Netaji Subhas Chandra Bose Jayanti 2026 : मौलवी जियाउद्दीन बनकर अंग्रेजों को दी पटखनी, नेताजी के भेष बदलने के वे 3 खतरनाक किस्से, जिसे सुनकर ब्रिटिश खुफिया एजेंसी के भी उड़ गए थे होश

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती पर उनके 'मौलवी जियाउद्दीन' और 'ऑरलैंडो मजोटा' बनने के उन अनसुने साहसिक कारनामों की पूरी रिपोर्ट यहाँ मौजूद है वरना आप भी यह कभी नहीं जान पाएंगे कि कैसे एक नजरबंद क्रांतिकारी ने सात समंदर पार जाकर अंग्रेजों की नींव हिला दी थी।

Jan 23, 2026 - 15:08
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Netaji Subhas Chandra Bose Jayanti 2026 : मौलवी जियाउद्दीन बनकर अंग्रेजों को दी पटखनी, नेताजी के भेष बदलने के वे 3 खतरनाक किस्से, जिसे सुनकर ब्रिटिश खुफिया एजेंसी के भी उड़ गए थे होश
Netaji Subhas Chandra Bose Jayanti 2026 : मौलवी जियाउद्दीन बनकर अंग्रेजों को दी पटखनी, नेताजी के भेष बदलने के वे 3 खतरनाक किस्से, जिसे सुनकर ब्रिटिश खुफिया एजेंसी के भी उड़ गए थे होश

नई दिल्ली, 23 जनवरी 2026 – भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती आज पूरे देश में 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाई जा रही है। इतिहास के पन्नों में कई युद्ध और संधियां दर्ज हैं, लेकिन नेताजी का वह 'महान पलायन' (The Great Escape) आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। जब पूरी ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर दिया था, तब नेताजी ने एक ऐसा वेश धरा जिसने गोरी सरकार की आंखों में धूल झोंक दी। क्या आप जानते हैं कि वह कौन सा क्षण था जब नेताजी 'सुभाष' से 'मौलवी जियाउद्दीन' बन गए और कैसे एक 'गूंगे-बहरे पठान' ने पेशावर की सीमाओं को पार कर इतिहास रच दिया?

कोलकाता की वो अंधेरी रात: जब 'मौलवी' ने चकमा दिया

1941 का दौर था, द्वितीय विश्व युद्ध की आग पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। अंग्रेजों ने नेताजी को कोलकाता स्थित उनके आवास पर कड़ी सुरक्षा के बीच नजरबंद कर रखा था।

  • भेष बदलने की कला: 16-17 जनवरी की दरम्यानी रात, नेताजी ने लंबी दाढ़ी बढ़ाई, काला चश्मा पहना और मौलवी जियाउद्दीन का वेश धारण कर घर से निकल पड़े।

  • कालका मेल का सफर: वे चुपचाप धनबाद के गोमो स्टेशन पहुँचे और वहाँ से कालका मेल पकड़ी। खुफिया एजेंसियां चप्पे-चप्पे पर तैनात थीं, लेकिन किसी को शक नहीं हुआ कि एक धार्मिक लिबास में बैठा व्यक्ति भारत का सबसे बड़ा क्रांतिकारी है।

पेशावर से बर्लिन तक: वेश बदले, पर लक्ष्य नहीं

नेताजी की यह यात्रा केवल कोलकाता से पेशावर तक सीमित नहीं थी। यह एक जासूसी थ्रिलर फिल्म जैसी दास्तां थी।

  1. गूंगा-बहरा पठान: पेशावर पहुँचने पर सुरक्षा और सख्त हो गई। वहाँ उन्हें एक 'गूंगे-बहरे पठान' के रूप में तैयार किया गया, ताकि अगर कोई उनसे पश्तो में बात करे, तो पकड़े जाने का डर न रहे।

  2. ऑरलैंडो मजोटा (Orlando Mazzotta): जब वे रूस के रास्ते जर्मनी (बर्लिन) पहुँचे, तो उन्होंने एक इतालवी राजनयिक 'ऑरलैंडो मजोटा' की पहचान अपनाई। उनके पासपोर्ट पर यही नाम दर्ज था।

  3. कमांडर मक्सुदा: 1943 में जब वे पनडुब्बी (U-Boat) के जरिए खतरनाक समुद्री रास्तों से जापान जा रहे थे, तब उनकी पहचान 'कमांडर मक्सुदा' के रूप में थी।

नेताजी के 'बहुरूपी' क्रांतिकारी रूप: एक नजर में (Identity Chart)

कालखंड धारण किया गया नाम स्थान/सफर
जनवरी 1941 मौलवी जियाउद्दीन कोलकाता से पेशावर (ट्रेन द्वारा)
फरवरी 1941 गूंगा-बहरा पठान पेशावर से काबुल की सीमा तक
अप्रैल 1941 ऑरलैंडो मजोटा बर्लिन, जर्मनी (राजनयिक पहचान)
फरवरी 1943 कमांडर मक्सुदा पनडुब्बी से जापान की यात्रा

इतिहास का पन्ना: एलगिन रोड से 'आजाद हिंद' तक का रणनीतिक सफर

नेताजी का इतिहास केवल बलिदान का नहीं, बल्कि 'रणनीतिक प्रतिभा' का इतिहास है। 1920 के दशक में जब वे सिविल सेवा (ICS) छोड़कर राजनीति में आए, तभी से वे अंग्रेजों की हिट-लिस्ट में थे। इतिहास गवाह है कि नेताजी ने 1939 में जब कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ा और 'फॉरवर्ड ब्लॉक' बनाया, तब उन्होंने समझ लिया था कि अहिंसा के साथ-साथ सशस्त्र विद्रोह और अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी जरूरी है। पेशावर के ताजमहल होटल और आबाद खान के घर में बिताए गए वे दिन इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण पल थे, क्योंकि वहीं से 'आजाद हिंद फौज' की वैचारिक नींव रखी गई थी। पेशावर के पठानों के बीच घुल-मिल जाना और उनकी संस्कृति सीखना यह दिखाता है कि नेताजी न केवल एक महान वक्ता थे, बल्कि एक बेहतरीन 'अंडरकवर एजेंट' की तरह भी काम कर सकते थे।

आज के युवाओं के लिए नेताजी का संदेश

नेताजी की 129वीं जयंती पर उनका जीवन हमें सिखाता है कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए मार्ग बदलने पड़ सकते हैं, लेकिन संकल्प अडिग होना चाहिए।

  • अनुकूलन क्षमता (Adaptability): परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना ही जीत की पहली शर्त है।

  • साहस: जब मौत सिर पर नाच रही हो, तब भी देश के लिए पनडुब्बी का सफर करना अदम्य साहस का प्रतीक है।

  • वैश्विक दृष्टि: उन्होंने साबित किया कि भारत की आजादी की लड़ाई केवल देश के भीतर नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर लड़ी जानी चाहिए।

इतिहास में अमर 'मौलवी जियाउद्दीन'

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी पहचान इसलिए बदली ताकि भारत अपनी असली पहचान (आजादी) वापस पा सके। आज जब हम तिरंगे को गर्व से लहराते देखते हैं, तो उसके पीछे उस 'मौलवी', उस 'पठान' और उस 'कमांडर' का संघर्ष छिपा है जिसने अंग्रेजों को उनकी ही बिसात पर मात दी थी।

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Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।