Jamtara Death : जामताड़ा सदर अस्पताल में 3 साल के अंशु ने तोड़ा दम, भड़के लोगों ने फूंका स्वास्थ्य मंत्री का पुतला
जामताड़ा सदर अस्पताल में इलाज के अभाव में 3 साल के मासूम अंशु साव की मौत से पूरे शहर में उबाल है। आक्रोशित जनता ने स्वास्थ्य मंत्री का पुतला दहन कर अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती की मांग की है। 26 साल बाद भी जामताड़ा की स्वास्थ्य व्यवस्था क्यों बदहाल है, इसकी पूरी रिपोर्ट यहाँ देखें।
जामताड़ा/झारखंड, 13 मार्च 2026 – जामताड़ा जिले से एक ऐसी हृदयविदारक खबर सामने आई है जिसने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की कलई खोलकर रख दी है। शुक्रवार को सदर अस्पताल में इलाज के दौरान 3 साल के मासूम अंशु साव की मौत हो गई। पिता शंटू साव अपने जिगर के टुकड़े को बचाने के लिए अस्पताल के चक्कर काटते रहे, लेकिन समय पर सही इलाज और विशेषज्ञ डॉक्टर न मिलने के कारण अंशु ने दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद जामताड़ा की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा और लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
चंचला माता चौक पर फूटा गुस्सा: मंत्री का पुतला दहन
मासूम की मौत की खबर फैलते ही शहर के लोग चंचला माता मंदिर चौक पर इकट्ठा होने लगे।
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पुतला दहन: आक्रोशित प्रदर्शनकारियों ने झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी का पुतला दहन किया। लोगों का कहना है कि जिले का प्रतिनिधित्व करने वाले मंत्री के होते हुए भी यहाँ का अस्पताल 'रेफरल सेंटर' बनकर रह गया है।
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लचर व्यवस्था का आरोप: प्रदर्शनकारियों ने स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। उनका आरोप है कि अस्पताल में न तो बच्चों के लिए दवाएं हैं और न ही आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए कोई विशेषज्ञ।
उपायुक्त को ज्ञापन: 24 घंटे बाल रोग विशेषज्ञ की मांग
हंगामे के बाद स्थानीय नागरिकों का एक प्रतिनिधिमंडल उपायुक्त (DC) रवि आनंद से मिला और उन्हें एक ज्ञापन सौंपा।
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विशेषज्ञ की कमी: लोगों ने डीसी को बताया कि सदर अस्पताल में 24 घंटे बाल रोग विशेषज्ञ (Paediatrician) की उपलब्धता अनिवार्य की जाए।
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गरीबों की बेबसी: जामताड़ा एक पिछड़ा इलाका है। यहाँ के लोग इतने सक्षम नहीं हैं कि वे अपने बच्चों को इलाज के लिए रांची, धनबाद या दुर्गापुर के बड़े प्राइवेट अस्पतालों में ले जा सकें। उनके लिए सदर अस्पताल ही एकमात्र सहारा है, जो अब 'यमराज का घर' साबित हो रहा है।
26 साल का जिला, लेकिन सुविधाएं अब भी शून्य
जामताड़ा को दुमका से अलग होकर जिला बने 26 साल बीत चुके हैं।
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विकास की कछुआ चाल: इन ढाई दशकों में शहर की आबादी कई गुना बढ़ गई, लेकिन अस्पताल का ढांचा आज भी पुराना है। जामताड़ा का इतिहास रहा है कि यहाँ राजनीतिक सरगर्मियां तो तेज रहती हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर केवल आश्वासन मिलते रहे हैं।
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बिना ICU के बच्चे: आज भी यहाँ बच्चों के लिए एक आधुनिक आईसीयू (NICU/PICU) की सुविधा नहीं है। इतिहास गवाह है कि जामताड़ा में पहले भी कई मासूमों ने केवल 'रेफर' किए जाने के दौरान रास्ते में ही दम तोड़ दिया है। अंशु की मौत इसी लंबी और दुखद श्रृंखला की अगली कड़ी है।
पीड़ितों का दर्द: "आंखों के सामने दम तोड़ते देखा"
प्रदर्शन में शामिल जितेंद्र कुमार सिंह ने रुंधे गले से बताया कि उन्होंने अपने ही बच्चे को इलाज के अभाव में दम तोड़ते देखा है। आकाश साव ने कहा कि अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है, जिससे मरीजों को भारी परेशानी होती है।
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प्रमुख उपस्थिति: इस प्रदर्शन में राजकुमार यादव, निशा रवानी, रूपा बाबरी, छोटू साहू, गौरव मंडल, कैलाश सिंह और अनिल साहू समेत सैकड़ों लोग शामिल थे। सभी ने एक सुर में कहा कि अब केवल आश्वासनों से काम नहीं चलेगा, धरातल पर बदलाव चाहिए।
जामताड़ा में 3 साल के अंशु की मौत केवल एक बच्चे की मौत नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की हार है जो 26 साल में भी अपने नागरिकों को एक बाल रोग विशेषज्ञ तक उपलब्ध नहीं करा सका। स्वास्थ्य मंत्री का पुतला फूंकना जनता की उसी बेबसी और गुस्से का प्रतीक है। अब देखना यह है कि उपायुक्त के दखल के बाद सदर अस्पताल की तस्वीर बदलती है या फिर एक और मासूम की मौत का इंतजार किया जाएगा।
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