Jamshedpur Music: जमशेदपुर के नेताजी सुभाष विश्वविद्यालय में हुई अद्भुत वायलिन प्रस्तुति, संगीतकार दुर्गा शर्मा ने एक राग में छिपाया पूरा इतिहास, हॉल में छाया अध्यात्म
नेताजी सुभाष विश्वविद्यालय में 'स्पिक मैके' के सहयोग से आयोजित वायलिन वादन कार्यक्रम मनमोहक रहा। प्रसिद्ध शास्त्रीय वादक श्रीमती दुर्गा शर्मा ने भावपूर्ण अलाप, जोर-झाला और बंदिशें प्रस्तुत कीं। कुलपति डॉ. प्रभात पाणि ने शास्त्रीय कलाओं के महत्व पर जोर दिया और कहा कि यह 'हिंदुस्तानी शास्त्रीय परंपरा पर एक जीवंत ट्यूटोरियल' था।
जमशेदपुर, 20 नवंबर 2025 – जमशेदपुर में शास्त्रीय संगीत की धारा को युवाओं तक पहुँचाने के उद्देश्य से नेताजी सुभाष विश्वविद्यालय (Netaji Subhash University) में 'स्पिक मैके' (SPIC MACAY) के सहयोग से एक भव्य वायलिन वादन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम सिर्फ एक संगीत प्रस्तुति नहीं था, बल्कि यह भारतीय शास्त्रीय संगीत (Indian Classical Music) की शाश्वत सुंदरता का एक जीवंत उत्सव था, जिसमें विश्वविद्यालय के विद्यार्थी, संकाय सदस्य और कला प्रेमी बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण राष्ट्रीय स्तर की कलाकार, प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय वायलिन वादक श्रीमती दुर्गा शर्मा की उपस्थिति रही, जिन्होंने अपनी गहन महारत से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रस्तुति ने यह एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय शास्त्रीय कलाएं आज भी युवाओं के बीच कितनी प्रासंगिक हैं।
वायलिन की जादुई ध्वनि: दुर्गा शर्मा ने जी डाली जान
श्रीमती दुर्गा शर्मा, जो वायलिन पर अपनी तकनीक और भावनाओं के सहज मिश्रण के लिए जानी जाती हैं, ने प्रत्येक राग को उसके शुद्धतम सार में जीवंत कर दिया।
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संगीत का सार: पूरे गायन के दौरान, श्रीमती शर्मा द्वारा भावपूर्ण अलाप (Alaap), गतिशील जोर-झाला (Jor-Jhala) और सुंदर संरचित बंदिशों (Bandishes) के साथ हॉल वायलिन की समृद्ध ध्वनि से गूंजता रहा। यह प्रस्तुति एक संगीत शो से कहीं ज्यादा थी—यह हिंदुस्तानी शास्त्रीय परंपरा पर एक जीवंत ट्यूटोरियल की तरह थी।
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ज्ञानवर्धक सत्र: श्रीमती शर्मा ने केवल वादन ही नहीं किया, बल्कि विद्यार्थियों के साथ संक्षेप में बातचीत भी की और अपने द्वारा प्रस्तुत रागों की उत्पत्ति और भावों के बारे में बताकर सत्र को ज्ञानवर्धक बनाया।
कुलपति ने कहा: कला पूर्ण विकसित युवाओं के लिए ज़रूरी
कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन कुलपति प्रो. डॉ. प्रभात पाणि ने किया।
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विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता: प्रो. पाणि ने भारत की समृद्ध कलात्मक परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय की गहरी प्रतिबद्धता पर जोर दिया।
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कलाओं का महत्व: उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि शास्त्रीय कलाओं से परिचय, पूर्ण विकसित और सांस्कृतिक रूप से जागरूक युवाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
धन्यवाद ज्ञापन और सांस्कृतिक समृद्धि
सांस्कृतिक समिति की सहायक प्रोफेसर दीपिका कुमारी ने मंच संचालन करते हुए श्रीमती शर्मा की प्रस्तुति की सराहना की।
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आध्यात्मिक अनुभव: उन्होंने कहा कि श्रीमती शर्मा ने प्रत्येक रचना को भक्ति और कुशलता के साथ प्रस्तुत किया, जिससे श्रोताओं को एक ऐसा अनुभव मिला जो एक साथ मंत्रमुग्ध करने वाला और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध करने वाला था।
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समापन: कार्यक्रम का समापन सांस्कृतिक समिति द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ-साथ सांस्कृतिक समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए नेताजी सुभाष विश्वविद्यालय के समर्पण की पुष्टि की गई।
इस एक दिवसीय कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के अधिष्ठाता, विभागाध्यक्ष, प्रशासनिक और अकादमिक पदाधिकारी, संकाय सदस्य और बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे।
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