Lahuji Salve: क्रांति के 'महागुरु' लहूजी साल्वे की अनसुनी दास्तां, जिनके अखाड़े में तैयार हुए थे फुले और फड़के जैसे शूरवीर, गोरों की सत्ता हिलाने वाले इस महानायक का बलिदान
आजादी के उन गुमनाम पन्नों को पलटिए जहाँ लहूजी साल्वे ने अंग्रेजों के खिलाफ बारूद भरा था। ज्योतिराव फुले और वासुदेव बलवंत फड़के जैसे दिग्गजों को युद्धकला सिखाने वाले इस 'क्रांतिगुरु' के शौर्य का पूरा सच यहाँ मौजूद है वरना आप भारत की सशस्त्र क्रांति के असली आधार स्तंभ की कहानी से अनजान रह जाएंगे।
पुणे/महाराष्ट्र, 17 फरवरी 2026 – भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं, लेकिन कुछ नाम उस नींव के पत्थर की तरह हैं जिन्होंने पूरी इमारत का बोझ उठाया पर खुद ओझल रहे। आज 17 फरवरी को देश महान क्रांतिकारी और 'सशस्त्र क्रांति के अग्रदूत' लहूजी राघोजी साल्वे की पुण्यतिथि मना रहा है। यह उस महामानव की गाथा है जिसने न केवल अंग्रेजों की गोलियों का सामना किया, बल्कि समाज की ऊंच-नीच की बेड़ियों को तोड़कर एक ऐसी फौज खड़ी की, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ा दी थी।
पहाड़ियों में गूँजा स्वराज्य का संकल्प
लहूजी साल्वे का जन्म 14 नवंबर 1794 को पुणे के पुरंदर किले की तलहटी में हुआ था। उनके खून में ही वीरता थी।
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विरासत में मिला साहस: उनके पिता राघोजी पेशवा की सेना में एक वीर योद्धा थे। बचपन से ही लहूजी ने खिलौनों के बजाय तलवारों और भालों से खेलना सीखा।
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1817 का वो जख्म: जब खड़की के युद्ध में अंग्रेजों ने मराठा सेना को हराया और लहूजी के पिता वीरगति को प्राप्त हुए, तब 24 साल के इस युवक की आंखों में प्रतिशोध की ज्वाला जल उठी। उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक फिरंगियों को इस मिट्टी से बाहर नहीं निकाल देंगे, चैन से नहीं बैठेंगे।
क्रांति का 'यूनिवर्सिटी': लहूजी का अखाड़ा
लहूजी ने समझ लिया था कि अंग्रेजों को हराने के लिए केवल जज्बा नहीं, बल्कि ट्रेनिंग की भी जरूरत है। उन्होंने पुणे के गंज पेठ में एक विशाल अखाड़ा शुरू किया।
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दिग्गजों के गुरु: आपको जानकर हैरानी होगी कि महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले को लाठी-काठी और आत्मरक्षा की शिक्षा लहूजी ने ही दी थी।
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क्रांतिकारियों की पौध: 'आद्य क्रांतिकारी' वासुदेव बलवंत फड़के और लोकमान्य तिलक जैसे नायक भी लहूजी के मार्गदर्शन और उनकी युद्ध नीति से गहरे प्रभावित थे।
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समरसता का संदेश: उस दौर में जब समाज जातिवाद में बंटा था, लहूजी ने अपने अखाड़े के दरवाजे हर वर्ग के लिए खोल दिए। उन्होंने सिखाया कि "आजादी की लड़ाई में लहू का रंग एक ही होता है।"
लहूजी साल्वे: एक नजर में शौर्य गाथा (Legend Snapshot)
| विवरण | प्रमुख जानकारी (Key Highlights) |
| जन्म | 14 नवंबर 1794 (पुरंदर, पुणे) |
| पुण्यतिथि | 17 फरवरी 1881 |
| पहचान | सशस्त्र क्रांति के जनक और महान प्रशिक्षक |
| शिष्य | ज्योतिराव फुले, वासुदेव बलवंत फड़के, तिलक |
| मुख्य कार्य | 1857 की क्रांति में गुप्त सैन्य सहायता और सामाजिक एकता |
अंतिम अध्याय: एक निस्वार्थ बलिदान
17 फरवरी 1881 को इस महायोद्धा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्होंने कभी किसी पद या पेंशन की लालसा नहीं की। उनका पूरा जीवन राष्ट्र को समर्पित रहा। आज के समय में जब हम सामाजिक समानता की बात करते हैं, तो लहूजी साल्वे का जीवन हमारे लिए सबसे बड़ा उदाहरण है।
भूला नहीं जा सकता यह उपकार
लहूजी साल्वे केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक विचार हैं। वे सिखाते हैं कि अगर इरादे फौलादी हों, तो संसाधनों की कमी कभी रुकावट नहीं बनती। आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें नमन करता है।
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