Bagbera Mess: भारी बवाल, बागबेड़ा में कचरे के ढेर पर फूटा जनता का गुस्सा, 33 महीने बाद भी सिस्टम फेल

जमशेदपुर के बागबेड़ा में कचरे की समस्या को लेकर हुई ग्राम सभा में जनता का सब्र टूट गया है। 33 महीनों के लंबे इंतजार और प्रशासन की नाकामी के बाद अब ग्रामीणों ने सरकार के खिलाफ आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है जिसकी पूरी ग्राउंड रिपोर्ट यहाँ दी गई है वरना आप भी इस गंदगी और बदहाली के पीछे की असली साजिश को कभी नहीं जान पाएंगे।

Jan 5, 2026 - 13:54
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Bagbera Mess: भारी बवाल, बागबेड़ा में कचरे के ढेर पर फूटा जनता का गुस्सा, 33 महीने बाद भी सिस्टम फेल
Bagbera Mess: भारी बवाल, बागबेड़ा में कचरे के ढेर पर फूटा जनता का गुस्सा, 33 महीने बाद भी सिस्टम फेल

जमशेदपुर/बागबेड़ा, 5 जनवरी 2026 – जमशेदपुर का उपनगरीय इलाका बागबेड़ा इस वक्त 'कचरे के ज्वालामुखी' पर बैठा है। पिछले 33 महीनों से गंदगी की मार झेल रही जनता का गुस्सा सोमवार को हुई ग्राम सभा में ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ा। जब समाधान की उम्मीद लेकर ग्रामीण पंचायत भवन पहुँचे, तो वहां किसी ठोस योजना (Concrete Plan) के अभाव ने आग में घी डालने का काम किया। आलम यह था कि मुखिया, जिला पार्षद और पंचायत प्रतिनिधियों के सामने ही ग्रामीणों ने सिस्टम की धज्जियां उड़ा दीं। बागबेड़ा की सड़कों पर फैला कचरा अब केवल एक समस्या नहीं, बल्कि प्रशासन के खिलाफ एक बड़े जन-आंदोलन की चिंगारी बन चुका है।

33 महीनों का 'धोखा': 2023 से 2026 तक सिर्फ तारीखें

बागबेड़ा की जनता का आक्रोश बेवजह नहीं है। इसके पीछे वादाखिलाफी का एक लंबा इतिहास है।

  • अप्रैल 2023 की वो सभा: आज से ठीक 33 महीने पहले, 9 अप्रैल 2023 को भी बागबेड़ा कॉलोनी पंचायत भवन में ऐसी ही एक ग्राम सभा बुलाई गई थी।

  • शुल्क पर अड़ंगा: उस समय पंचायत प्रतिनिधियों ने अपने फंड से सफाई कराने की जगह जनता पर 'सफाई शुल्क' थोपने की कोशिश की थी, जिस पर सहमति नहीं बन पाई और मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

  • शून्य परिणाम: आज 33 महीने बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है। नालियां जाम हैं, सड़कों पर कचरे के पहाड़ हैं और बीमारियां घर-घर दस्तक दे रही हैं।

ग्राम सभा में हंगामा: "प्लान लाओ या कुर्सी छोड़ो"

सोमवार को आयोजित विशेष ग्राम सभा में बागबेड़ा के सातों पंचायतों के मुखिया, पंचायत समिति सदस्य और वार्ड मेंबर मौजूद थे, लेकिन जनता के सवालों का जवाब किसी के पास नहीं था।

  1. सटीक योजना का अभाव: ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि प्रशासन और प्रतिनिधि केवल बैठकें करना जानते हैं, जबकि धरातल पर कचरा उठाने के लिए एक भी गाड़ी या डस्टबिन की व्यवस्था नहीं की गई है।

  2. आर-पार की जंग: आक्रोशित ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अब वे बैठकों के भरोसे नहीं रहेंगे। बहुत जल्द 'धरना प्रदर्शन' के माध्यम से सरकार और जिला प्रशासन के कानों तक अपनी आवाज पहुँचाएंगे।

  3. सभा का अंत: बढ़ते विरोध को देखते हुए ग्राम प्रधान ने सातों पंचायतों में अलग-अलग विशेष ग्राम सभा बुलाने और विस्तृत योजना बनाने का आश्वासन देकर आनन-फानन में सभा समाप्त कर दी।

बागबेड़ा कचरा संकट: विवाद के मुख्य बिंदु (Issue Snapshot)

विवरण स्थिति / जानकारी
समस्या की अवधि पिछले 33 महीनों से लगातार
पिछली ग्राम सभा 9 अप्रैल 2023 (असफल)
मुख्य विवाद सफाई शुल्क और ठोस कार्ययोजना की कमी
जनता का फैसला धरना और उग्र प्रदर्शन की चेतावनी
प्रभावित क्षेत्र बागबेड़ा की सातों पंचायतें

इतिहास और बदहाली: बागबेड़ा का 'सौतेला' व्यवहार

बागबेड़ा का इतिहास गवाह है कि जमशेदपुर शहर का हिस्सा होने के बावजूद इसे हमेशा बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ा है। चाहे वो पेयजल योजना हो या साफ-सफाई, बागबेड़ा की करीब 2 लाख की आबादी हमेशा नगर निकाय और पंचायत के बीच के 'ग्रे एरिया' में फंसी रही है। 1990 के दशक से ही बागबेड़ा कॉलोनी की सफाई व्यवस्था का कोई स्थायी ढांचा नहीं बन सका। ऐतिहासिक रूप से यहाँ की जनता ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ी हैं, लेकिन कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management) के नाम पर यहाँ के निवासियों को केवल 'टैक्स' और 'शुल्क' के नाम पर डराया गया है। आज की ग्राम सभा में दिखा आक्रोश इसी ऐतिहासिक उपेक्षा का परिणाम है।

सातों पंचायतों पर बढ़ता दबाव: अब क्या होगा?

बागबेड़ा के ग्राम प्रधान और सातों पंचायतों के मुखिया अब बैकफुट पर हैं।

  • विशेष ग्राम सभा: अब हर पंचायत में अलग से बैठकें होंगी, लेकिन सवाल वही है—क्या फंड उपलब्ध है? या फिर से जनता की जेब पर डाका डालने की तैयारी है?

  • प्रशासनिक चुप्पी: जिला प्रशासन की ओर से अब तक इस कचरा संकट पर कोई बड़ी पहल नहीं दिखी है, जिससे लोगों का भरोसा सिस्टम से पूरी तरह उठ चुका है।

  • बीमारियों का डर: स्थानीय युवाओं का कहना है कि कचरे के कारण मच्छर और संक्रामक बीमारियां फैल रही हैं, जिससे बागबेड़ा के बच्चों का स्वास्थ्य खतरे में है।

समझौतों का वक्त खत्म, अब संघर्ष की बारी

बागबेड़ा की जनता ने साफ कर दिया है कि उन्हें अब 'चर्चा' नहीं 'चमचमाती सड़कें' चाहिए। 33 महीने का धैर्य अब आंदोलन में बदलने वाला है। यदि आने वाले दिनों में सातों पंचायतों की विशेष सभा में कोई ठोस नतीजा नहीं निकला, तो जमशेदपुर का यह इलाका 'चक्का जाम' और 'प्रशासनिक घेराव' का केंद्र बन जाएगा।

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Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।