Palamu Tragedy: पलामू के पांकी में मासूम छात्रा की गई जान, अस्पताल में डॉक्टर गायब, स्टाफ के भरोसे इलाज ने उजाड़ा मां का गोद
पलामू के पांकी में हॉस्टल में रहकर पढ़ने वाली 6 साल की मासूम अशरती की निजी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई है। डॉक्टर की अनुपस्थिति में स्टाफ द्वारा इलाज करने के गंभीर आरोपों और स्वास्थ्य सिस्टम की इस बड़ी नाकामी की पूरी रिपोर्ट यहाँ देखें।
पांकी/पलामू, 28 मार्च 2026 – झारखंड के पलामू जिले के पांकी थाना क्षेत्र से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने पूरे जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था और आवासीय विद्यालयों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक 6 साल की मासूम छात्रा, जो अपनी आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने लेकर हॉस्टल में रह रही थी, सिस्टम की कथित लापरवाही की भेंट चढ़ गई। रतनपुर पंचायत के इरगू टोला तेतरखाड़ निवासी जियालाल उरांव की बेटी अशरती कुमारी की एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। आरोप है कि जब बच्ची की जान दांव पर लगी थी, तब अस्पताल में कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था और अनुभवहीन स्टाफ ही उसका इलाज कर रहा था। इस घटना के बाद पांकी में गम और गुस्से का माहौल है।
हॉस्टल में बिगड़ी तबीयत: बसडीहा से अस्पताल तक का वो सफर
अशरती पांकी-मेदिनीनगर मुख्य पथ पर स्थित बसडीहा के चांदो आवासीय छात्रावास में रहकर पढ़ाई कर रही थी। शनिवार को अचानक उसकी तबीयत बिगड़ने लगी, जिसके बाद उसे तुरंत पांकी के एक निजी अस्पताल ले जाया गया।
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डॉक्टर नदारद, स्टाफ का 'प्रयोग': परिजनों और शिक्षक का गंभीर आरोप है कि अस्पताल पहुँचने पर वहां कोई क्वालीफाइड डॉक्टर नहीं था। डॉक्टर की गैर-मौजूदगी में वहां मौजूद कंपाउंडर और स्टाफ ने ही बच्ची का इलाज शुरू कर दिया, जिससे उसकी स्थिति और बिगड़ गई।
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आरोपों का पलटवार: वहीं, अस्पताल के संचालक डॉ. वीरेंद्र का दावा कुछ और ही है। उनका कहना है कि शिक्षक बच्ची को गंभीर हालत में अस्पताल छोड़कर चले गए थे, जिससे समय पर सही निर्णय लेने में देरी हुई। दोनों पक्षों के दावों ने इस मौत को रहस्यमयी बना दिया है।
परिजनों का विलाप: मातम में डूबा तेतरखाड़ गांव
जैसे ही अशरती की मौत की खबर उसके पैतृक गांव पहुँची, वहां चीख-पुकार मच गई। जियालाल उरांव और उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है।
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एक पल में उजड़ी खुशियाँ: गरीब परिवार ने अपनी बेटी को बेहतर शिक्षा के लिए आवासीय विद्यालय भेजा था, लेकिन उन्हें क्या पता था कि वहां से उसकी अर्थी लौटेगी।
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ग्रामीणों का आक्रोश: गांव के हर घर में चूल्हा नहीं जला है। स्थानीय लोग अस्पताल प्रबंधन और हॉस्टल संचालक के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
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सिस्टम पर सवाल: लोगों का पूछना है कि अगर निजी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं रहते, तो उन्हें संचालित करने की अनुमति कैसे दी जाती है?
पलामू में स्वास्थ्य और शिक्षा का काला इतिहास
पांकी और आसपास के ग्रामीण इलाकों में 'झोलाछाप' डॉक्टरों और बिना मानक के चल रहे आवासीय विद्यालयों का इतिहास काफी पुराना और डरावना रहा है।
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बिना रजिस्ट्रेशन के अस्पताल: पलामू के सुदूर क्षेत्रों में दर्जनों ऐसे क्लिनिक और अस्पताल हैं जो बिना किसी वैध डिग्री या रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। यहाँ अक्सर गंभीर मामलों में स्टाफ ही डॉक्टर की भूमिका निभाने लगता है।
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हॉस्टल या कैदखाना: पांकी क्षेत्र में कुकुरमुत्तों की तरह उगे निजी 'आवासीय विद्यालयों' की स्थिति भी दयनीय है। कई जगहों पर बच्चों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा तो दूर, सही पोषण भी नहीं मिलता। इससे पहले भी पलामू में हॉस्टल के बच्चों की बीमारी से मौत के मामले सामने आ चुके हैं।
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निगरानी का अभाव: जिला शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती के कारण ऐसे संस्थान बेखौफ होकर मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं।
अगला कदम: निष्पक्ष जांच और दोषियों पर गाज
इस दर्दनाक हादसे के बाद अब स्थानीय लोग लामबंद हो गए हैं और प्रशासन से बड़ी कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं।
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मजिस्ट्रेट जांच की मांग: ग्रामीणों ने मांग की है कि इस मामले की जांच किसी उच्च अधिकारी से कराई जाए ताकि अस्पताल और हॉस्टल, दोनों की भूमिका स्पष्ट हो सके।
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हॉस्टलों का ऑडिट: पांकी पुलिस और शिक्षा विभाग अब क्षेत्र के सभी निजी छात्रावासों की व्यवस्थाओं का ऑडिट करने की तैयारी में है। यह देखा जाएगा कि वहां बच्चों की सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं।
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कानूनी कार्रवाई: यदि लापरवाही सिद्ध होती है, तो संबंधित निजी अस्पताल का लाइसेंस रद्द करने और गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
पलामू के पांकी में मासूम अशरती की मौत केवल एक व्यक्ति की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी है। डॉक्टर की अनुपस्थिति में स्टाफ द्वारा इलाज करना एक जघन्य अपराध है। अगर समय रहते प्रशासन ने इन 'मौत के अड्डों' पर नकेल नहीं कसी, तो भविष्य में और भी कई 'अशरती' इसकी भेंट चढ़ सकती हैं। फिलहाल, जियालाल उरांव के घर में छाया सन्नाटा पलामू के प्रशासन से जवाब मांग रहा है। क्या नन्ही बच्ची को इंसाफ मिलेगा? यह देखना अब जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है।
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