Budget Demand: आम बजट में दिव्यांगों के लिए 'इलेक्ट्रिक व्हीलचेयर' और 'बैरियर फ्री' भारत की मांग, जमशेदपुर की प्रोफेसर सुदीप्ता दास ने उठाई समावेशी विकास की गूंज
आगामी सरकारी बजट में दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जमशेदपुर की प्रोफेसर सुदीप्ता दास द्वारा प्रस्तावित क्रांतिकारी मांगों की पूरी रिपोर्ट यहाँ मौजूद है। निःशुल्क इलेक्ट्रिक व्हीलचेयर से लेकर बैरियर-फ्री सार्वजनिक संस्थानों तक के विजन को विस्तार से पढ़िए वरना आप समावेशी भारत के इस सबसे बड़े बजट एजेंडे को जानने से चूक जाएंगे।
जमशेदपुर, 28 जनवरी 2026 – देश में जब भी आम बजट की चर्चा होती है, तो मध्यम वर्ग, किसान और उद्योगपतियों की आवाज़ें सबसे तेज़ होती हैं। लेकिन इस बार लौहनगरी जमशेदपुर से एक ऐसी आवाज़ उठी है, जो समाज के उस हिस्से की बात कर रही है जिसे अक्सर 'सहानुभूति' तो मिलती है, पर 'सुविधा' नहीं। ग्रेजुएट कॉलेज, जमशेदपुर की वाणिज्य विभाग की सहायक प्राध्यापक सुदीप्ता दास ने आगामी सरकारी बजट में दिव्यांगजनों (PwDs) के लिए समावेशी विकास और आत्मनिर्भरता का एक ठोस खाका पेश किया है। उनकी मांग स्पष्ट है: दिव्यांगों को दया की नहीं, बल्कि उस तकनीक और बुनियादी ढांचे की जरूरत है जो उन्हें समाज की मुख्यधारा में बराबरी से खड़ा कर सके।
पांच सूत्रीय मांग: व्हीलचेयर से लेकर 'बैरियर फ्री' एक्सेस तक
प्रोफेसर सुदीप्ता दास ने सरकार के सामने कुछ ऐसी मांगें रखी हैं, जो अगर पूरी होती हैं, तो करोड़ों दिव्यांगों का जीवन पूरी तरह बदल सकता है।
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निःशुल्क इलेक्ट्रिक व्हीलचेयर योजना: यह इस बजट प्रस्ताव की सबसे बड़ी मांग है। इलेक्ट्रिक व्हीलचेयर मिलने से दिव्यांग छात्र और कामकाजी लोग बिना किसी की मदद के कॉलेज, ऑफिस और सामाजिक आयोजनों में जा सकेंगे।
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अनिवार्य रैम्प और एक्सेसिबिलिटी: हर सार्वजनिक स्थान, चाहे वह छोटा पार्क हो या बड़ा मॉल, वहां रैम्प की व्यवस्था को अनिवार्य कानून बनाने की बात कही गई है।
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दिव्यांग-अनुकूल शौचालय: स्वच्छता और गरिमा हर नागरिक का अधिकार है। सार्वजनिक शौचालयों का आधुनिकीकरण कर उन्हें दिव्यांगों की शारीरिक जरूरतों के हिसाब से तैयार करना समय की मांग है।
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बैरियर-फ्री इंफ्रास्ट्रक्चर: सरकारी भवनों और परिवहन व्यवस्था को 'बाधा मुक्त' बनाना ताकि एक दिव्यांग व्यक्ति बिना किसी झिझक के सफर कर सके।
नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी: "सहानुभूति नहीं, सम्मान चाहिए"
प्रोफेसर सुदीप्ता का मानना है कि जिस प्रकार देश डिजिटल इंडिया और विकसित भारत की ओर बढ़ रहा है, उस दौड़ में दिव्यांग पीछे नहीं छूटने चाहिए।
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बजट में वृद्धि: शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में दिव्यांग-कल्याण योजनाओं के लिए आवंटित राशि में भारी बढ़ोतरी की आवश्यकता है।
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आत्मनिर्भरता का मंत्र: सुविधा मिलने पर दिव्यांगजन बोझ नहीं, बल्कि देश की जीडीपी (GDP) में योगदान देने वाले नागरिक बनेंगे।
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समान अवसर: समावेशी बजट ही सच्चे लोकतंत्र और विकास की पहचान है।
दिव्यांग कल्याण बजट 2026: एक नज़र में मांगें (Key Budgetary Demands)
| मुख्य मांग | अपेक्षित परिणाम (Expected Impact) |
| इलेक्ट्रिक व्हीलचेयर | परनिर्भरता खत्म, शिक्षा और रोजगार में सुगमता |
| बैरियर-फ्री परिवहन | सुरक्षित और स्वतंत्र आवाजाही |
| आधुनिक शौचालय | स्वच्छता, गरिमा और स्वास्थ्य सुरक्षा |
| बजट आवंटन में वृद्धि | नई योजनाओं और रिसर्च को बढ़ावा |
| अनिवार्य रैम्प | सार्वजनिक स्थानों पर समान भागीदारी |
जमशेदपुर से उठी मांग का व्यापक असर
प्रोफेसर सुदीप्ता दास द्वारा उठाई गई ये मांगें केवल जमशेदपुर की नहीं, बल्कि देश के उन 2.68 करोड़ दिव्यांगों (2011 की जनगणना के अनुसार) की आवाज़ हैं जो आज भी एक अदद रैम्प या सुलभ परिवहन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शिक्षा जगत से आई इस मांग ने वित्त मंत्रालय तक यह संदेश पहुँचाया है कि विकास तब तक अधूरा है जब तक वह 'समावेशी' न हो।
बजट 2026 से उम्मीदें
अब सबकी नजरें आगामी सरकारी बजट पर टिकी हैं। क्या सरकार प्रोफेसर सुदीप्ता दास के इन विजनरी सुझावों को शामिल करेगी? क्या 'विकसित भारत' में दिव्यांगों को उनका हक और सम्मान मिलेगा?
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