Ayodhya Singh Upadhyay : हिंदी काव्य के सम्राट का अनसुना सच, खड़ीबोली को ऐसे बनाया शिखर की भाषा
हरिऔध जी ने खड़ीबोली को फर्श से अर्श तक पहुँचाया और 'प्रियप्रवास' जैसे महाकाव्य से हिंदी को नई पहचान दी। साहित्य के इस अनसुने इतिहास को जानकर आप भी दंग रह जाएंगे।
आज़मगढ़: साहित्य की दुनिया में आज एक ऐसे महानायक का जिक्र हो रहा है जिसने हिंदी कविता की दिशा बदल दी। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’—यह वह नाम है जिसने उस दौर में खड़ीबोली को काव्य की भाषा बनाने का साहस किया, जब लोग इसे सिर्फ गद्य के लायक समझते थे। आज उनकी जयंती पर देश उन्हें याद कर रहा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक सरकारी अधिकारी से 'महाकवि' बनने तक का उनका सफर कितना संघर्षपूर्ण था।
ब्रजभाषा का अंत और आधुनिक हिंदी का उदय
एक समय था जब माना जाता था कि कविता सिर्फ ब्रजभाषा में ही मीठी लग सकती है। सूर और मीरा की उस विरासत के बीच खड़ीबोली को नीरस माना जाता था। हरिऔध जी ने इस धारणा को जड़ से उखाड़ फेंका। उन्होंने साबित किया कि खड़ीबोली में भी वही करुणा और माधुर्य घोला जा सकता है जो ब्रजभाषा में है।
उन्होंने संस्कृत की गरिमा और उर्दू की मिठास का ऐसा मेल तैयार किया कि हिंदी साहित्य को उसका पहला महाकाव्य 'प्रियप्रवास' मिला। यह वह दौर था जब भारतीय समाज अपनी पहचान खोज रहा था और हरिऔध जी ने उसे अपनी भाषा के जरिए स्वाभिमान दिया।
'प्रियप्रवास': जब भगवान कृष्ण को मिला आधुनिक स्वरूप
1914 में जब 'प्रियप्रवास' प्रकाशित हुआ, तो साहित्य जगत में हड़कंप मच गया। हरिऔध जी ने इसमें श्रीकृष्ण के मथुरा गमन की कथा को सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर उतारा। राधा का विरह और यशोदा की ममता को उन्होंने जिस तरह पिरोया, उसने उन्हें हिंदी का 'सूरदास' बना दिया।
उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया, जो उस समय का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता था। उन्होंने दिखा दिया कि आधुनिक भाषा में भी प्राचीन गौरव को जीवित रखा जा सकता है।
इतिहास के झरोखे से: आज़मगढ़ की वह माटी जिसने दिया महाकवि
15 अप्रैल 1865 को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ (निजामाबाद) में जन्में हरिऔध जी का पालन-पोषण एक अत्यंत सुसंस्कृत परिवार में हुआ।
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बहुभाषी विद्वान: वे केवल हिंदी के ही नहीं, बल्कि संस्कृत और उर्दू के भी प्रकांड पंडित थे। यही कारण था कि उनकी भाषा में एक खास तरह का ठहराव और गहराई दिखती है।
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कानूनगो से प्राध्यापक तक: जीवन यापन के लिए उन्होंने सरकारी नौकरी (कानूनगो) की, लेकिन उनका मन हमेशा शब्दों की साधना में लगा रहा। बाद में उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएँ दीं और कई महान साहित्यकारों की खेप तैयार की।
व्यंग्य और करुणा: हरिऔध की विविध शैलियाँ
हरिऔध जी केवल विरह के कवि नहीं थे। उनकी लेखनी में समाज के प्रति तीखापन भी था।
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सामाजिक व्यंग्य: 'चोखे चौपदे' और 'चुभते चौपदे' में उन्होंने समाज की विसंगतियों पर करारा प्रहार किया।
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नारी संवेदना: 'वैदेही-वनवास' में उन्होंने माता सीता के निर्वासन की उस पीड़ा को उकेरा है जिसे पढ़कर आज भी आँखें नम हो जाती हैं।
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भाषा परिष्कार: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ मिलकर उन्होंने हिंदी व्याकरण को शुद्ध करने और उसे एक मानक रूप देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
साहित्य के सूर्य का अस्त होना
16 मार्च 1947 को, देश की आजादी से ठीक कुछ महीने पहले, इस महान साधक ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्होंने स्वतंत्र भारत को अपनी आँखों से तो नहीं देखा, लेकिन उनकी रचनाओं ने जिस राष्ट्रीय चेतना का निर्माण किया, उसी के दम पर आज हिंदी विश्व पटल पर गर्व से खड़ी है।
संदेश: हरिऔध जी का जीवन हमें सिखाता है कि अगर आपके पास दृष्टि और साहस है, तो आप एक पूरी भाषा का भविष्य बदल सकते हैं। आज की पीढ़ी को उनके 'प्रियप्रवास' की गहराई को दोबारा समझने की जरूरत है।
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