Jharkhand Survey: झारखंड में ट्रांसजेंडरों का सर्वे, क्या मिलेगा उन्हें असली पहचान और अधिकार?
झारखंड में ट्रांसजेंडरों की पहचान और कल्याण के लिए राज्यव्यापी सर्वे कराने का आदेश दिया गया है। जानिए यह सर्वे कैसे बदलेगा उनकी जिंदगी और उन्हें कौन-कौन सी योजनाओं से जोड़ा जाएगा।
झारखंड में ट्रांसजेंडरों को मुख्यधारा में लाने के लिए बड़ा कदम उठाया गया है। राज्य की मुख्य सचिव अलका तिवारी ने मंगलवार को ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की बैठक में निर्देश दिया कि ट्रांसजेंडरों का राज्यव्यापी सर्वे कराया जाए। उनका कहना है कि सर्वे से ही पता चलेगा कि झारखंड में ट्रांसजेंडरों की जिलावार संख्या कितनी है, उनकी जरूरतें क्या हैं और वे किन योजनाओं से लाभान्वित होना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि सही जानकारी मिलने के बाद सरकार उनके कल्याण के लिए फंड और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था आसानी से कर सकेगी। साथ ही उन्हें विभिन्न योजनाओं से जोड़ना भी आसान होगा। बैठक में सामने आया कि ट्रांसजेंडर अपनी पहचान सार्वजनिक करने में हिचकिचाते हैं। इससे उन्हें पहचान पत्र, आरक्षण, पेंशन, आयुष्मान कार्ड, गरिमा गृह निर्माण जैसी योजनाओं से जोड़ने में कठिनाई होती है।
इस समस्या का समाधान निकालने के लिए मुख्य सचिव ने जिलास्तरीय समिति के गठन पर बल दिया। प्रत्येक जिले में उपायुक्त की अध्यक्षता में समिति बनेगी जो ट्रांसजेंडरों की समस्याओं को दूर करेगी। बैठक में यह भी तय हुआ कि ट्रांसजेंडर सपोर्ट यूनिट का गठन किया जाएगा। यह यूनिट उनकी समस्याओं का समाधान करेगी और बोर्ड को आवश्यक अनुशंसाएँ देगी।
बैठक में गृह सचिव वंदना दादेल, समाज कल्याण एवं महिला-बाल विकास सचिव मनोज कुमार, वित्त सचिव प्रशांत कुमार, ग्रामीण विकास सचिव के श्रीनिवासन समेत अन्य अधिकारी उपस्थित थे। सभी ने सर्वे और कल्याण योजनाओं को प्रभावी बनाने पर सहमति जताई।
जानकारी के अनुसार, पूरे भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार ट्रांसजेंडरों की कुल संख्या 4,87,803 है। इनमें झारखंड में 13,463 ट्रांसजेंडर रहते हैं। सरकार उनकी मदद के लिए कई योजनाएँ चला रही है। ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड विभिन्न विभागों को योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन में सहयोग प्रदान करता है।
इस कदम से ट्रांसजेंडरों को सामाजिक सुरक्षा, पहचान और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा। साथ ही यह समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल होगी। अब देखना होगा कि यह सर्वे और नई योजनाएँ कितनी प्रभावी साबित होती हैं और ट्रांसजेंडरों की ज़िंदगी में कितना बदलाव लाती हैं। क्या ये पहल उन्हें असली पहचान दिला पाएगी? यही सवाल सबकी जुबान पर है।
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