Captain Mahendra Nath Mulla : डूबते जहाज के साथ जल समाधि, कैप्टन मुल्ला की अमर शहादत
1971 के युद्ध में आईएनएस खुकरी पर हमला हुआ। 176 सैनिकों को बचाकर कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला अपनी सीट पर बैठे रहे। डूबते जहाज के साथ सिगार होंठों में दबाए कप्तान की कहानी। राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान की वह अद्वितीय गाथा जो आज भी प्रेरणा है।
गोरखपुर, 9 दिसंबर 2025 – 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय नौसेना के रणबांकुरों ने जिस शौर्य और अदम्य साहस का प्रदर्शन किया, उस इतिहास में एक नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है—कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला। आईएनएस खुकरी के इस बहादुर कमांडिंग अधिकारी ने अपने कर्तव्य, नेतृत्व और बलिदान की जो मिसाल पेश की, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्रोत है। यह मात्र एक कहानी नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति और देश के प्रति सर्वोच्च निष्ठा का जीवंत प्रमाण है।
उत्तर प्रदेश से नौसेना का सफर
कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला का जन्म 15 मई 1926 को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। बचपन से ही उनमें अनुशासन और देशसेवा की भावना थी। उच्च शिक्षा पूरी करने के पश्चात वे भारतीय नौसेना में शामिल हुए। प्रशिक्षण के दौरान ही उन्होंने असाधारण नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया, जिसके कारण वे अपने सहकर्मियों में अत्यंत लोकप्रिय थे।
1971 का युद्ध: अचानक हुआ वह घातक हमला
दिसम्बर 1971 में हुए युद्ध के दौरान भारतीय नौसेना की पश्चिमी कमान को अरब सागर में शत्रु की गतिविधियों पर निगरानी का आदेश मिला था। इसी अभियान के तहत आईएनएस खुकरी को मोर्चे पर तैनात किया गया था। जहाज पर कुल 176 जवान और अधिकारी थे, जिनका नेतृत्व कैप्टन मुल्ला कर रहे थे। यह समय अत्यंत नाजुक था, क्योंकि पाकिस्तानी पनडुब्बी हैंगोर को युद्ध क्षेत्र में भेजा गया था।
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टॉरपीडो का प्रहार: 14 दिसम्बर 1971 की रात लगभग 8 बजकर 50 मिनट पर पाकिस्तानी पनडुब्बी ने खुकरी पर अचानक टॉरपीडो हमला कर दिया। पहला प्रहार इतना भयंकर था कि जहाज का एक बड़ा हिस्सा टूट गया। कुछ ही पल बाद दूसरा टॉरपीडो जहाज के मध्य भाग से टकराया, जिससे खुकरी तेजी से डूबने लगा। चारों ओर अंधेरा, अफरातफरी और चीख-पुकार के बीच भी कैप्टन मुल्ला ने शांति और साहस के साथ अपने सैनिकों का मार्गदर्शन किया।
सर्वोच्च बलिदान का अद्वितीय दृश्य
जब जहाज डूब रहा था, कप्तान ने घबराने के बजाय सबसे पहले अपने सैनिकों को सुरक्षित बाहर निकलने का आदेश दिया। जीवनरक्षक नाव उपलब्ध होने पर भी उन्होंने स्वयं उसमें बैठने से इनकार कर दिया। वह अपने अधीनस्थों का हौसला बढ़ाते रहे—"ऑल द बेस्ट... आगे बढ़ो!"
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कप्तान ने धक्का दिया: मनु शर्मा और लेफ़्टिनेंट कुंदनमल ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन कैप्टन मुल्ला ने उन्हें जहाज के ऊपरी हिस्से से नीचे धक्का देकर जाने के लिए मजबूर कर दिया। जब मनु शर्मा ने समुद्र में छलांग लगाई, तो उन्होंने देखा कि खुकरी का अगला हिस्सा लगभग 80 डिग्री का कोण बनाते हुए सीधा खड़ा हो गया है। पूरे पोत में आग लगी थी। कैप्टन मुल्ला अपनी सीट पर बैठे थे, रेलिंग पकड़े हुए और उनके होंठों में अब भी जली हुई सिगरेट दबी थी।
कुछ मिनटों में ही खुकरी अरब सागर की लहरों में समा गया और 194 बहादुर योद्धाओं ने अपनी शहादत दी। कैप्टन मुल्ला भी उसी समुद्र की गहराइयों में अमर हो गए। उनकी वीरता और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें मरणोपरांत देश का दूसरा सर्वोच्च सैन्य सम्मान “महा वीर चक्र” प्रदान किया गया।
आज भी मिलती है नेतृत्व की प्रेरणा
आज भी सैन्य शिक्षण संस्थानों में यह प्रसंग नेतृत्व प्रशिक्षण की आदर्श कथा के रूप में पढ़ा जाता है। गुजरात के दीव के निकट स्थित आईएनएस खुकरी यादगार उनकी शहादत की याद दिलाता है। नौसेना के जवान उन्हें "लोहे का आदमी" कहकर याद करते हैं। कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला केवल एक नाम नहीं, बल्कि उस भारतीय सैनिक की छवि प्रस्तुत करते हैं जो राष्ट्र के सम्मान को सर्वोपरि मानता है।
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