Chandil Elephant Attack: बाकरकुड़ी में हाथियों का तांडव, रात भर जागने को मजबूर हुए ग्रामीण और मची भारी तबाही
चांडिल के बाकरकुड़ी में हाथियों ने मचाया भारी उत्पात और घरों को किया जमींदोज। कहीं आपके गांव की ओर तो नहीं बढ़ रहा यह झुंड, अभी देखें पूरी रिपोर्ट।
चांडिल: जंगलों से निकलकर बस्तियों की ओर बढ़ते गजराज अब ग्रामीणों के लिए काल बन गए हैं। कुकड़ू प्रखंड के बाकरकुड़ी गांव में बीती रात जो कुछ भी हुआ, उसने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। 6 से 7 जंगली हाथियों के एक झुंड ने गांव में घुसकर ऐसी तबाही मचाई कि लोग अपने ही घरों को छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए।
आधी रात का खौफ: जब टूटने लगीं घर की दीवारें
बाकरकुड़ी गांव के लोग गहरी नींद में थे, तभी हाथियों के चिंघाड़ने की आवाज ने सन्नाटा चीर दिया। देखते ही देखते हाथियों ने रिहायशी इलाके में धावा बोल दिया। इस हमले में कई कच्चे घरों को हाथियों ने पल भर में मलबे में तब्दील कर दिया। अनाज की तलाश में हाथियों ने एक दुकान को भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया, जिससे पीड़ित परिवार का रोजगार भी छिन गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों का यह झुंड बेहद आक्रामक है। वे न केवल घरों को नुकसान पहुँचा रहे हैं, बल्कि खेतों में लगी फसलों को भी पैरों तले रौंद रहे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर इन परिवारों के सामने अब सिर छुपाने और दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
सापारुम और डाटम जंगल बने हाथियों का ठिकाना
चांडिल अनुमंडल के भौगोलिक परिवेश पर नजर डालें तो यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ है। हाथियों का यह झुंड पिछले कई दिनों से डाटम और सापारुम जंगल के बीच आवाजाही कर रहा है। दिन के उजाले में हाथी घने जंगलों में छिपे रहते हैं और सूरज ढलते ही भोजन की तलाश में गांवों की ओर रुख करते हैं।
हाल ही में सापारुम जंगल में एक व्यक्ति को हाथियों द्वारा कुचलकर मार डालने की घटना ने इस दहशत को और बढ़ा दिया है। लोग अब शाम होते ही घरों में कैद हो जाते हैं या फिर हाथ में मशाल और पटाखे लेकर रात भर पहरा देते हैं।
हाथियों के आतंक का पुराना सिलसिला
चांडिल और आसपास के क्षेत्रों में मानव-हाथी संघर्ष का मामला नया नहीं है। वर्षों से हाथियों के कॉरिडोर (corridor) में मानवीय दखल और जंगलों की कटाई ने इन विशालकाय जीवों को गांवों की ओर धकेला है।
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दशक भर का संघर्ष: पिछले 10 सालों में इस क्षेत्र में हाथियों के हमले में दर्जनों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
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पारंपरिक उपाय हुए नाकाम: पहले ग्रामीण आग जलाकर या नगाड़े बजाकर हाथियों को खदेड़ देते थे, लेकिन अब हाथी इन आवाजों के अभ्यस्त हो चुके हैं और पीछे हटने के बजाय हमलावर हो जाते हैं।
आक्रोश में ग्रामीण: प्रशासन से ठोस कदम की मांग
बाकरकुड़ी की घटना के बाद ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का आरोप है कि वन विभाग की टीम सूचना मिलने के घंटों बाद पहुँचती है और उनके पास हाथियों को खदेड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें:
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हाथियों के झुंड को ट्रेंकुलाइज कर या सुरक्षित तरीके से दलमा के जंगलों की ओर खदेड़ा जाए।
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जिन परिवारों के घर और दुकानें टूटी हैं, उन्हें तत्काल सरकारी मुआवजा दिया जाए।
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गांवों के पास टॉर्च और पटाखों की व्यवस्था कराई जाए ताकि रात में बचाव हो सके।
क्या कहता है वन विभाग?
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि हाथियों की निगरानी की जा रही है, लेकिन झुंड में शावक होने की वजह से वे अधिक आक्रामक हो गए हैं। ग्रामीणों को सलाह दी गई है कि वे हाथियों के करीब न जाएं और न ही उन्हें उकसाएं।
सतर्कता ही बचाव है: अगर आप भी इन प्रभावित क्षेत्रों के आसपास रहते हैं, तो अकेले जंगल की ओर न जाएं और हाथियों के आने की सूचना तुरंत स्थानीय प्रशासन को दें। रफ़्तार और लापरवाही की तरह, जंगली जीवों के साथ यह संघर्ष भी जानलेवा साबित हो सकता है।
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