GuruJi Legacy: गणित के उस्ताद से संघ के शिखर पुरुष तक: श्री गुरुजी की अनसुनी दास्तां, ठुकरा दिया था शंकराचार्य का पद

19 फरवरी को जन्मे एमएस गोलवलकर 'श्री गुरुजी' ने कैसे प्रोफेसर से सरसंघचालक तक का सफर तय किया और क्यों उन्होंने शंकराचार्य बनने का गौरव ठुकरा दिया? उनके जीवन से जुड़े इन अद्भुत प्रसंगों को यहाँ विस्तार से पढ़िए वरना आप भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय मिस कर देंगे।

Feb 20, 2026 - 15:50
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GuruJi Legacy: गणित के उस्ताद से संघ के शिखर पुरुष तक: श्री गुरुजी की अनसुनी दास्तां, ठुकरा दिया था शंकराचार्य का पद
GuruJi Legacy: गणित के उस्ताद से संघ के शिखर पुरुष तक: श्री गुरुजी की अनसुनी दास्तां, ठुकरा दिया था शंकराचार्य का पद

विशेष लेख, 19 फरवरी 2026 – भारतीय सार्वजनिक जीवन में माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी) का नाम एक ऐसे तपस्वी के रूप में दर्ज है, जिन्होंने पद की लालसा के बिना एक राष्ट्रव्यापी संगठन को खड़ा किया। 19 फरवरी 1906 को नागपुर में जन्मे गुरुजी का जीवन अनुशासन और राष्ट्र-समर्पण की मिसाल है। उनकी मेधा ऐसी थी कि बचपन में ही वे शिक्षकों की समस्या का समाधान कर देते थे और काशी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहने के दौरान उनके ज्ञान के कारण विद्यार्थी उन्हें सम्मान से 'गुरुजी' कहने लगे, जो बाद में उनकी स्थायी पहचान बन गई।

मेधा और अध्यात्म का संगम

माधव बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे।

  • बाइबिल प्रसंग: नागपुर के कॉलेज में उन्होंने अपनी स्मरण शक्ति से प्रधानाचार्य को भी अचंभित कर दिया था।

  • संगीत प्रेम: वे न केवल पढ़ाई में अव्वल थे, बल्कि सितार और बाँसुरी बजाने में भी माहिर थे।

  • दीक्षा: उन्होंने रामकृष्ण मिशन के स्वामी अखंडानंद से आध्यात्मिक दीक्षा ली, जिसने उनके वैचारिक आधार को और मजबूत किया।

संघ का नेतृत्व और अग्निपरीक्षा

डॉ. हेडगेवार के बाद 1940 में उन्होंने संघ की कमान संभाली। उनके नेतृत्व में संगठन ने देश के कोने-कोने में अपनी जड़ें जमाईं।

  1. प्रतिबंध का दौर: 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगा, तो गुरुजी ने धैर्य और संयम से कठिन परिस्थितियों का सामना किया।

  2. संविधान निर्माण: उन्होंने ही संघ को एक व्यवस्थित लिखित संविधान और आधुनिक सांगठनिक ढांचा प्रदान किया।

श्री गुरुजी: संक्षिप्त परिचय (Quick Look)

मुख्य विवरण जानकारी
जन्म 19 फरवरी 1906 (नागपुर)
शिक्षा एम.एससी. (काशी हिंदू विश्वविद्यालय)
सरसंघचालक 1940 से 1973 तक
महान त्याग शंकराचार्य पद को विनम्रतापूर्वक नकारा

तप और त्याग की मूर्ति

श्री गुरुजी का जीवन सिखाता है कि महानता पद से नहीं, बल्कि उद्देश्य की पवित्रता से मिलती है। उनका जन्मदिवस हमें राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण और सांस्कृतिक गौरव की याद दिलाता है।

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Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।