Job Burnout : India Burnout बढ़ता खतरा! नौकरी और जिंदगी के बीच पिसती नई पीढ़ी
क्या आप भी ऑफिस के बढ़ते दबाव और काम के तनाव से जूझ रहे हैं? भारत में आधे से ज्यादा लोग Burnout Syndrome का शिकार हो चुके हैं। जानिए इसके लक्षण, कारण और बचाव के उपाय।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कामकाजी लोग Burnout Syndrome के तेजी से शिकार हो रहे हैं। ऑफिस का बढ़ता दबाव, घर-परिवार की जिम्मेदारियां और डिजिटल वर्क कल्चर लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। न्यूयॉर्क के बिजनेस प्रोसेस मैनेजमेंट प्लेयर 'वर्टेक्स' द्वारा भारत में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, 50% से अधिक प्रोफेशनल्स बर्नआउट के शिकार हैं।
कोरोना के बाद बढ़ी मुश्किलें! वर्क-लाइफ बैलेंस पूरी तरह गड़बड़ाया
महामारी के बाद से कार्य संस्कृति में बड़ा बदलाव आया है। वर्क फ्रॉम होम का दौर तो खत्म हो गया, लेकिन इसका असर अब भी लोगों पर बना हुआ है। कंपनियों की बढ़ती टारगेट बेस्ड वर्क पॉलिसी और हाइब्रिड वर्क सिस्टम ने वर्क-लाइफ बैलेंस को पूरी तरह से खत्म कर दिया है।
काम का इतना दबाव हो गया है कि ऑफिस के बाद भी लोग मोबाइल, लैपटॉप और वर्चुअल मीटिंग्स में उलझे रहते हैं। इतना ही नहीं, छुट्टी के दिन भी ऑफिस से जुड़े रहने की मजबूरी ने लोगों की पर्सनल लाइफ को खत्म कर दिया है।
70-90 घंटे वर्किंग की सलाह: काम या अत्याचार?
हाल ही में, भारत के बड़े उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट लीडर्स ने वर्किंग आवर्स बढ़ाने की वकालत की।
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इंफोसिस के नारायण मूर्ति ने कहा कि युवाओं को 70 घंटे काम करना चाहिए।
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L&T के चेयरमैन एस.एन. सुब्रह्मण्यम ने तो 90 घंटे तक काम करने की सलाह दी।
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नीति आयोग के पूर्व CEO अमिताभ कांत ने भी 80-90 घंटे तक काम करने की पैरवी की।
हालांकि, इस बयान पर भारी विरोध हुआ, क्योंकि पहले से ही वर्क प्रेशर से परेशान कर्मचारी और अधिक घंटे काम करके अपनी सेहत दांव पर नहीं लगा सकते।
Burnout Syndrome क्या है? 50 साल पहले आया था चर्चा में
1974 में हर्बर्ट फ्रायडेनबर्गर ने पहली बार 'बर्नआउट सिंड्रोम' का नाम दिया था। उस समय इसे गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन अब यह एक बड़ी मानसिक और शारीरिक बीमारी बन चुकी है।
बर्नआउट के लक्षण:
शारीरिक लक्षण: सिरदर्द, थकान, नींद न आना, वजन घटना, कमजोरी
मनोवैज्ञानिक लक्षण: तनाव, चिड़चिड़ापन, चिंता, उदासी, अनिर्णय
व्यवहारगत प्रभाव: गुस्सा, काम से ऊब, सामाजिक दूरी
Digital Work Culture बना सबसे बड़ा विलेन! छुट्टी के दिन भी नहीं मिलती राहत
आज की डिजिटल दुनिया में ऑफिस का काम सिर्फ ऑफिस तक सीमित नहीं रह गया है।
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ऑफिस के बाद भी फोन कॉल, ईमेल और मैसेज से जुड़े रहना जरूरी हो गया है।
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हाइब्रिड वर्क सिस्टम के कारण वीकेंड्स पर भी काम करना पड़ता है।
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वर्क फ्रॉम होम के बाद कंपनियों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं, जिससे प्रेशर और ज्यादा बढ़ गया है।
Burnout से बचने के लिए क्या करें?
बर्नआउट से बचने के लिए सिर्फ व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि कंपनियों को भी पॉलिसी में बदलाव करना होगा।
काम और निजी जीवन में बैलेंस बनाएं।
सप्ताह में एक दिन पूरी तरह से डिजिटल डिटॉक्स करें।
योग, व्यायाम और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दें।
ऑफिस का काम ऑफिस में खत्म करने की आदत डालें।
नियोक्ता को कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी।
काम जरूरी, लेकिन सेहत सबसे पहले!
अगर कंपनियां चाहती हैं कि उनके कर्मचारी बेस्ट परफॉर्मेंस दें, तो उन्हें वर्क-लाइफ बैलेंस को प्राथमिकता देनी होगी। बर्नआउट सिर्फ एक मेंटल हेल्थ इश्यू नहीं, बल्कि एक सामाजिक समस्या बन चुका है। अगर अभी इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में इसका असर सिर्फ व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरी कार्य संस्कृति पर पड़ेगा।
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