Chaibasa Surrender: चाईबासा की युवती का राउरकेला में सरेंडर बना रहस्य, परिजनों ने नौकरी के झांसे और बड़ी साजिश का लगाया आरोप

चाईबासा की 19 वर्षीय मोंगड़ी होनहागा के राउरकेला में नक्सली सरेंडर पर उठे सवालों और 'लोकल गुरिल्ला स्क्वायड' के दावों के पीछे छिपी बड़ी साजिश की पूरी इनसाइड रिपोर्ट यहाँ देखें।

Apr 1, 2026 - 19:04
 0
Chaibasa Surrender: चाईबासा की युवती का राउरकेला में सरेंडर बना रहस्य, परिजनों ने नौकरी के झांसे और बड़ी साजिश का लगाया आरोप
Chaibasa Surrender: चाईबासा की युवती का राउरकेला में सरेंडर बना रहस्य, परिजनों ने नौकरी के झांसे और बड़ी साजिश का लगाया आरोप

रांची/चाईबासा, 1 अप्रैल 2026 – झारखंड के चाईबासा जिले से निकलकर ओडिशा के राउरकेला तक पहुँची एक आदिवासी युवती की कहानी ने अब एक गंभीर विवाद का रूप ले लिया है। 19 वर्षीय मोंगड़ी होनहागा के 'नक्सली' के रूप में सरेंडर करने के मामले ने चाईबासा से लेकर रांची तक के गलियारों में खलबली मचा दी है। जहाँ एक तरफ पुलिस मोंगड़ी को पिछले दो वर्षों से सक्रिय माओवादी बता रही है, वहीं दूसरी तरफ उसके परिजनों ने इस पूरे घटनाक्रम को एक सोची-समझी साजिश करार दिया है। इस मामले ने सरेंडर नीतियों और पुलिसिया दावों की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

पुलिस का दावा बनाम परिवार का दर्द: क्या है सच्चाई?

राउरकेला पुलिस और सुरक्षा बलों का कहना है कि मोंगड़ी होनहागा भाकपा माओवादी संगठन की एक सक्रिय सदस्य थी।

  • पुलिस की थ्योरी: पुलिस के अनुसार, मोंगड़ी पिछले 2 सालों से नक्सली गतिविधियों में शामिल थी और वह 'लोकल गुरिल्ला स्क्वायड' (LGS) की सदस्य के रूप में काम कर रही थी। इसी आधार पर उसका सरेंडर कराया गया।

  • परिजनों का पलटवार: मोंगड़ी के परिवार ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि मोंगड़ी का नक्सलियों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। करीब दो साल पहले गांव का ही एक युवक उसे शहर में अच्छी नौकरी का झांसा देकर राउरकेला ले गया था।

  • संदिग्ध बिचौलिया: परिजनों का आरोप है कि जो युवक उसे ले गया था, वह वास्तव में पुलिस का मुखबिर या 'कैट' (CAT) हो सकता है, जिसने अपनी साख बनाने के लिए एक मासूम लड़की को नक्सली बताकर पेश कर दिया।

'लोकल गुरिल्ला स्क्वायड' पर उठा तकनीकी सवाल

इस मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब नक्सल मामलों के जानकारों ने पुलिस के तकनीकी दावों की हवा निकाल दी।

  1. नामकरण में झोल: जानकारों का कहना है कि भाकपा माओवादी (CPI Maoist) के संगठनात्मक ढांचे में “लोकल गुरिल्ला स्क्वायड” नाम का कोई आधिकारिक डिवीजन या पद होता ही नहीं है।

  2. संगठनात्मक ढांचा: माओवादियों के पास PLGA (पब्लिक लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) होती है, जिसमें सेक्शन, प्लाटून और कंपनी जैसे स्तर होते हैं। ऐसे में पुलिस द्वारा एक नए नाम का इस्तेमाल करना मामले को संदिग्ध बनाता है।

  3. पहचान का संकट: मोंगड़ी होलोमुली मरंगपोंगा गांव की रहने वाली है, जहाँ के ग्रामीणों का भी कहना है कि उसे बहला-फुसलाकर बाहर ले जाया गया था।

चाईबासा और सारंडा का इतिहास: सरेंडर का खेल और विवाद

चाईबासा का कोल्हान और सारंडा क्षेत्र दशकों से माओवादी गतिविधियों का केंद्र रहा है, लेकिन यहाँ 'फेक सरेंडर' के आरोप भी नए नहीं हैं।

  • पुरानी परंपरा: झारखंड में पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ बेरोजगार युवाओं को 'नक्सली लाभ' और सरकारी नौकरी का लालच देकर सरेंडर कराया गया, लेकिन बाद में वे दावों के उलट निकले।

  • ऐतिहासिक डेटा: चाईबासा और ओडिशा सीमा पर अक्सर सुरक्षा बल और नक्सली आमने-सामने होते हैं। ऐसे में बढ़ते दबाव के बीच पुलिस अपनी सफलता दिखाने के लिए कभी-कभी छोटे स्तर के समर्थकों या निर्दोष ग्रामीणों को भी 'हार्डकोर नक्सली' बताकर पेश करती रही है।

  • मानवाधिकारों का हनन: आदिवासी संगठनों का आरोप है कि मोंगड़ी का मामला जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ने वाले मासूम आदिवासियों को फंसाने की एक नई कड़ी है।

निष्पक्ष जांच की मांग: क्या मोंगड़ी को मिलेगा न्याय?

मोंगड़ी के सरेंडर की खबर जैसे ही चाईबासा पहुँची, स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और परिजनों ने आंदोलन की चेतावनी दी है।

  • जांच की गुहार: अब मांग उठ रही है कि इस पूरे सरेंडर कांड की किसी निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराई जाए। उस युवक की भूमिका की जांच हो जो उसे गांव से लेकर गया था।

  • साजिश की आशंका: क्या यह सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए किया गया एक 'प्रायोजित सरेंडर' है? या फिर किसी बड़े गिरोह ने युवती को ढाल बनाकर पुलिस के सामने पेश कर दिया?

  • अधिकारियों की चुप्पी: फिलहाल चाईबासा और राउरकेला पुलिस के आला अधिकारी इस तकनीकी विरोधाभास पर कुछ भी स्पष्ट बोलने से बच रहे हैं।

मोंगड़ी होनहागा का मामला केवल एक सरेंडर की खबर नहीं, बल्कि एक आदिवासी बेटी के भविष्य और सम्मान की लड़ाई है। अगर वह नक्सली थी, तो पुलिस को उसके द्वारा अंजाम दी गई वारदातों के सबूत देने होंगे। लेकिन अगर वह केवल नौकरी की तलाश में गई एक मासूम थी जिसे 'नक्सली' का ठप्पा लगा दिया गया, तो यह मानवता और कानून दोनों के साथ खिलवाड़ है। चाईबासा के जंगलों से राउरकेला के पुलिस मुख्यालय तक फैली यह मिस्ट्री अब सुलझने के बजाय और उलझती जा रही है। सच्चाई तभी सामने आएगी जब मोंगड़ी के गांव से लेकर राउरकेला के उस संदिग्ध युवक तक की कड़ियां जोड़ी जाएंगी।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।