Saint Tukdoji Maharaj: रोटी के टुकड़ों से राष्ट्रसंत तक की यात्रा, जापान में धर्म सम्मेलन में भारतीय संत ने मचा दी थी धूम
जापान में विश्व धर्म सम्मेलन में जिस संत ने भाषा से परे अपनी उर्जा से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया, उनकी 117वीं जयंती पर विशेष।
23 जुलाई 1955 का वह ऐतिहासिक क्षण, जब विश्व धर्म सम्मेलन जापान 1955 में एक भारतीय संन्यासी मंच पर खड़ा हुआ—भाषा की सीमाएं वहां गौण हो गईं। उनके चेहरे के भाव, कीर्तन की मधुरता और आत्मा को छू लेने वाली ऊर्जा ने समूचे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह कोई साधारण संत नहीं थे, बल्कि भारतभूमि के ऐसे महापुरुष थे, जिन्होंने भक्ति को जनजागरण और राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बनाया—वे थे राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज।
संघर्षों में पला बालक ‘माणिक’
30 अप्रैल 1909 को महाराष्ट्र के
अमरावती जिले के यावली गांव में जन्मे तुकड़ोजी महाराज का प्रारंभिक नाम ‘माणिक’ था। उनके पिता बंडोजी इंगले और माता मंजुला देवी ने कठिन परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया। आर्थिक तंगी, अस्थिर जीवन और संघर्षों ने बचपन से ही माणिक को जीवन की कठोर सच्चाइयों से परिचित करा दिया।विद्यालय की पढ़ाई में उनका मन कम लगता था, बल्कि मंदिरों में भजन-कीर्तन में उन्हें अधिक आनंद मिलता। चांदा की पाठशाला के पास स्थित मारुति मंदिर में वे ‘भारती’ नामक गायक के साथ बैठकर ढपली बजाते और भक्ति में लीन हो जाते। यही वह बीज था, जिसने आगे चलकर उन्हें एक महान संत और कीर्तनकार बनाया।
‘तुकड़या’ से ‘तुकड़ोजी’ बनने की यात्रा
बरखेड़ में उनके गुरु आड्कुजी महाराज के सान्निध्य में उनका आध्यात्मिक जीवन विकसित हुआ। भजन गाने के बदले मिलने वाले रोटी के ‘टुकड़ों’ से उनका नाम ‘तुकड़या’ पड़ा, जो आगे चलकर ‘तुकड़ोजी’ बन गया। यह नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि उनकी सादगी और त्याग का प्रतीक बन गया।
कम उम्र में ही उन्होंने संसार का मोह त्यागकर साधना का मार्ग अपनाया। जंगलों में एक रहस्यमयी योगी से योग, प्राणायाम और ध्यान की शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने आत्मिक शक्ति अर्जित की। यह साधना ही आगे उनके जीवन का आधार बनी।तुकड़ोजी महाराज केवल भक्ति में लीन संत नहीं थे, बल्कि वे राष्ट्रभक्ति की ज्वाला से भी ओतप्रोत थे। उन्होंने महात्मा गांधी से मुलाकात की, लेकिन उनका दृष्टिकोण अधिक उग्र और जनजागरण आधारित था।
उनके गीतों में क्रांति की चेतना झलकती थी— “झाड़-झड़ूले शस्त्र बनेंगे, पत्थर सारे बम बनेंगे…” ऐसे ओजस्वी गीतों ने अंग्रेजी शासन को विचलित कर दिया और 28 अगस्त 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
‘गुरुदेव सेवा मंडल’ और सामाजिक नवजागरण
जेल से मुक्त होने के बाद तुकड़ोजी महाराज ने समाज सेवा को अपना मुख्य उद्देश्य बनाया। उन्होंने ‘गुरुदेव सेवा मंडल’ की स्थापना कर गांव-गांव में जागरूकता की लहर पैदा की। एक समय इस संगठन की 75,000 से अधिक शाखाएं सक्रिय थीं—जो अपने आप में एक अद्भुत सामाजिक आंदोलन था।उनके कार्यों का दायरा अत्यंत व्यापक था—गोरक्षा,ग्रामोद्योग,
व्यसन मुक्ति,,समरसता,कुष्ठ रोगियों की सेवा है।इन कार्यों ने ग्रामीण भारत के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘ग्राम गीता’—ग्रामीण विकास का मार्गदर्शन
1953 में उन्होंने ‘ग्राम गीता’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो आज भी ग्राम विकास का एक व्यावहारिक मार्गदर्शक माना जाता है। इसमें आत्मनिर्भर गांव, स्वच्छता, नैतिकता और सहयोग की भावना को विस्तार से समझाया गया है।उनकी समाजसेवा और राष्ट्रभक्ति को देखते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें ‘राष्ट्रसंत’ की उपाधि प्रदान की।
तुकड़ोजी महाराज का संबंध विभिन्न राष्ट्रवादी संगठनों से भी रहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी से उनकी आत्मीयता थी, और वे शाखाओं में भी प्रवचन देते थे। 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना के समय उनकी उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि वे केवल संत ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सशक्त प्रवक्ता भी थे।समय के साथ उन्होंने अपने सभी दायित्व अपने सहयोगियों को सौंप दिए और 11 अक्टूबर 1966 को इस नश्वर शरीर का त्याग कर दिया। किंतु उनके विचार, उनके गीत और उनका सेवा-भाव आज भी जीवित है।
राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज का जीवन हमें यह सिखाता है कि भक्ति केवल व्यक्तिगत मुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान का भी सशक्त साधन हो सकती है। उन्होंने साधना को सेवा से, और भक्ति को राष्ट्रभक्ति से जोड़कर एक नई दिशा दी।
आज जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब तुकड़ोजी महाराज के विचार और उनके द्वारा स्थापित आदर्श हमें पुनः प्रेरित करते हैं कि हम भी अपने जीवन को समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित करें।
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