Jamshedpur Dialogue: जमशेदपुर में टाटा स्टील के संवाद पर उठे गंभीर सवाल, आदिवासी समाज ने कहा- 7 पीढ़ी से जमीन हड़पी गई, लेकिन नहीं मिली नौकरी
टाटा स्टील के 4 दिवसीय संवाद को आदिवासी समाज ने 'दिखावा' बताया है। स्थानीय जमीन मालिकों ने कंपनी पर जमीन हड़पने का आरोप लगाया है। रोजगार और सम्मान न मिलने से टाटा स्टील पर गंभीर सवाल उठे हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भविष्य में आदिवासियों में असंतोष बढ़ सकता है।
जमशेदपुर, 20 नवंबर 2025 – जमशेदपुर के बिष्टुपुर इलाके में स्थित टाटा स्टील द्वारा अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) और आदिवासी समाज के लिए आयोजित चार दिवसीय 'संवाद' (Dialogue) पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय जमीन मालिकों और उनके वंशजों ने स्पष्ट आरोप लगाया है कि इस संवाद का उद्देश्य वास्तविक मुद्दों, जैसे जमीन और रोजगार, को दबाना और आदिवासी समाज को बहलाने-फुसलाने का काम करना मात्र था। जमशेदपुर का इतिहास गवाह है कि इस औद्योगिक शहर की नींव ही आदिवासी समुदाय की जमीनों पर रखी गई थी, लेकिन आज भी वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह विरोध अब केवल बातचीत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सीधे तौर पर कंपनी की 5 बड़ी नीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।
जमीन हड़पने का आरोप: नौकरी न मिलने पर आक्रोश
आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्षों पहले टाटा स्टील ने जिस तरह से उनकी जमीनें अधिग्रहित कीं, उसके बदले में उन्हें न तो उचित सम्मान मिला और न ही रोजगार के पर्याप्त अवसर।
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मूल सवाल: स्थानीय लोगों का सीधा सवाल है कि क्या टाटा स्टील के पास वास्तविक रूप से जमीन थी या सिर्फ एक बड़ी कंपनी होने के नाते आदिवासियों से ठगी करके उसे हड़प लिया गया।
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रोजगार की मांग: समुदाय के प्रतिनिधियों का आरोप है कि कंपनी ने जमीन दाताओं या उनके परिवार के लोगों को कंपनी में नौकरी देने की कोई ठोस पहल नहीं की। इसका नतीजा यह हुआ है कि जमीन देने वाले परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति आज भी कमजोर बनी हुई है।
संवाद सिर्फ दिखावा: असली समस्या से मुंह मोड़ना
स्थानीय समाजसेवी और भूमि मालिकों ने कंपनी के इस चार दिवसीय संवाद आयोजन पर भी गहरी आपत्ति जताई।
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भ्रमित करने की कोशिश: उनका कहना है कि इस तरह के “संवाद” आयोजन केवल दिखावे के लिए हैं, जिनका उद्देश्य वास्तविक समस्या को छुपाना और समाज को भ्रमित करना है।
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न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं: स्थानीय समुदाय का मानना है कि टाटा स्टील ने आदिवासी समाज के साथ कभी भी न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं किया है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: असन्तोष बढ़ने का खतरा
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर टाटा स्टील ने जल्द ही इस मुद्दे पर उचित पारदर्शिता, सम्मान और रोजगार की गारंटी नहीं दी, तो भविष्य में आदिवासी समाज में असंतोष और विरोध की लहर बढ़ सकती है।
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ठोस कदम की जरूरत: आदिवासी समाज का स्पष्ट कहना है कि अब सिर्फ बातचीत से काम नहीं चलेगा। कंपनी को ठोस कदम उठाने होंगे और जवाबदेही तय करनी होगी।
यह विवाद सिर्फ जमीन और नौकरी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सम्मान और अधिकार का है, जो शहर बसाने के लिए अपनी जमीन कुर्बान करने वाले मूल निवासियों को मिलना चाहिए था।
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