Karam Singh: अकेले 8 बार पाकिस्तान को धूल चटाई, गोलियां खत्म हुई तो खंजर से काटा दुश्मन का गला, अमर शहीद की वो गाथा जो थर्रा देगी कलेजा

परमवीर चक्र विजेता लांस नायक करम सिंह की अदम्य बहादुरी की वो अनसुनी कहानी जिसे पढ़कर पाकिस्तान आज भी कांपता है। 1948 के युद्ध में अकेले एक ब्रिगेड को रोकने और खंजर से दुश्मनों का काल बनने की पूरी शौर्य गाथा यहाँ दी गई है वरना आप भी भारत के इस असली 'यमराज' के बलिदान को जानने से चूक जाएंगे।

Jan 20, 2026 - 13:53
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Karam Singh: अकेले 8 बार पाकिस्तान को धूल चटाई, गोलियां खत्म हुई तो खंजर से काटा दुश्मन का गला, अमर शहीद की वो गाथा जो थर्रा देगी कलेजा
Karam Singh: अकेले 8 बार पाकिस्तान को धूल चटाई, गोलियां खत्म हुई तो खंजर से काटा दुश्मन का गला, अमर शहीद की वो गाथा जो थर्रा देगी कलेजा

जमशेदपुर/पंजाब, 20 जनवरी 2026 – भारतीय सैन्य इतिहास में कुछ ऐसी लड़ाइयां हुई हैं जहाँ विज्ञान और संख्या बल हार गए और केवल 'जिगर' जीत गया। ऐसी ही एक गाथा है लांस नायक करम सिंह की, जिन्होंने 1948 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान के लिए साक्षात 'यमराज' का रूप धर लिया था। टिथवाल की पहाड़ियों पर जब गोलियां खत्म हुईं और शरीर जख्मों से छलनी था, तब इस वीर ने जो किया, उसने विश्व सैन्य इतिहास में एक मिसाल कायम कर दी। आज उनकी वीरता की कहानी नई पीढ़ी के रगों में देशभक्ति का उबाल लाने के लिए काफी है।

खेतों से रणभूमि तक: कुश्ती के चैंपियन का फौजी सफर

15 सितम्बर 1915 को पंजाब के संगरूर जिले के भालिया वाले गांव में जन्मे करम सिंह एक धनी किसान परिवार से थे।

  • बचपन का जोश: पिता उत्तम सिंह उन्हें खेती में लगाना चाहते थे, लेकिन करम सिंह गांव के कुश्ती चैंपियन थे। उनके कानों में हमेशा विश्वयुद्ध की शौर्यगाथाएं गूंजती थीं।

  • भर्ती और ट्रेनिंग: 15 सितम्बर 1941 को वे फौज में शामिल हुए। खास बात यह है कि उनकी सैन्य ट्रेनिंग झारखंड की राजधानी रांची में हुई, जहाँ उनकी सरलता और शक्ति ने सबको प्रभावित किया।

  • बर्मा अभियान: दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बर्मा में उन्होंने अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया, जिसके लिए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने 'मिलिटरी पदक' से सम्मानित किया।

13 अक्टूबर 1948: जब 'रिचमार गली' में मौत नाच रही थी

जम्मू-कश्मीर में टिथवाल पर कब्जे के बाद पाकिस्तान बौखलाया हुआ था। ईद के दिन (13 अक्टूबर) दुश्मन ने एक पूरी ब्रिगेड (हजारों सैनिक) झोंक दी ताकि रिचमार गली पर कब्जा कर श्रीनगर का रास्ता साफ किया जा सके।

  1. चार जवान बनाम एक ब्रिगेड: करम सिंह सिर्फ चार जवानों के साथ फॉरवर्ड पोस्ट पर तैनात थे। दुश्मन ने एक के बाद एक 8 बार भीषण हमले किए।

  2. खंजर का प्रहार: पांचवें हमले के दौरान दुश्मन के सैनिक करम सिंह के बंकर के बेहद करीब आ गए। गोला-बारूद खत्म हो चुका था, लेकिन हौसला नहीं। करम सिंह बंकर से बाहर निकले और अपनी बेयनेट (खंजर) से उन पर टूट पड़े। उन्होंने आमने-सामने की लड़ाई में दुश्मनों को गाजर-मूली की तरह काट दिया।

  3. अपराजेय साहस: दो बार बुरी तरह घायल होने के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। वे खुद लहूलुहान थे, लेकिन रेंगते हुए एक बंकर से दूसरे बंकर जाकर अपने साथियों का उत्साह बढ़ाते रहे।

परमवीर करम सिंह: शौर्य का कालक्रम (Legacy Snapshot)

महत्वपूर्ण तथ्य जानकारी (Details)
नाम लांस नायक करम सिंह (परमवीर चक्र)
रेजीमेंट 1 सिक्ख रेजीमेंट
ऐतिहासिक युद्ध 13 अक्टूबर 1948 (रिचमार गली, टिथवाल)
अदभुत पराक्रम अकेले 8 पाकिस्तानी हमलों को नाकाम किया
सम्मान जीवित रहते हुए परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले योद्धा

इतिहास का पन्ना: टिथवाल की रक्षा और करम सिंह का रणनीतिक नेतृत्व

इतिहास गवाह है कि 1948 का युद्ध भारतीय सेना के लिए केवल जमीन बचाने की नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई थी। 19वीं शताब्दी के अंत में जब सिखों की वीरता के किस्से दुनिया भर में मशहूर थे, करम सिंह ने 20वीं सदी में उसे फिर से जीकर दिखाया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि करम सिंह उस दिन रिचमार गली में न डटे होते, तो टिथवाल हाथ से निकल जाता और श्रीनगर पर सीधा खतरा मंडराने लगता। द्वितीय विश्वयुद्ध (1942) के 'एडमिन बॉक्स' युद्ध का अनुभव उन्हें कश्मीर में काम आया। उन्होंने दिखाया कि एक छोटा सैन्य नेतृत्व (Small Unit Leadership) कैसे पूरी जंग का रुख पलट सकता है। आज उनकी वीरता के किस्से केवल किताबों में नहीं, बल्कि भारतीय सेना की हर ट्रेनिंग एकेडमी में एक 'केस स्टडी' के रूप में पढ़ाए जाते हैं।

वरुण कुमार की कलम से: "शत्रु के सपने मिटाने हैं"

अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद, जमशेदपुर के संस्थापक और कवि वरुण कुमार अपनी पंक्तियों में करम सिंह के शौर्य को पिरोते हुए कहते हैं— "दिखलादो भारत के बेटे, शेरों की संताने हैं।" करम सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प से जीते जाते हैं।

सदा अमर रहेगा नाम

लांस नायक करम सिंह उन बिरले योद्धाओं में से एक थे जिन्हें अपने जीवनकाल में ही 'परमवीर चक्र' जैसे सर्वोच्च सम्मान को अपने सीने पर सजाने का गौरव प्राप्त हुआ। उनकी कहानी आज भी सीमा पर तैनात हर जवान के लिए शक्ति का पुंज है।

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Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।