Bahragora Blast : बहरागोड़ा में दूसरे विश्व युद्ध के दो महाशक्तिशाली अमेरिकी बम डिफ्यूज, 5 KM का इलाका खाली, धमाके से दहल उठी धरती
बहरागोड़ा की सुवर्णरेखा नदी में मिले 80 साल पुराने दो अमेरिकी 'एएन-एम64' बमों को सेना ने नियंत्रित विस्फोट से उड़ा दिया है। 227 किलो वजनी इन जिंदा बमों के फटने से हुए जोरदार धमाके और 5 किलोमीटर के दायरे में मचे खौफ की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट यहाँ देखें।
बहरागोड़ा, 25 मार्च 2026 – झारखंड के बहरागोड़ा थाना क्षेत्र अंतर्गत पानीपड़ा-नागसुड़ाई इलाके में बुधवार को वह 'महा-धमाका' हुआ, जिसकी गूँज से पूरा कोल्हान थर्रा उठा। सुवर्णरेखा नदी के किनारे बालू खनन के दौरान मिले द्वितीय विश्व युद्ध काल के दो विशालकाय अमेरिकी बमों को भारतीय सेना के विशेषज्ञ दस्ते ने सफलतापूर्वक डिफ्यूज कर दिया है। 227-227 किलोग्राम वजनी ये दोनों बम पिछले 80 सालों से नदी की रेत में दफन थे, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि ये आज भी पूरी तरह 'जिंदा' और सक्रिय थे। सेना ने बुधवार को एक बेहद जटिल और खतरनाक 'कंट्रोल्ड ब्लास्ट' ऑपरेशन के जरिए इन्हें निष्क्रिय किया। धमाका इतना जबरदस्त था कि ग्रामीणों को एक पल के लिए लगा जैसे भूकंप आ गया हो और धरती डोलने लगी हो।
5 KM का घेरा और छावनी में तब्दील इलाका
ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए दिल्ली से सेना की विशेष बम निरोधक टीम को बुलाया गया था। सुरक्षा के इंतजाम इतने कड़े थे कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।
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इलाका खाली कराया: धमाके की तीव्रता को देखते हुए 5 किलोमीटर के दायरे को पूरी तरह खाली करा लिया गया था। पुलिस बल ने चप्पे-चप्पे पर पहरा बिठा दिया था ताकि कोई भी व्यक्ति गलती से भी घटना स्थल की ओर न जा सके।
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मिट्टी की बोरियों का कवच: बमों को नदी किनारे करीब 100 मीटर गहरे गड्ढे में रखा गया। विस्फोट के प्रभाव को कम करने के लिए गड्ढे के ऊपर 500 से अधिक मिट्टी की बोरियां रखी गई थीं, ताकि मलबा दूर तक न उड़े।
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ग्रामीणों का खौफ: एक प्रत्यक्षदर्शी ग्रामीण ने बताया कि धमाका इतना तेज था कि लगा जैसे कान के पर्दे फट जाएंगे। पूरा आसमान धुएं और धूल के गुबार से भर गया था।
'एएन-एम64' और 'मेड इन यूएसए': 80 साल पुराना मौत का सामान
7 मार्च को जब मजदूर बालू निकाल रहे थे, तब मिट्टी के नीचे से सिलेंडरनुमा ये आकृतियां निकली थीं। जांच में सेना ने पाया कि ये कोई साधारण कचरा नहीं बल्कि खतरनाक हथियार हैं।
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अमेरिकी तकनीक: बमों पर साफ तौर पर ‘एएन-एम64’ और ‘मेड इन यूएसए’ लिखा हुआ था। विशेषज्ञों के अनुसार, ये जनरल पर्पस बम हैं जिनका इस्तेमाल दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी वायुसेना करती थी।
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कैसे पहुँचे यहाँ: आशंका है कि युद्ध के दौरान किसी मित्र देश के सैन्य विमान से ये बम गलती से यहाँ गिरे होंगे। चूंकि उस समय यहाँ नरम रेत और कीचड़ था, इसलिए ये अंदर धंसते चले गए और ऑक्सीजन की कमी के कारण फटे नहीं।
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कलाईकुंडा कनेक्शन का खंडन: कुछ लोग इसे 2018 के प्लेन क्रैश से जोड़ रहे थे, लेकिन बमों की प्राचीन स्थिति और उन पर अंकित चिह्नों ने पुष्टि कर दी कि इनका संबंध 1940 के दशक से ही है।
बहरागोड़ा का सामरिक इतिहास और सुवर्णरेखा का रहस्य
सुवर्णरेखा नदी का यह तट इतिहास के कई गहरे राज अपने सीने में दफन किए हुए है।
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ब्रिटिश-अमेरिकी एयरबेस: द्वितीय विश्व युद्ध के समय अविभाजित बंगाल और बिहार (अब झारखंड) का यह हिस्सा मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के लिए एक बड़ा केंद्र था। पास ही स्थित चाकुलिया और धालभूमगढ़ एयरबेस से बमवर्षक विमान उड़ान भरते थे।
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80 साल तक 'जिंदा' रहने का विज्ञान: विशेषज्ञों का कहना है कि रेत और कीचड़ के स्थिर वातावरण ने बम के भीतर के केमिकल को सुरक्षित रखा। ऑक्सीजन न होने की वजह से इसमें जंग नहीं लगी और इसके भीतर का 'फ्यूज' सक्रिय बना रहा।
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बालू खनन और सुरक्षा: इस घटना ने अवैध बालू खनन पर भी सवाल उठाए हैं। अगर मजदूरों की कुदाल या खुदाई मशीन बम के नाजुक हिस्से से टकरा जाती, तो पूरा गांव नक्शे से मिट सकता था।
अगला कदम: जांच और भविष्य की सतर्कता
सेना ने बमों को नष्ट करने के बाद मलबे के नमूनों को एकत्र किया है ताकि यह समझा जा सके कि क्या इलाके में और भी ऐसे विस्फोटक दफन हो सकते हैं।
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मलबे का डिस्पोजल: ब्लास्ट के बाद बचे हुए लोहे के अवशेषों को सेना अपने साथ ले गई है। पुलिस अब ग्रामीणों को वापस उनके घरों में जाने की अनुमति दे रही है।
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इलाके की स्कैनिंग: स्थानीय प्रशासन ने मांग की है कि नदी के उन क्षेत्रों की 'मेटल डिटेक्टर' से जांच कराई जाए जहाँ बालू खनन होता है, ताकि भविष्य में ऐसी किसी और अनहोनी से बचा जा सके।
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बालू माफियाओं पर नकेल: जिला प्रशासन ने साफ कर दिया है कि सुरक्षा मानकों के बिना अब नदी के इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की खुदाई की अनुमति नहीं दी जाएगी।
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