Nagaland Legend: रानी गाइदिनल्यू की अनसुनी कहानी, 13 साल की उम्र में अंग्रेजों को हिलाया, नेहरू ने दिया था 'बेटी' जैसा सम्मान
नागालैंड की उस निडर 'रानी' की शौर्य गाथा यहाँ मौजूद है जिसने मात्र 13 वर्ष की उम्र में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। 14 साल जेल में काटने वाली इस वीरांगना के बलिदान और पंडित नेहरू द्वारा दी गई 'रानी' की उपाधि का पूरा इतिहास यहाँ पढ़ें वरना आप भारत की इस महान विरासत को मिस कर देंगे।
कोहिमा/लोंगकाओ, 18 फरवरी 2026 – जब हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं, तो अक्सर पूर्वोत्तर की उन पहाड़ियों को भूल जाते हैं जहाँ आजादी की मशाल सबसे पहले धधकी थी। नागालैंड की दुर्गम पहाड़ियों से निकली एक ऐसी ही चिंगारी का नाम था रानी गाइदिनल्यू। आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उस महान योद्धा को याद कर रहा है जिसने गुलाल और चूड़ियों की उम्र में हाथ में तलवार थाम ली थी। मात्र 13 साल की उम्र में अंग्रेजों की नींद उड़ाने वाली इस 'अग्निपुत्री' का जीवन किसी रोंगटे खड़े कर देने वाले उपन्यास से कम नहीं है।
13 साल की उम्र और अंग्रेजों से सीधा टकराव
26 जनवरी 1915 को मणिपुर (वर्तमान में नागालैंड सीमा के पास) के लोंगकाओ गाँव में जन्मी गाइदिनल्यू बचपन से ही विद्रोही स्वभाव की थीं।
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हेराका आंदोलन: उन्होंने अपने चचेरे भाई जादोनांग के साथ मिलकर 'हेराका आंदोलन' शुरू किया। यह केवल आजादी की जंग नहीं थी, बल्कि नागा संस्कृति को बचाने का एक महायज्ञ था।
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नेतृत्व का साहस: 1931 में जब अंग्रेजों ने जादोनांग को फांसी दी, तो सबको लगा आंदोलन खत्म हो जाएगा। लेकिन 16 साल की गाइदिनल्यू ने नेतृत्व संभाला और अंग्रेजों को कर (Tax) देने से मना कर दिया।
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गुरिल्ला युद्ध: उन्होंने 4000 नागा योद्धाओं की फौज तैयार की और पहाड़ों की आड़ में अंग्रेजों पर ऐसे प्रहार किए कि ब्रिटिश सेना उन्हें 'जादूगरनी' समझने लगी थी।
नेहरू ने दी 'रानी' की उपाधि: जेल में बीते 14 साल
17 अक्टूबर 1932 को अंग्रेजों ने एक बड़े सैन्य अभियान के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया। मात्र 17 साल की उम्र में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
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शिलॉन्ग जेल की मुलाकात: 1937 में जब पंडित जवाहरलाल नेहरू उनसे जेल में मिले, तो उनकी कम उम्र और फौलादी इरादों को देखकर दंग रह गए।
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नया नाम: नेहरू जी ने उन्हें 'नागालैंड की रानी लक्ष्मीबाई' कहा और उन्हें 'रानी' की उपाधि दी। तभी से वे देश भर में रानी गाइदिनल्यू के नाम से मशहूर हुईं।
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आजादी तक कैद: वे 1933 से 1947 तक, यानी पूरे 14 साल जेल की सलाखों के पीछे रहीं और भारत के आजाद होने के बाद ही बाहर आईं।
रानी गाइदिनल्यू: वीरता का सफरनामा (Quick Glance)
| विवरण | प्रमुख जानकारी (Key Facts) |
| जन्म | 26 जनवरी 1915 |
| आंदोलन | हेराका आंदोलन (नागा विद्रोह) |
| उपाधि | रानी (पंडित नेहरू द्वारा प्रदत्त) |
| जेल यात्रा | 14 वर्ष (1933-1947) |
| पुरस्कार | पद्म भूषण (1982), भगवान बिरसा मुंडा पुरस्कार |
एक अमर संदेश: आयु नहीं, संकल्प बड़ा होता है
रानी गाइदिनल्यू का जीवन आज के युवाओं के लिए एक मिसाल है।
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प्रेरणा का स्रोत: उन्होंने साबित किया कि देशभक्ति के लिए उम्र या लिंग मायने नहीं रखता।
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सांस्कृतिक रक्षक: वे नागा संस्कृति की संरक्षक थीं, जिन्होंने 'हेराका' परंपरा को जीवित रखा।
इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम स्थान
रानी गाइदिनल्यू का बलिदान आज भी नागालैंड की वादियों में गूँजता है। वे केवल एक क्षेत्रीय नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नायिका थीं जिन्होंने पूर्वोत्तर को भारत के हृदय से जोड़ा।
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