Bokaro Elephant: बोकारो में बेटे को बचाने के चक्कर में काल बना हाथी, गर्दन में दांत घुसाकर पिता को उतारा मौत के घाट, दरहाबेडा गांव में मची भयंकर तबाही
बोकारो के गोमिया में हाथियों के झुंड द्वारा किए गए खौफनाक हमले और एक पिता के सर्वोच्च बलिदान की पूरी रिपोर्ट यहाँ मौजूद है। बेटे की जान बचाते हुए अपनी गर्दन हाथी के दांतों पर गंवाने वाले करमचंद सोरेन की रूह कंपा देने वाली दास्तां विस्तार से पढ़िए वरना आप झारखंड के जंगलों में बढ़ते इस सबसे बड़े खतरे की हकीकत जानने से चूक जाएंगे।
बोकारो/गोमिया, 25 जनवरी 2026 – झारखंड के बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड में एक ऐसी हृदयविदारक घटना घटी है, जिसने 'पिता के प्रेम' और 'वनराज के क्रोध' की एक अमिट गाथा लिख दी है। कंडेर पंचायत के दरहाबेडा गांव में शनिवार की काली रात मौत बनकर आई। 6 हाथियों के एक झुंड ने जब गांव पर हमला किया, तो एक साधारण से ग्रामीण करमचंद सोरेन ने अपनी जान की परवाह किए बिना मौत से लड़ने का फैसला किया। अपने परिवार और कलेजे के टुकड़े (बेटे) को बचाने की कोशिश में करमचंद ने जो सहा, उसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। हाथी ने न केवल घर उजाड़ा, बल्कि करमचंद की गर्दन में अपने विशाल दांत घुसाकर उसे वहीं ढेर कर दिया।
आधी रात का तांडव: जब दीवारें ढहने लगीं
रात के सन्नाटे में जब पूरा गांव गहरी नींद में था, तभी हाथियों की चिंघाड़ ने सबको नींद से जगा दिया।
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खतरे की दस्तक: करीब 6 हाथियों का झुंड जंगल से निकलकर सीधे रिहायशी इलाके में घुस आया। झुंड ने सबसे पहले करमचंद के घर को निशाना बनाया और उसकी कच्ची दीवारें तोड़ने लगा।
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पिता का बलिदान: खतरे को भांपते ही करमचंद सक्रिय हुआ। उसने सबसे पहले अपनी पत्नी और छोटे बच्चे को खिड़की या पीछे के रास्ते से सुरक्षित बाहर निकाला।
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खौफनाक अंत: जब वह अपने बड़े बेटे को बचाने के लिए दोबारा घर के भीतर घुसा, तभी एक विशालकाय हाथी ने उसे अपनी चपेट में ले लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हाथी ने अपने दांत करमचंद की गर्दन में उतार दिए और उसे हवा में लहराकर जमीन पर पटक दिया।
घायल बेटा और दहशत में डूबा गांव
हाथी के इस हमले में करमचंद का बेटा भी गंभीर रूप से जख्मी हुआ है। ग्रामीणों ने शोर मचाकर हाथियों को वहां से खदेड़ा, लेकिन तब तक करमचंद दम तोड़ चुका था।
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अस्पताल में भर्ती: घायल बेटे को आनन-फानन में स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी हालत नाजुक बनी हुई है।
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वन विभाग की एंट्री: घटना की सूचना मिलने के बाद वन विभाग की टीम रविवार सुबह गांव पहुँची। टीम ने शव को कब्जे में लिया है और मुआवजे की प्रक्रिया शुरू की है।
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रतजगा: हाथियों का झुंड अभी भी पास के झाड़ियों और जंगल क्षेत्र में छिपा हुआ है, जिसके कारण पूरा दरहाबेडा गांव दहशत में है। लोग मशालें जलाकर रात भर पहरा दे रहे हैं।
गोमिया हाथी हमला: मुख्य विवरण (Conflict Snapshot)
| विवरण | प्रमुख जानकारी (Key Details) |
| मृतक का नाम | करमचंद सोरेन (निवासी: दरहाबेडा) |
| हाथियों की संख्या | 6 हाथियों का झुंड |
| घटना का समय | शनिवार देर रात |
| स्थान | कंडेर पंचायत, गोमिया (बोकारो) |
| वर्तमान स्थिति | इलाके में वन विभाग का हाई अलर्ट |
इतिहास का पन्ना: छोटानागपुर के जंगलों में 'हाथी-मानव' संघर्ष का काला इतिहास
झारखंड का बोकारो और गोमिया इलाका ऐतिहासिक रूप से हाथियों के पुराने गलियारे (Elephant Corridor) का हिस्सा रहा है। 19वीं शताब्दी के ब्रिटिश गजेटियर बताते हैं कि हजारीबाग और गिरिडीह के घने जंगलों से होते हुए हाथी ओडिशा की ओर इसी रास्ते से कूच करते थे। इतिहास गवाह है कि जब तक जंगल घने थे, हाथियों और इंसानों के बीच एक मौन समझौता था। लेकिन 1970 और 80 के दशक में कोयला खनन और तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने हाथियों के रास्ते रोक दिए। साल 2010 के बाद गोमिया के क्षेत्रों में हाथियों के हमले की दर में 40% की वृद्धि दर्ज की गई है। करमचंद सोरेन की मौत उसी ऐतिहासिक त्रासदी का हिस्सा है, जहाँ जंगलों के सिमटने के कारण 'गजराज' अब इंसानी बस्तियों को अपना दुश्मन समझने लगे हैं। 2026 में भी यह संघर्ष कम होने के बजाय और भी हिंसक होता जा रहा है।
प्रशासन की चेतावनी: "जंगल की ओर न जाएं"
वन विभाग ने ग्रामीणों को कड़ी चेतावनी दी है कि वे अकेले जंगल की ओर न निकलें और कच्ची दीवारों के पास न सोएं।
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सर्च ऑपरेशन: वन विभाग की टीम हाथियों के झुंड को वापस सुरक्षित जंगल में भेजने के लिए ट्रेंकुलाइजर गन और एक्सपर्ट्स की मदद लेने पर विचार कर रही है।
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मुआवजा: सरकारी प्रावधानों के तहत मृतक के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है, लेकिन गांव वालों का कहना है कि पैसा किसी की जान वापस नहीं ला सकता।
एक अधूरा परिवार और अनसुलझा डर
करमचंद सोरेन ने एक पिता का फर्ज तो निभाया, लेकिन उनके पीछे उनका परिवार अब बेसहारा हो गया है। दरहाबेडा गांव में पसरा मातम चीख-चीख कर पूछ रहा है कि आखिर कब तक इंसानी बस्तियां इन भारी-भरकम पैरों के नीचे कुचली जाती रहेंगी?
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