Army Legend: फील्ड मार्शल के.एम. करिअप्पा की वे अनसुनी कहानियां, जिन्होंने बदल डाला भारतीय सेना का भाग्य, जानें कैसे एक 'कुर्ग' लड़का बना देश का पहला कमांडर-इन-चीफ

भारतीय सेना के पहले भारतीय सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल के.एम. करिअप्पा के जीवन और उनके अदम्य साहस की पूरी गाथा यहाँ मौजूद है। 1947 के कश्मीर युद्ध से लेकर 1949 में सेना की कमान संभालने तक के ऐतिहासिक संघर्ष को विस्तार से पढ़िए वरना आप भारत के इस महान योद्धा और उनके 'राष्ट्र प्रथम' के सिद्धांतों को जानने से चूक जाएंगे।

Jan 28, 2026 - 14:15
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Army Legend: फील्ड मार्शल के.एम. करिअप्पा की वे अनसुनी कहानियां, जिन्होंने बदल डाला भारतीय सेना का भाग्य, जानें कैसे एक 'कुर्ग' लड़का बना देश का पहला कमांडर-इन-चीफ
Army Legend: फील्ड मार्शल के.एम. करिअप्पा की वे अनसुनी कहानियां, जिन्होंने बदल डाला भारतीय सेना का भाग्य, जानें कैसे एक 'कुर्ग' लड़का बना देश का पहला कमांडर-इन-चीफ

नई दिल्ली, 28 जनवरी 2026 – आज का दिन भारतीय सैन्य इतिहास के उस महानायक को याद करने का है, जिनकी आवाज़ में अनुशासन की गूँज थी और जिनकी आँखों में अखंड भारत का सपना। हम बात कर रहे हैं फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा की, जिनका जन्म आज ही के दिन यानी 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक के कोडागु (कुर्ग) में हुआ था। वह केवल एक सैन्य अधिकारी नहीं थे, बल्कि वह पहले भारतीय थे जिन्होंने गोरे साहबों के दौर में सेना की कमान अपने हाथों में ली और यह साबित किया कि भारतीय नेतृत्व दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है।

कुर्ग की मिट्टी से मेसोपोटामिया के मोर्चे तक

करिअप्पा का जन्म एक ऐसे समुदाय में हुआ था जिसे 'सैनिकों की खान' कहा जाता है। बचपन से ही अनुशासन को अपना धर्म मानने वाले करिअप्पा की शिक्षा मद्रास में हुई।

  • विश्व युद्ध का अनुभव: 1918 में जब उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में कदम रखा, तो किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन वह इसके सर्वोच्च पद पर बैठेंगे।

  • रणभूमि की वीरता: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इराक (मेसोपोटामिया) और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा के जंगलों में उनकी रणनीतिक सूझबूझ ने अंग्रेजों को भी उनका मुरीद बना दिया।

1947 का कश्मीर युद्ध: जब पाकिस्तान को सिखाया सबक

आजादी के तुरंत बाद भारत पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया था। उस नाजुक दौर में करिअप्पा ने पश्चिमी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में कमान संभाली।

  1. अजेय रणनीति: उनकी योजना इतनी सटीक थी कि भारतीय सेना ने न केवल पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ा, बल्कि कश्मीर के एक बड़े हिस्से को आजाद भी कराया।

  2. सैनिकों के मसीहा: वह युद्ध के मैदान में केवल निर्देश नहीं देते थे, बल्कि खुद मोर्चे पर रहकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाते थे।

फील्ड मार्शल करिअप्पा: उपलब्धियों का सफरनामा (Historical Snapshot)

महत्वपूर्ण घटना वर्ष उपलब्धि (Achievement)
जन्म 28 जनवरी 1899 कर्नाटक के कुर्ग जिले में जन्म
सेना की कमान 15 जनवरी 1949 पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने
सेवानिवृत्ति 1953 सेना से विदाई, पर सेवा जारी रही
फील्ड मार्शल 1986 भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान से अलंकृत
निधन 15 मई 1993 94 वर्ष की आयु में अंतिम विदाई

फील्ड मार्शल: वह पद जो केवल दो को मिला

भारतीय सेना में 'फील्ड मार्शल' का पद सर्वोच्च और मानद होता है। करिअप्पा यह सम्मान पाने वाले भारत के दूसरे अधिकारी थे (पहले सैम मानेकशॉ थे)। 1986 में उन्हें इस पदवी से नवाजा गया। दिलचस्प बात यह है कि सेना से रिटायर होने के बाद भी वह ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के हाई कमिश्नर के रूप में देश की सेवा करते रहे।

अंतिम विदाई और विरासत

15 मई 1993 को 94 साल की उम्र में इस महान योद्धा ने अंतिम सांस ली। उनकी विरासत आज भी हमारे कैडेट्स को सिखाती है कि नेतृत्व केवल आदेश देना नहीं, बल्कि साथ मिलकर लड़ना है। करिअप्पा का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र के प्रति समर्पण से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।

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Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।