Guru Angad: गुरु अंगद देव जी ने गढ़ी गुरुमुखी की नींव, लंगर और मल्ल अखाड़ा से समाज में फूंकी नई जान, सेवा की मिसाल

सिखों के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी के जीवन का वह प्रेरणादायक सफर यहाँ देखें जिसमें उन्होंने गुरुमुखी लिपि का मानकीकरण किया और लंगर प्रथा को सामाजिक समानता का सबसे बड़ा हथियार बनाया।

Mar 28, 2026 - 15:37
Mar 28, 2026 - 15:38
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Guru Angad: गुरु अंगद देव जी ने गढ़ी गुरुमुखी की नींव, लंगर और मल्ल अखाड़ा से समाज में फूंकी नई जान, सेवा की मिसाल
Guru Angad: गुरु अंगद देव जी ने गढ़ी गुरुमुखी की नींव, लंगर और मल्ल अखाड़ा से समाज में फूंकी नई जान, सेवा की मिसाल

भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में सिख गुरुओं का योगदान केवल धर्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने समाज को एक नई दिशा, नई लिपि और समरसता का पाठ पढ़ाया। सिखों के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी (१५०४-१५५२) का जीवन सेवा, समर्पण और अनुशासन का एक ऐसा जीवंत उदाहरण है, जिसने सिख धर्म की नींव को और भी सुदृढ़ किया। आज के दौर में, जब समाज जाति और ऊंच-नीच के भेदभाव में बंटा हुआ है, गुरु अंगद देव जी के उपदेश और उनके द्वारा स्थापित परंपराएं अत्यंत प्रासंगिक हैं।

गुरु अंगद देव जी का जन्म ३१ मार्च १५०४ को पंजाब के मुक्तसर जिले के 'मत्ते दी सराय' में हुआ था। उनके बचपन का नाम 'लहणा' था। वे एक संपन्न परिवार से थे और देवी दुर्गा के अनन्य भक्त थे। हर साल वे भक्तों के एक जत्थे का नेतृत्व कर ज्वालाजी की यात्रा पर जाते थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।एक दिन उन्होंने भाई जोधा जी के मुख से गुरु नानक देव जी की वाणी सुनी। उन शब्दों ने लहणा जी के भीतर एक आध्यात्मिक हलचल पैदा कर दी। उन्होंने करतारपुर जाकर गुरु नानक देव जी से मिलने का निश्चय किया। जब वे गुरु नानक से मिले, तो उनके व्यक्तित्व और वचनों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना सब कुछ त्याग कर गुरु चरणों में सेवा करने का संकल्प ले लिया। गुरु नानक देव जी ने उनकी कड़ी परीक्षाएं लीं, जिनमें वे हर बार खरे उतरे। उनकी अटूट श्रद्धा को देखकर गुरु नानक देव जी ने उन्हें अपने गले से लगाया और कहा— "तू मेरा अंग है, आज से तेरा नाम 'अंगद' होगा।" इस प्रकार, १५३९ में वे सिखों के दूसरे गुरु बने।

गुरुमुखी लिपि का आविष्कार: शिक्षा की क्रांति

गुरु अंगद देव जी का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी योगदान 'गुरुमुखी' लिपि का मानकीकरण और प्रचार था। उस समय शिक्षा और धर्मग्रंथ केवल संस्कृत जैसी जटिल भाषाओं तक सीमित थे, जिन्हें आम जनता नहीं समझ पाती थी। गुरु साहिब ने महसूस किया कि यदि आध्यात्मिक ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है, तो उसे लोकभाषा में लाना होगा।उन्होंने पंजाबी की वर्णमाला को व्यवस्थित किया और उसे 'गुरुमुखी' (गुरु के मुख से निकली) का नाम दिया। उन्होंने बच्चों के लिए बाल-बोध (कायदे) बनवाए और खुद उन्हें पढ़ाया। उन्होंने गुरु नानक देव जी की वाणियों को संकलित किया और उन्हें गुरुमुखी में लिखवाया। इस कदम ने न केवल साक्षरता बढ़ाई, बल्कि उच्च वर्ग के बौद्धिक एकाधिकार को भी चुनौती दी। आज पंजाबी भाषा का जो स्वरूप हम देखते हैं, उसका श्रेय गुरु अंगद देव जी के दूरदर्शी प्रयासों को ही जाता है।

लंगर प्रथा और सामाजिक समानता

गुरु नानक देव जी द्वारा शुरू की गई 'लंगर' (सामुदायिक रसोई) की परंपरा को गुरु अंगद देव जी ने एक संस्थागत रूप दिया। उन्होंने जात-पात, धर्म और वर्ग के भेदभाव को जड़ से खत्म करने के लिए यह अनिवार्य किया कि जो भी गुरु से मिलने आएगा, उसे पहले 'पंगत' (एक कतार) में बैठकर लंगर छकना होगा।इस सेवा में उनकी पत्नी, माता खीवी जी का योगदान अतुलनीय रहा। वे स्वयं लंगर की देखरेख करती थीं और प्रेमपूर्वक भोजन परोसती थीं। लंगर केवल भूख मिटाने का साधन नहीं था, बल्कि यह सामाजिक क्रांति का एक मंच था जहाँ राजा और रंक, ब्राह्मण और अछूत एक साथ बैठकर भोजन करते थे। इसने समाज में भाईचारे और समानता के बीज बोए।
शारीरिक स्वास्थ्य और 'मल्ल अखाड़ा'
गुरु अंगद देव जी का मानना था कि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का निवास होता है। उन्होंने आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ शारीरिक फिटनेस पर भी जोर दिया। उन्होंने खडूर साहिब में 'मल्ल अखाड़ों' (कुश्ती के मैदानों) का निर्माण कराया। वे युवाओं को कुश्ती, व्यायाम और खेलों के लिए प्रोत्साहित करते थे। यह उस समय के धार्मिक गुरुओं की सोच से बिल्कुल अलग था, जो केवल तप और वैराग्य की बात करते थे। गुरु साहिब ने सिखाया कि धर्म का मार्ग कायरों का नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत इंसानों का है।

गुरु साहिब ने कुल ६३ श्लोकों की रचना की, जो श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। उनकी वाणी में अहंकार के त्याग, गुरु के प्रति समर्पण और निष्काम सेवा पर बल दिया गया है। वे कहते थे कि मनुष्य को अपने भीतर के 'हउमै' (अहंकार) को मारना चाहिए, क्योंकि यही ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। उनके जीवन का मूल मंत्र था— "सेवा करो, मेवा न मांगो।"

पंजाब के तरनतारन जिले में स्थित खडूर साहिब केवल एक नगर नहीं, बल्कि सिख इतिहास की वह पवित्र धरती है, जहाँ दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी ने अपने गुरुगद्दी काल के १३ वर्ष (१५३९-१५५२) व्यतीत किए। इस स्थान को 'आठ गुरु साहिबान की चरण स्पर्श प्राप्त धरती' होने का गौरव प्राप्त है, लेकिन गुरु अंगद देव जी के काल में यह सिख धर्म के प्रचार-प्रसार का मुख्य केंद्र बनकर उभरा।नगर की स्थापना और गुरु साहिब का आगमन 
खडूर साहिब एक प्राचीन गाँव था, लेकिन इसे आध्यात्मिक पहचान तब मिली जब गुरु नानक देव जी के आदेशानुसार गुरु अंगद देव जी यहाँ आकर बस गए। गुरु नानक देव जी ने ज्योति-जोत समाने से पहले भाई लहणा जी (गुरु अंगद देव जी) को निर्देश दिया था कि वे खडूर साहिब को अपना कार्यक्षेत्र बनाएँ। यहाँ रहकर उन्होंने सिख मत की नींव को संगठित और संस्थागत रूप दिया।

२९ मार्च १५५२ को ४८ वर्ष की आयु में गुरु अंगद देव जी ज्योति-जोत समा गए। अपने अंतिम समय में उन्होंने अपने शिष्यों और पुत्रों में से सबसे योग्य व्यक्ति, गुरु अमर दास जी को अपना उत्तराधिकारी चुना, जो उम्र में उनसे काफी बड़े थे। यह चयन फिर से योग्यता और सेवा भाव पर आधारित था, न कि पारिवारिक संबंधों पर।

गुरु अंगद देव जी का जीवन हमें सिखाता है कि महानता पद से नहीं, बल्कि सेवा और विनम्रता से आती है। उन्होंने शिक्षा, भाषा, स्वास्थ्य और सामाजिक समानता के जो प्रतिमान स्थापित किए, वे आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं। गुरुमुखी के रूप में उन्होंने पंजाब को उसकी पहचान दी और लंगर के माध्यम से दुनिया को मानवता का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया। आज जब हम उनके महान व्यक्तित्व को याद करते हैं, तो हमारे लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके द्वारा बताए गए 'सेवा और सिमरन' के मार्ग पर चलें।

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Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।