Jamshedpur Shock: 40 साल की सेवा के बाद तार कंपनी ने छठ घाट से खींचे हाथ, समिति में आक्रोश!
जमशेदपुर के जेम्को बस स्टैंड छठ घाट पर 40 सालों से सेवा दे रही तार कंपनी ने इस बार सहायता से इनकार कर दिया। समिति और श्रद्धालुओं में आक्रोश। क्या प्रशासन इस पर ध्यान देगा?

जमशेदपुर, विवाद: जेम्को बस स्टैंड छठ घाट पर हर साल छठ पर्व की तैयारियों में मदद करने वाली ISWP तार कंपनी ने इस साल सहयोग से साफ इनकार कर दिया। 40 सालों से चली आ रही परंपरा को तोड़ते हुए कंपनी ने कहा कि अब इसकी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की है। इस फैसले से छठ समिति और व्रतधारियों में भारी आक्रोश है।
समिति के अध्यक्ष महेश चौरसिया ने कहा,
"हमारे छठ घाट की व्यवस्थाओं में तार कंपनी का अहम योगदान रहा है। अब जब उन्होंने हाथ खींच लिया है, तो हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। यह सिर्फ एक घाट की बात नहीं, बल्कि एक परंपरा को खत्म करने की साजिश है!"
40 सालों की परंपरा अचानक क्यों टूटी?
ISWP तार कंपनी पिछले चार दशकों से छठ पर्व के दौरान घाट की सफाई, पानी की टंकियों, सफाईकर्मियों, लाइटिंग और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराती थी।
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हर साल छठ समिति कंपनी से सहयोग मांगती थी, और कंपनी सहर्ष यह सहायता प्रदान करती थी।
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इस बार जब समिति के लोग कंपनी के प्रबंधन से मिलने पहुंचे, तो जवाब मिला – "अब जिला प्रशासन से मांग कीजिए।"
क्या यह सिर्फ फंडिंग की समस्या है, या इसके पीछे कोई और साजिश?
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क्या कंपनी को घाट की सेवा से हटाने के लिए ऊपर से कोई दबाव डाला गया है?
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क्या औद्योगिक क्षेत्र की कंपनियों को सामाजिक जिम्मेदारियों से दूर करने की कोई नई नीति बनाई जा रही है?
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या फिर कंपनी घाट को गोद लेने से खुद को बचाने के लिए यह बहाना बना रही है?
समिति में आक्रोश, कंपनी के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी!
छठ समिति के अध्यक्ष महेश चौरसिया और अन्य सदस्यों ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि वे इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ेंगे।
"अगर तार कंपनी ने अपना फैसला वापस नहीं लिया, तो छठ पर्व से पहले हम बड़ा विरोध प्रदर्शन करेंगे।"
समिति के अन्य सदस्यों ने भी नाराजगी जताई:
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देवनाथ शर्मा: "छठ महापर्व झारखंड और बिहार के लोगों की आस्था से जुड़ा है। अगर कोई कंपनी इतने सालों तक मदद करती आ रही है, तो अब अचानक पीछे क्यों हट रही है?"
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अनिल प्रकाश: "हमें बताया जाए कि आखिर क्या कारण है कि कंपनी अब सहयोग नहीं करना चाहती?"
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लक्ष्मण ठाकुर: "हम इसे चुपचाप सहन नहीं करेंगे। जिला प्रशासन और कंपनी को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।"
क्या अब जिला प्रशासन लेगा जिम्मेदारी?
कंपनी ने तो अपना हाथ खींच लिया, लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या जिला प्रशासन इस पर ध्यान देगा?
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घाटों की सफाई, रोशनी और जलापूर्ति के लिए प्रशासन क्या करेगा?
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क्या छठ समिति को प्रशासन से कोई सहायता मिलेगी?
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क्या प्रशासन जल्द ही कोई समाधान निकाल पाएगा या यह मुद्दा विवाद का रूप ले लेगा?
क्या यह छठ महापर्व की तैयारियों में बाधा डालेगा?
छठ महापर्व की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
छठ महापर्व न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी झारखंड और बिहार की पहचान है।
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सूर्य देव की उपासना का यह पर्व सदियों से चला आ रहा है।
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इसमें घाटों की स्वच्छता और सुविधाएं बेहद महत्वपूर्ण होती हैं।
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जमशेदपुर, रांची और धनबाद जैसे औद्योगिक शहरों में छठ घाटों की सफाई में कंपनियों की भूमिका अहम रही है।
लेकिन अगर अब कंपनियां पीछे हटने लगेंगी, तो आने वाले वर्षों में यह परंपरा मुश्किल में पड़ सकती है।
स्थानीय नेता और जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं?
अभी तक इस विवाद पर कोई भी जनप्रतिनिधि या प्रशासनिक अधिकारी खुलकर सामने नहीं आया है।
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क्या इस मामले में सरकार दखल देगी?
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क्या कोई और उद्योग इस घाट को गोद लेने के लिए आगे आएगा?
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या फिर इस बार श्रद्धालुओं को बिना सुविधाओं के ही छठ मनाना पड़ेगा?
समिति की मांग है कि जिला प्रशासन जल्द ही इस मामले में हस्तक्षेप करे और इस समस्या का समाधान निकाले।
क्या होगा आगे?
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छठ समिति तार कंपनी के इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन करने की तैयारी कर रही है।
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समिति ने जिला प्रशासन से अगले कुछ दिनों में ठोस कदम उठाने की अपील की है।
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अगर कोई समाधान नहीं निकला, तो यह मुद्दा छठ पर्व से पहले बड़ा विवाद बन सकता है।
आस्था बनाम उद्योग नीति!
क्या यह सामाजिक जिम्मेदारियों से बचने की चाल है या फिर किसी नई नीति के तहत कंपनियों को सेवा से पीछे हटने को कहा जा रहा है?
क्या इस फैसले को बदला जा सकता है या फिर श्रद्धालुओं को अब खुद ही व्यवस्था करनी होगी?
छठ महापर्व पर इस तरह की विवादित स्थिति ने लाखों श्रद्धालुओं को चिंता में डाल दिया है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर क्या निर्णय लेता है।
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