोस नीति चाहिए।
स्थायी विसर्जन कुंड
धार्मिक समितियों पर जवाबदेही
नगर निगम की सीधी निगरानी
नियम तोड़ने पर जुर्माना और कार्रवाई
आखिरी सवाल—कड़वा लेकिन जरूरी
जिस शहर को स्टील सिटी कहा जाता है,
अगर उसकी नदियाँ ही मर गईं,
तो विकास सिर्फ कागज़ों में बचेगा।
अब सवाल यह नहीं है कि
मूर्ति विसर्जन होगा या नहीं।
सवाल यह है कि
क्या जमशेदपुर अपनी नदियाँ बचा पाएगा या नहीं?
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