Cherchera Festival: महादान पर्व, छत्तीसगढ़ में छेरछेरा की धूम, अमीर-गरीब का भेद मिटाने निकली टोलियां, अन्नपूर्णा मईया का आशीर्वाद

छत्तीसगढ़ के लोक पर्व छेरछेरा पर माई कोठी के धान निकालने की अनूठी परंपरा और सामाजिक समानता के इस महापर्व की पूरी सांस्कृतिक गाथा यहाँ दी गई है वरना आप भी धान के कटोरे की इस सबसे बड़ी आध्यात्मिक विरासत और लोक व्यंजनों के स्वाद को जानने से चूक जाएंगे।

Jan 3, 2026 - 15:37
 0
Cherchera Festival: महादान पर्व, छत्तीसगढ़ में छेरछेरा की धूम, अमीर-गरीब का भेद मिटाने निकली टोलियां, अन्नपूर्णा मईया का आशीर्वाद
Cherchera Festival: महादान पर्व, छत्तीसगढ़ में छेरछेरा की धूम, अमीर-गरीब का भेद मिटाने निकली टोलियां, अन्नपूर्णा मईया का आशीर्वाद

बिलासपुर/रायपुर, 3 जनवरी 2026 – भारत की सांस्कृतिक विरासत में 'दान' को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है, और जब बात छत्तीसगढ़ की हो, तो यहाँ का छेरछेरा पर्व दानशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण बनकर उभरता है। पौष मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल एक फसल उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक विषमता को जड़ से मिटाने का एक आध्यात्मिक आंदोलन है। विख्यात विद्वान डॉ. राम रतन श्रीवास "राधे राधे" के अनुसार, छेरछेरा का मूल उद्देश्य समाज में अमीर-गरीब के बीच की खाई को पाटकर समानता की भावना को मजबूत करना है। जब किसान चार महीने की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद सुनहरी फसल घर लाता है, तो उसका पहला अंश समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर देता है।

"छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा": लोक संस्कृति की गूँज

इस पर्व की सबसे खूबसूरत तस्वीर तब दिखती है जब छोटे-छोटे बच्चों और युवाओं की टोलियाँ हाथ में थैले लेकर घर-घर पहुँचती हैं।

  • अनोखा आह्वान: टोलियां द्वार पर खड़ी होकर बड़े उत्साह से गाती हैं— "छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा!" इसका अर्थ है, "मईया, अपने अन्न के भंडार से दान निकालो।"

  • हठ और प्रेम: जब तक घर की महिलाएं अन्न दान नहीं देतीं, बच्चे अपनी चिर-परिचित शैली में कहते रहते हैं— "अरन बरन कोदो दरन, जब्भे देबे तब्भे टरन।" यानी जब तक दान नहीं दोगे, हम यहाँ से नहीं जाएंगे। यह मीठा हठ दानशीलता और सामूहिकता का प्रतीक है।

  • अन्न का महत्व: इस महापर्व की विशेषता यह है कि यहाँ धन (पैसा) नहीं, बल्कि जीवन के आधार 'अन्न' का दान होता है।

पौराणिक महत्व: जब शिव ने माँ अन्नपूर्णा से मांगी भिक्षा

छेरछेरा का संबंध केवल खेती से नहीं, बल्कि सतयुग की कथाओं से भी जुड़ा है।

  1. शाकंभरी जयंती: मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने स्वयं माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी ताकि सृष्टि में अन्न का संतुलन बना रहे। इसी उपलक्ष्य में यह दिन शाकंभरी देवी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

  2. सुख-समृद्धि का द्वार: लोक मान्यता है कि छेरछेरा के दिन जो व्यक्ति खुले दिल से अन्न दान करता है, उसके घर में साल भर धन-धान्य की कमी नहीं होती।

  3. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: यह पर्व किसानों द्वारा प्रकृति माता को धन्यवाद देने का तरीका है, जिन्होंने उन्हें भरपूर फसल का वरदान दिया।

छेरछेरा उत्सव: परंपरा और खान-पान (Cultural Snapshot)

श्रेणी विवरण
मुख्य तिथि पौष पूर्णिमा (जनवरी)
पारंपरिक व्यंजन आइरसा, ठेठरी, खुरमी, बोबरा, सोहारी
वाद्य यंत्र मांदर, नगाड़ा, झांझ, तुरी, मृदंग
प्रमुख नृत्य डंडा नृत्य (युवाओं द्वारा)
मूल संदेश परोपकार और सामुदायिक एकता

इतिहास और विरासत: धान के कटोरे की पहचान

छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है और यहाँ धान की हजारों औषधीय किस्में उगाई जाती हैं। ऐतिहासिक रूप से छेरछेरा का विकास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और संचय की प्रवृत्ति को त्यागने के लिए हुआ था। ग्रामीण संस्कृति का यह प्रतिबिंब सदियों से चला आ रहा है। पुराने समय में जब राजा-महाराजा होते थे, तब भी भंडारों को जनता के लिए खोल दिया जाता था। आज भी गांवों में लोग अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे मांदर और झांझ की थाप पर थिरकते हुए अपनी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए हैं।

व्यंजनों की महक: आइरसा और खुरमी का स्वाद

छेरछेरा का उत्सव छत्तीसगढ़ी पकवानों के बिना अधूरा है।

  • देसी मिठास: हर घर में विशेष रूप से आइरसा, ठेठरी, खुरमी, बोबरा और सोहारी जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं।

  • सामुदायिक भोज: दान में मिले धान और चावल का उपयोग बाद में सामूहिक भोज के लिए भी किया जाता है, जो आपसी भाईचारे को बढ़ाता है।

  • बदलता स्वरूप: शहरीकरण के कारण अब कुछ जगहों पर धान की जगह पैसे दिए जाने लगे हैं, लेकिन डॉ. राधे राधे के अनुसार, दान का वह मूल भाव आज भी वैसा ही है जैसा सैकड़ों साल पहले था।

दान ही सबसे बड़ा धर्म है

छेरछेरा हमें सिखाता है कि उत्सव तभी सार्थक है जब उसमें समाज का हर वर्ग शामिल हो। एक किसान की मेहनत और एक बच्चे की मुस्कान के बीच जब 'अन्न का दाना' सेतु बनता है, तभी सही मायने में छेरछेरा मनता है। यह पर्व परोपकार और प्रकृति के प्रति हमारी अटूट कृतज्ञता का सबसे सुंदर उदाहरण है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।