Laxmibai Kelkar Legacy: नारी जागरण की अग्रदूत ‘मौसीजी’ को नमन, दहेज से लेकर RSS तक का सफर, जिन्होंने महिलाओं को दी नई पहचान!
आज 27 नवंबर को लक्ष्मीबाई केलकर 'मौसीजी' की पुण्यतिथि। दहेज रहित विवाह, स्वदेशी आंदोलन और 1936 में राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना करने वाली इस महान शख्सियत के साहसिक फैसलों को जानें।
रांची, 27 नवंबर 2025 – आज 27 नवंबर (27 November) का दिन भारतीय इतिहास (Indian History) में मातृशक्ति (Matrushakti) के पुनर्जागरण (Renaissance) की एक महान अग्रदूत (Pioneer) को समर्पित (Dedicated) है। हम बात कर रहे हैं “वन्दनीय मौसीजी” के नाम से प्रसिद्ध लक्ष्मीबाई केलकर (Laxmibai Kelkar) की, जिनकी पुण्यतिथि (Death Anniversary) आज पूरे देश में मनाई जा रही है। 6 जुलाई 1905 को नागपुर (Nagpur) में जन्मी कमल ने अपने जीवनकाल (Lifetime) में देशभक्ति (Patriotism), समाज सेवा (Social Service) और संगठन (Organization) की ऐसी मजबूत नींव (Foundation) रखी, जिसने भारत की लाखों महिलाओं के जीवन की दिशा बदल दी।
कमल से लक्ष्मीबाई: दहेजरहित विवाह और साहसिक सामाजिक कदम
कमल का बचपन लोकमान्य तिलक (Lokmanya Tilak) के 'केसरी' (Kesari) जैसी राष्ट्रवादी (Nationalistic) पत्रिकाओं के वातावरण में बीता, जिसने उनके भीतर राष्ट्रभाव की गहरी चेतना (Deep Consciousness) जगा दी। वह सिर्फ देशभक्त ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों (Social Stereotypes) की विरोधी भी थीं।
-
दहेज का विरोध: उन्होंने दहेज प्रथा (Dowry System) के विरोध में मात्र 14 वर्ष की आयु में वर्धा (Wardha) के वकील पुरुषोत्तमराव केलकर से दहेजरहित विवाह (Dowry-Free Marriage) किया और 'लक्ष्मीबाई' के नाम से पहचानी गईं।
-
सामाजिक क्रांति: एक गृहिणी के रूप में भी उन्होंने स्वदेशी (Swadeshi) का पालन किया, कन्या शिक्षा (Girls' Education) को बढ़ावा दिया और उस दौर में रूढ़ियों को चुनौती (Challenged) देते हुए हरिजन नौकर (Harijan Servant) रखने जैसा साहसिक कदम (Brave Step) उठाया। गांधीजी (Gandhiji) से प्रेरणा लेकर उन्होंने चरखा भी अपनाया और देश के लिए अपनी सोने की जंजीर तक समर्पित (Sacrificed) कर दी।
1936: राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना
1932 में पति के निधन (Death) के बाद लक्ष्मीबाई पर आर्थिक और पारिवारिक दायित्वों (Responsibilities) का बोझ बढ़ा, लेकिन उनका साहस (Courage) नहीं टूटा। इसी दौरान, अपने पुत्रों के माध्यम से वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संस्थापक डॉ. हेडगेवार (Dr. Hedgewar) के संपर्क में आईं।
-
नारी संगठन की जरूरत: डॉ. हेडगेवार से मुलाकात के बाद उन्होंने साफ महसूस किया कि भारतीय नारी को भी राष्ट्र निर्माण (Nation Building) के लिए एक स्वतंत्र (Independent) और संगठित (Organized) मंच (Platform) की आवश्यकता (Need) है।
-
समिति का जन्म: इस दूरदर्शिता (Farsightedness) का परिणाम यह हुआ कि 1936 में उन्होंने 'राष्ट्र सेविका समिति' (Rashtra Sevika Samiti) की स्थापना की। अगले वर्षों में पूरे देशभर में किए गए प्रवासों (Tours) ने उन्हें करोड़ों महिलाओं के बीच प्रेम और आदर से “वन्दनीय मौसीजी” के रूप में प्रतिष्ठित (Established) कर दिया।
कराची में साहस और आज 25 देशों में विस्तार
मौसीजी ने 1947 के देश विभाजन (Partition) के उत्थल-पुथल भरे समय में भी गजब का साहस दिखाया। वह कराची (Karachi) में रहीं और अपनी सेविकाओं के साथ मिलकर सैकड़ों हिंदू परिवारों को सुरक्षित रूप से भारत पहुंचाने में मदद की।
जीजाबाई के मातृत्व (Motherhood), अहिल्याबाई के कर्तृत्व (Efficiency) और झांसी की रानी के नेतृत्व (Leadership) को आदर्श मानने वाली मौसीजी ने अपने जीवनकाल में शिक्षा, संस्कार और स्वावलम्बन (Self-Reliance) के अनेक प्रकल्प (Projects) स्थापित किए।
27 नवंबर 1978 को उनके देहावसान (Passing Away) के बाद भी, उनके द्वारा स्थापित राष्ट्र सेविका समिति आज 25 से अधिक देशों (Countries) में सक्रिय (Active) है और नारी जागरण की ज्योति (Flame) जगाए हुए है। उनकी पुण्यतिथि केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि हर भारतीय नारी को सशक्त बनकर समाज-निर्माण (Society Building) में योगदान (Contribution) देने का प्रेरणा स्रोत (Source of Inspiration) है।
What's Your Reaction?


